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Showing posts from 2021

चमत्कार ज़रूरी है. सेटिंग भी ज़रूरी है.

  कुछ साल पहले नौकरी.कॉम पर एक सीनियर रिक्रूइटेर का रिज्यूमे देखा था. यह रिज्यूमे था २०१२ में टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज से एम् बी ए अभिषेक की। . इसके पहले उन्होंने एक और एम् बी ए किया था इक्फ़ाई हैदराबाद से , उसके बाद दो साल की रिक्रूइटेर की नौकरी TCS हैदराबाद में. फिर टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज से एम् बी ए, फिर माइक्रोसॉफ्ट में रिक्रूइटेर, फिर लिंकेडीन में रिक्रूइटेर और फिर एक फार्मा कंपनी में रिक्रूइटेर.. फिर ऊबर में रिक्रूटमेंट और फिर जब ऊबर से काफी सारे एच आर वाले निकाले जाने लगे तो इन्होने नौकरी.कॉम पर अपना रिज्यूमे डाल दिया. अब आप कहेंगे , प्रीमियर स्कूल , नामी कंपनियों में अनुभव और नौबत आ जाए नौकरी.कॉम पर रिज्यूमे डालने की , वह भी उस रिक्रूइटेर को जिसने लिंकेडीन की सपथ ली हो, लम्बा अनुभव लिंकेडीन में रिक्रूइटेर रहने का हो. यह सब इतना कॉमन नहीं है कि प्रीमियर बी स्कूल एम् बी ए को अच्छे अनुभव के बाद भी नौकरी. कॉम  का सहारा ढूंढना पड़े. एक समय था जब कोई प्रीमियर बी स्कूल का इंसान नौकरी.कॉम पर अपना रिज्यूमे डालना तौहीन समझता था। . चलो किश्मत अच्छी हो तो नौकरी मिलती रहती ह

बिखर गए तो रेत , ढल गए तो बुत !

  कितनी पोस्टमार्टम की जाए अपनी कुंडली और किस्मत की. साली घूम घूम कर अपनी काली शक्ल दिखाने आ जाती है. कभी भी हो, जवानी से अब बुढ़ापे तक इसकी यही कहानी रही है, ज़िन्दगी हराम करते रहो।   हर बार इसी बात का अहसास करने की कोशिश की है इसने कि मेरा वक़्त ख़त्म हो गया है. अब बेकार की कोशिश कर रहा हूँ मैं, मेरे लिए कोई काम किसी जगह नहीं बचा है. डटे रहे तो फिर कुछ मिला पर अब बस झूठ की आस बची है.  पढ़ते रहो, फौजियों की तरह तैयारी करते रहो पर बात नहीं बनती. हज़ारों जगह अप्लाई कर करते रहो , ऐसे कितने ही ब्लॉग पिछले ५ सालों में लिख चुका , साली किस्मत है कि समझती ही नहीं. कब ख़त्म होगी इसकी शरारतें। . कितना कर्मा बचा है अब तक तो ख़त्म हो जाना चाहिए था।  एक ही शब्द है जो बार बार लौटता है, फ़्रस्ट्रेशन, निराशा , इंतज़ार, बेचैनियां जो कब ख़त्म होंगी कह नहीं सकता.  समय ठीक तो लग रहा है पर मौका नहीं मिल रहा. हाथ में आकर मौका निकल गया, डेट आ गया जोइनिंग नहीं हुई, बार बार यही कहानी। चलो ऐसा होता रहता है, कोई नयी बात नहीं  है. जेल  जमानत बेल परोल   बस यही कहानी है अपनी. और इसके ऊपर ही एक गुमनाम कहानी बनेगी, किताब भी. 

सिद्धि प्रत्येक मनुष्य का कर्त्तव्य है--पुरुषार्थ की आहूति.

महीने का राशिफल, साप्ताहिक राशिफल, ग्रह गोचर , नक्षत्र गोचर , ग्रहण , मार्गी और वक्री , इतना कुछ है भविष्यफल में. यूट्यूब पर कितने वीडियोस देख कर अब यह समझ आया है कि , स्वयं या मित्र राशि में गोचर तो अच्छा , मित्र या स्वयं के नक्षत्र में गोचर तो अच्छा, दुस्थान में गोचर तो मुश्किल, गोचर में युति का अपना ही असर। . सीधे फार्मूले से चलें तो आसान है भविष्यफल कह देना , लगभग हर घर के कारकत्व १० से ५० तरीके के हैं, उसी तरह ग्रहों के भी कारकत्व हैं, फिर गोचर के बाद दृष्टि का भी कथन, वहाँ भी वही हिसाब। .पर होता है क्या ऐसा कुछ? नहीं, यह तुक्का है. दशा सर्वोपरि है. वैसे आप कहेंगे, गोचर से ही तो ढैया और साढ़े साती है। . बात सही है, पर क्या ढैया और साढ़े साती कोई सामान प्रभाव देते हैं ? नहीं. यहां  भी दशा महत्वपूर्ण है.  अगर कुंडली मज़बूत है तो सब आंधी पानी से बेअसर , पर कुंडली कमज़ोर है तो ऊँट पर बैठे आदमी को भी कुत्ता काट जाता है।  अब भाई हमने ३ तरह की बात कर ली; पहली गोचर, दूसरी दशा और तीसरी कुंडली की शक्ति।  मुझे लगता है, इन तीन स्थितियों के अलावा जो बात फर्क ला सकती है वह है सन्यास या फिर किसी र

ईश्वर सिर्फ जीवन देता है , जो एक न्याय है, सजा या कुछ और

 ज्योतिष समाधान का विषय नहीं है. समाधान यदि कहीं है तो वह एक सिद्ध गुरु या सिद्ध आशीर्वाद से ही मिल सकता है. दूसरा तरीका है पीड़ित स्वंम सिद्ध हो जाए। . Aruna Shanbaug case - Wikipedia अरुणा शानबाग की कहानी सब को मालूम है. इसको कहते हैं प्रारब्ध। .फाइनल वर्डिक्ट यही है.. कोई अपील नहीं हो सकती।  प्रारब्ध है ३ रॉबिंसन स्ट्रीट कोलकाता और मौतों का समुंदर एक २५ करोड़ की आलीशान कोठी में।  अभिशप्त जीवन, दुर्भायपूर्ण , दर्दनाक मौत , जो उन्होंने स्वयं चुनी  जीवन का इस बवंडर में नेस्तनाबूत हो जाना  राम को भी रावण पर विजय शक्ति -दुर्गा -काली-चंडी  ने ही  दिया था। . बस यही एक रास्ता बचता है, अगर प्रारब्ध आपको पल पल लील रहा हो. बचे न बचे पर मरे तो चंडी के ध्यान में.  कई लोग आपको जीवन में मिलेंगे जिन्होंने आप पर अनंत कृपा की होगी, सभी के लिए आप कृतज्ञं होंगे , परन्तु जब आपकी बारी आएगी उस कृपा का क़र्ज़ चुकाने की तो प्रारब्ध आपको लज्जित करेगा। . सामर्थ्य सब कुछ नहीं है, कृपा सबसे ऊपर है.  कुछ लोग आपके बुरे कर्मों की सजा देने मात्र के लिए ही यहां भेजे गए हैं, वे आपको आपका पाप धोने में मदद करते हैं. मेरे

पिताजी मैं फिर से फेल हो गया

 (याद है , सेण्टर फ्रेश  का विज्ञापन?) -पिताजी मैं फिर से फेल हो गया ? बधाई हो विराट को, शास्त्रीजी को , टीम ने लगातार अच्छा प्रदर्शन किया इनके नेतृत्व में,  २०११ के बाद, पिछले १० साल में , इनके छत्रछाया में,  भारत  कोई भी विश्व कप नहीं जीता.  पाकिस्तान और न्यू जी लैण्ड  से हार एक राहु काल में घटित घटना जैसी है. वैसी ही जैसी हम ३६ रन पर इंग्लैंड में सारे आउट हो गए थे , पर फिर भी २-१ से टूर्नामेंट जीते। .. इस टीम का ऐसा ही कुछ पनोती चल रहा है. जबकि सितारे भरे हैं. अफगानिस्तान, स्कॉटलैंड और नामीबिया को हराकर जख्म भरने में मलहम काम कर रहा है.  होता है , खेल है, अब बांग्लादेश को ही देख लीजिये, इतनी भी ख़राब टीम नहीं है. पर वक्त ख़राब है.  रवि शास्त्री को कोई नहीं ढूँढ रहा.. जय शाह कौन हैं? कहाँ हैं? रोहित शर्मा कुछ नहीं बोल पा रहे.. बूम बूम बुमराह अब हलवा बॉलिंग कर रहे हैं, पंड्या को रक्तहीनता शता रही है, मिस्ट्री स्पिनर छक्के परोस रहा है.. सब परास्त, पराजित,  शशंकित टीम की तरह मुँह छिपाए हैं.. भाग्य विपरीत हो बैठा है.. टॉस लगातार हारते जा रहे हैं..  आज है

समस्त विश्व की चिंता टूल-किट में क़ैद है. षड्यंत्रों के जाल में फँसी अपनी एक एक साँस को तड़फड़ाती..

क्या नौकरी करना कठिन होता जा रहा है? क्यों लोग रिजाइन कर रहे हैं? क्या यह इसलिए तो नहीं कि अब गंध आ रही है गंदे लोगों से जो किसी षड़यंत्र का सहारा लेकर नौकरियों में भरते चले गए, जातिवाद, प्रांतवाद, कई अन्य कारण रहे ? अच्छे लोग नौकरी छोड़ रहे हैं, क्यूंकि वे अपना काम , मतलब का काम करना चाह  रहे हैं? क्या वे लोग नौकरी छोड़ रहे हैं, जिनका मन अघा गया है, काम करके, समझौते करके, तिजोरियां भर भर के? सब के अलग अलग कारण हैं. पाप का घड़ा भरता है समय समय पर न्याय होता रहता है , या यूँ कहें कि सल्तनत के बाद मुग़ल फिर अँगरेज़ शाशन करते हैं, फिर इतालियन, फिलहाल गुजरात से नए शाशक देश चला रहे हैं। .  कलयुग का कुचक्र. यहां कोई ईश्वर नहीं है, यहां सिर्फ राक्षस सत्ताधीश हैं, सर्वत्र. चालबाज़, मौका परस्त, शोषक। देवों का समय तो कब का समाप्त हो चुका। . देव अब सिर्फ मंदिरों की शोभा बढ़ाते हैं, अपने भिन्न भिन्न रूपों में.  जीने की उम्मीद क्षीण होती जा रही है. यह समस्त विश्व में छाया हुआ एक अंधेरा है... उम्मीद की नयी किरण? पता नहीं पर जब अँधेरा गहरा छाया हो तो उम्मीद की कोई किरण फूटती ही है, देर सबेर।  हर कोई अपना अस्

प्रारब्ध अर्थात दुर्भाग्य? ईश्वर बेनक़ाब !

प्रारब्ध,  कर्मा,  डेस्टिनी, फेट,  सभी शब्दों के मायने एक से हैं, मतलब दुर्भाग्य ! कभी सुना है किसी को इन शब्दों के साथ सौभाग्य की चर्चा करते हुए?  मैंने नहीं सुना.  दिलचस्प बात है संचित कर्म हैं तो प्रारब्ध भी बनेगा..  आज एक ह्रदय विदारक सूचना मिली. एक जान पहचान की महिला, जो सिंगल मदर हैं, ने अपने एक मात्र 9 वर्षीय पुत्र को कल ही डेंगू के कारण खो दिया.. उसके जीने की वज़ह ईश्वर ने छीन ली.. एक माँ का यह दर्द विष्णु की सैया को हिला पाए न पाए पर उसने हम सब को काठ सा बना दिया है.. स्तब्ध,  निस्तेज़, मृत.. अकल्पनीय है यह सोच पाना कि ईश्वर इतना निर्दयी भी हो सकता है..  जब अभिमन्यु का पुत्र जो मृत पैदा हुआ था,  इसी ईश्वर कृष्ण ने उसे जीवित कर दिया था.. आज कृष्ण कहाँ हैं?   हम सभी को अपना दर्द मामूली लगने लगा इस भीषण दर्द के आगे.. उस माँ की दशा सोच सिहर जाता हूँ..  शायद इससे बड़ी विभीषिका की कल्पना भी कोई नहीं कर सकता..  एक माँ अब कैसे जीएगी?  क्यूँ इतना अन्याय?   कोरोना ने कई बच्चों को अनाथ कर दिया है.. क्या उनका दुःख कोई बाँट सकता है? शायद ऐसी कोई माँ.  मैं आज काफी दर्द में हूँ..  स

१२वें घर से आज़ादी

 १२वें घर से आज़ादी ! इस अजीब से शीर्षक से आप कन्फूज़ हो गए क्या?  कुंडली का १२वां घर मुक्ति का घर है, जन्म-मृत्यु के कुचक्र से आज़ादी का !  अब इस घर को समझते हैं, यह घर किस राशि का है, उसका स्वामी कौन हैं , उसके साथ कौन हैं, वह किस राशि में बैठा है, उसपर और उसके १२वें घर पर किसकी दृष्टि है, इत्यादि. सब तय करेंगे कि आप की सज़ा कैसी होगी, किन कर्मों में आपका इस्तेमाल होगा और कहाँ आप सजा जैसा महसूस करेंगे. १२वां घर कोई रिवॉर्ड नहीं है. बचा काम है, पूर्व कर्म का निदान है, भूल-चूक- लेनी-देनी ! मुक्ति का स्थान,  आसानी से नहीं छोड़ेगा..  अब आते हैं अपने/मेरे १२वें घर पर, यहां मेष राशि है. इसका स्वामी तीसरे घर में है , नीच का और अस्त भी, सूर्य और अपने शत्रु बुध के साथ. १२वें में शनि है, नीच का और २९ डिग्री पर. न्याय के देवता , न्याय ( अंतिम न्याय ) के घर में हैं, उनपर गुरु की दृष्टि है, अर्थ है, न्याय तो पूर्व कर्मों का खूब होगा. और न्याय घर से ही शुरू होगा, मतलब, शनि पहले अपने घरों का न्याय करेंगे; यानि, भाग्यभाव और कर्म भाव का. वहाँ आपकी बजा -बजा के ली जायेगी. दूसरा न्याय , १२वें घर

मिल्खा रुक जा!

शारीरिक और मानसिक पीड़ा हो तो हीलिंग अनिवार्य है. वैद, डाक्टर , हस्पताल, दवाई चाहिए, सेवा चाहिए, समय , लोग,  पैसे , धैर्य सब की आवश्यकता पड़ेगी। .. इलाज़ की कई पद्धतियां हैं , जितने विद्वान उतने विधा का अवतरण। .. सब की अपनी आस्था है। .  मनीष भाई प्रेसेंसिंग थिएटर के सीनियर संचालक , कंसलटेंट हैं. इस पद्धति में पीड़ा को चित्रित किया जाता है, जैसी पीड़ा वैसी कलाकारी के साथ चित्रण एक नाटक जैसा. लोग जीते हैं उस पीड़ा को, समझते हैं और फिर उससे उबर पाते हैं..  पास्ट लाइफ रिग्रेशन हो या आकाषिक रिकॉर्ड पद्धति, सभी आपकी पीड़ा का मूल ढूढ़ते हैं. केतु पास्ट लाइफ को  झलकाता है जन्मपत्रिका में, पांचवा घर आपका इंटुइशन है, सब के अलग अलग विधान हैं, सबके अलग अलग पुरोहित, पांडित्य और उससे जुड़े कई कर्मकांड। .. विधा देशी हो या विदेशी , सभी के मूल में वही खोज चल रही है, हम अस्तित्व में हैं तो पीड़ा की वजह भी वही अस्तित्व है, विधि का विधान है, जन्म, कर्म, जरा , मृत्यु और फिर वही चक्र. भोग का कर्म, फिर कर्म का भोग , यही चक्र है.  शारीरिक, मानसिक बीमारी याद दिलाते हैं, आपका कर्मा है, भोगिए,  कल मनीष भाई ने एक सुन्दर ल

यह डाइवर्सिटी क्या बला है ? बहरूपिया

यह डाइवर्सिटी क्या बला है ?  याद कीजिये आपने यह जुमला पहली बार कब सुना था! मैंने पहली बार इसे सुना था जब एक इन्वेस्टमेंट कंसलटेंट इन्वेस्ट करने में कुछ गुर बता रहा था ; पोर्टफोलियो क्या है, कैसे फण्ड डाइवर्सिफाई करें, इत्यादि। . यहां डाइवर्सिटी का अर्थ है रिस्क कम करना. यह इन्वेस्टमेंट की दुनिया है. दूसरी बार डाइवर्सिटी सुना एथनिक डाइवर्सिटी के अर्थ में; जातीय समीकरण, मुस्लिम-यादव बिहार में, तुत्सी-हुतु रवांडा में, आइसिस -येज़दी सीरिया में , मीम-भीम उत्तर प्रदेश में, इत्यादि !  देश में २०२१ की जनगणना हो रही है! नितीश कुमार जो बिहार के मुख्यमंत्री हैं, ने इस बार जातीय आधार पर जनगणना की मांग की है. जायज़ है. किसी को नहीं पता पश्चिम बंगाल में कितने प्रतिशत मुस्लिम हैं, रोहिंग्या, बांग्लादेशी सभी जोड़कर देखे तो शायद ३५%... ऐसा कई अनाधिकारिक सूत्र बताते हैं.  मामला जब सत्ता का हो तब डाइवर्सिटी का अर्थ होता है, समीकरण, ध्रुवीकरण (Polarization ), वोट बैंक इत्यादि.  जब डाइवर्सिटी की बात कंपनी के अंदर हो तब बात होती है महिला संवर्धन -संरक्षण, ब्लैक लाइफ मैटर्स, लैंगिक और समलैंगिक राइट्

लज़्ज़ानिवारण के लिए मखमली आवरण

काहे कि कल से बैंगलोर में लॉकडाउन है। .. दो हफ्ते का फिर से घर पर विश्राम। .  HRBP (जिनका नाम नित बदलता रहता है) कुछ कंपनी इसको पीपल पार्टनर कह रही है... मोटी  सैलरी पचाने के लिए मोटी चमड़ी भर काफी नहीं है.. आपको लज़्ज़ानिवारण  के लिए मखमली आवरण (अंग्रेज़ी में facade )भी चाहिए। ..सो सीरत बदले न बदले , नाम बदलते रहिये..  एक बात तो इनकी माननी पड़ेगी, इन्होने स्वीकार कर लिया है कि "बिज़नेस" इनके बूते का नहीं है सो नाम रख कर अपने आप को रोज़ शर्मिदा क्यों करें. "पीपल पार्टनर" सरल है...  इन पीपल पार्टनर्स के लिए गैंग्स ऑफ़ वास्सेय्पुर का यह सुपरिचित डायलॉग  प्रस्तुत कर रहा हूँ... लॉकडाउन में चखना जैसा काम करता है..  आपको नीचे JP की जगह PP (पीपल पार्टनर) पढ़ना है.. ..  चलते चलते बता दूँ कि यहाँ RS (रामाधीर सिंह ) बिज़नेस लीडर है। ..जिसके बार बार प्रताड़ित , लज़्ज़ित किये जाने के बाद CHRO ने HRBP का नाम बदलकर "People Partner कर दिया है..  RS (to JP):  Tum apni bhavnaaon ko daalo apni gaa#d me. Saala yahaan baithe baithe chhutwaiyaa netaaon, chhote chhote bachchon ki tarah netaa-gir

प्राथमिकताएं निर्धारित हैं..

आगे बड़ी लड़ाई है... चीन ने लंका लगाई है... मिलियन लाशे बिछाई हैं. ... विश्व युद्ध नहीं बस , यह प्रलय है...  आईसीयू , वेंटीलेटर, ऑक्सीजन... हस्पताल का बेड। .. प्राथमिकताएं निर्धारित हैं...  कब थमेगा यह युद्ध? कोई नहीं जानता। ... जब तक बचे तब तक लड़े। ... जब तक लड़े तब तक बचे. ...प्राथमिकताएं निर्धारित हैं.   पहले बुखार मापते थे , अब ऑक्सीजन। ... प्राथमिकताएं निर्धारित हैं.. ...कोविड के म्यूटेंट्स ने व्यथा बढ़ाई है... हर देश का अपना वैरिएंट है.. लोकलाइजेशन का स्पश्ट उदाहरण है..  ...जांच , वैक्सीन, फिर कोविड  , फिर रेमडेसिविएर। ....कहाँ फंसा है विश्व। ..विकल समस्त जन संकुल.  देश फंसा चुनावों में... टीवी डिबेट कुल कलंक प्रतिभाओं में... नाच रहे यमराज गलियों में... सब जन मन बंद हैं किल्लिओं में. ... प्राथमिकताएं निर्धारित हैं.. नाक मुँह में ठूँसे तिनके.. ..कपडे कई बंधवाये हैं... फिर बुद्ध याद आ गए  हैं. "वह घर ढूंढ कर बतलाओ जिसका कोई खोया न हो इस कोविड में।"  ..जल बिन मछली की कविता हम मनुस्य जनों पर विपदा बन कर छाई है...  पोलियो कालरा, हैज़ा, मलेरिआ , डेंगू सभी शर्माए हैं... काल काल को