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Showing posts from 2016

कहते हैं आईटी में सारे पाप धुल जाते हैं.

सन २००९, स्थान बंगलुरु , मैं, SIBM बंगलुरु में MBA के एडमिशन की GD&PI conduct कर रहा था.  मैंने पाया  के लिए लोग मुख्यतः TCS , Infosys जैसे  आईटी सर्विसेज कंपनी के Engineers, टीम-लीडर्स थे. सब ने MBA करने के पीछे एक सी ही बात कही; करियर ग्रो नहीं कर रहा, सैलरी नहीं बढ़ रही, टीम लीडर/manager बायस्ड हैं, आन -साइट, opportunity काफी कम हैं, और अगर है तो फिर,  suckers इस जात वाले के लिए रिजर्व्ड हैं. , . ...... तो साहब, MBA  एक "संकट मोचक" है जो सांसारिक दुष्चक्रों से छुटकारा दिलाने वाला राम बाण है, ऐसा समझ लीजिये. . आईटी वाले किसी ने भी कोई दिलचस्प बात नहीं की.  ,प्रोजेक्ट मेनेजर, onsite ट्रेवल, per diem, late night, की बात की, Business किसी ने नहीं.  ( कहते हैं आईटी में सारे पाप धुल जाते हैं.  आईटी में कोई भी गधा पहलवान हो सकता है. अंधे, लंगड़े, हकले, सब चलेंगे, J node,  JavaScript, AngularJS, jQuery, Node.js या  Ruby on Rails  आता हैं,  बन गए साहब UI /UX स्पेशलिस्ट! एप्लीकेशन ससोफ्ट्वरे कोई भी सीख लेता है, फिर कोई 'लाला' कंपनी में गधा-खच्चर मजूरी के कुछ साल और फि

राम की शक्ति पूजा!-LEADERSHIP LESSONS

सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ आधुनिक हिन्दी काव्य के प्रमुख स्तम्भ हैं। राम की शक्ति पूजा उनकी प्रमुख काव्य कृति है। निराला ने राम की शक्ति पूजा में पौराणिक कथानक लिखा है, परन्तु उसके माध्यम से अपने समकालीन समाज की संघर्ष की कहानी कही है। राम की शक्ति पूजा में एक ऐसे प्रसंग को अंकित किया गया है, जिसमें राम को अवतार न मानकर एक वीर पुरुष के रूप में देखा गया है, राम  विजय पाने में तब तक समर्थ नहीं होते जब तक वे शक्ति की आराधना नहीं करते हैं। "धिक् जीवन को जो पाता ही आया है विरोध, धिक् साधन जिसके लिए सदा ही किया शोध!" तप के अंतिम चरण में विघ्न, असमर्थ कर देने वाले विघ्न. मन को उद्विग्न कर देने वाले विघ्न. षड़यंत्र , महा षड़यंत्र. परंतु राम को इसकी आदत थी, विरोध पाने की और उसके परे जाने की. शायद इसी कारण उन्हें "अवतार " कहते हैं. अवतार, अर्थात, वह, जिसने मानव जीवन के स्तर को cross कर लिया है. राम सोल्यूसन आर्किटेक्ट थे. पर सिर्फ  सोल्यूसन  आर्किटेक्ट साधन के बगैर कुछ भी नहीं कर सकता. साधन शक्ति के पास है. विजय उसकी है जिसके साथ शक्ति है.   जानकी! हाय उद्धार

क्या कॉर्पोरेट हायरिंग में भी कास्टिंग काउच है? (Is there a Casting Couch in corporate hiring too?)

आप इसे पहचानते हैं, सही कहा आपने,  हार्वे विंस्टिन, मशहूर हॉलीवुड फ़िल्म निर्माता...कास्टिंग काउच से विख्यात हुए.. किस्से हज़ारों.. कारनामें बड़े बड़े..  इस विषय पर कोई नहीं बोलता....गन्दा है पर धंधा...   मेरा ह्यूमन रिसोर्सेज (एच आर) फंक्शन में काम करने का अनुभव है, जब मैं मैनेजमेंट की पढ़ाई सिम्बी में कर रहा था, मेरी क्लास में कुछ ६० लोग थे. दो-चार विदेशी (थर्ड वर्ल्ड कंट्री के लोग, जिनके लिए इंडिया का सिम्बी जैसा एवरेज मैनेजमेंट का शॉप भी कैंब्रिज है). लगभग ४० लड़कियां, बाकी लड़के. कुछ ५ या ६ बैक डोर एंट्री वाले भी थे. एक पटना से भी था, जो बाद में जूनियर बैच में भेज दिया गया, क्योंकि पुणे यूनिवर्सिटी ने मैनेजमेंट कोटा में उसे जगह नहीं दिया. आज साहब KPMG में ह्यूमन रिसोर्सेज के डायरेक्टर हैं. बैक डोर एंट्री वाले, TCS America में रिसोर्स मैनेजमेंट यानि पोल्ट्री फार्मिंग कर रहे हैं. एक बैक डोर वाला, कई देश में चेंज मैनेजमेंट कर आया. कॉर्पोरेट वर्ल्ड का नंगा सच आपको मैनेजमेंट संस्थानों में ही दिख जाएगा। मतलबी, षड्यंत्रकारी , चौकड़ी बाज़. वहाँ  मिलेंगे. गंदे-घिनौने चेहरे, प्लेसमेंट क

कहते हैं, स्वर्ग भी मरने के बाद ही मिलता है!

२६ अगस्त के टाइम्स ऑफ़ इंडिया में न्यूज़ है, "३१ कंपनियों को IITs ने बैन कर दिया है. उन्होंने प्लेसमेंट की मर्यादा की माँ चो* दी है. ऑफर दे कर जोइनिंग नहीं दिया. फ्लिपकार्ट, ग्रोफर्स, जोमाटो, और ऐसे अनेकों नाम हैं. स्टार्ट उप फ़ैल हो रहे हैं. स्टार्ट उप फ़ैल होते हैं. लेकिन स्टार्ट उप तब तक फ़ैल नहीं होते जब तक वो, फिर से नयी जंग के लिए तैयार हैं हो जाते. रेलिअनेक ज्वेल फ़ैल होगया, टाटा, बिरला, के कई वेंचर फ़ैल हो गए. मर्ज हो गए, बिक गए, कबाड़ में गया. एयरलाइन कम्पनीज बंद हो गयी, बंद होना फेलियर नहीं है, हार जाना , हार मान लेना फेलियर है. सहादत मांगती है स्टार्ट-अप . किसी नें सच ही कहा है, स्टार्ट उप में, काफी समय, बिज़नस प्लान ही मिसिंग होता है. फंडिंग है, आईडिया है, मार्केटिंग है, स्ट्रेटेजी है. बिज़नस प्लान बना नहीं है.  सारी बात नीयत की है. अगर आप की नीयत अच्छी  है तो, बरक्कत होगी. इंशाअल्लाह! बात अर्रोगंस से शुरू होती है, अर्रोगंस से ख़त्म हो जाती है. कॉपी-पेस्ट को कोई स्टार्ट उप नहीं ,कहता! कॉपी -पेस्ट बुरा नहीं है, पर मॉडल तो चेक कर लो, जब क़यामत निश्चित है उस मॉडल में, तो फिर

अब कोई HR वाला न पूछेगा, ६-६ महीने में जॉब क्यों छोड़ते हो?

दोस्त -दोस्त ना रहा! सबको CHRO बनना है! जय  Cipla , जय  Piramal !  तू जहाँ जहां चलेगा, मेरा साया साथ होगा! कभी कभी ऊँगली पकड़ कर चलने वाला भी ठेंगा दिखा कर आगे निकल जाता है. जब आपका सगा ही दगा दे जाए तो समझ लीजिये, आपके करियर की शाम आ चुकी है. अब कोई HR वाला न पूछेगा, ६-६ महीने में जॉब क्यों छोड़ते हो? CHRO बनने की चूहा दौड़! चीफ टैलेंट ऑफिसर एंड हेड कॉर्पोरेट HR-देश की तीसरी बड़ी फार्मा कंपनी, जॉब स्टे ८ महीने. उसके पहले, चीफ टैलेंट अफसर, देश की सबसे बड़ी प्राइवेट diversified कॉर्पोरेट  - ,जॉब स्टे- १८ महीने. इतने उतावले क्यों हो भाई, टैलेंट मैनेज कर रहे हो या धनिया उगा रहे हो? इतने काम समय में तो आप अपना, स्वयं  का टैलेंट भी नहीं चेक कर पाते नयी कंपनी में. ये कॉर्पोरेट की हायरिंग माफिया के हाथ में चली गयी है लगता है. कुछ लोग इसका सूत्र ढूंढ चुके हैं. हैडहंटर अपना गेम खेल रहा है. हायरिंग ही जब हथकंडा हो तो टैलेंट तो  तिल्हनड्डे  में जाएगा ही. तनु वेड्स मनु का यह विडियो देख लीजिये! तिल्हनड्डे का मतलब साफ़ हो जायेगा. क्या वजह है कि CHRO लोग अपने बावर्ची, नौकर, ड्राइवर की तरह चीफ

HR की ज़िन्दगी जन्नत है. हनीमून की जगह

शिद्दत वाला HR ! मुझे याद है, २००१; जब मैं सिम्बायोसिस इंस्टिट्यूट ऑफ़ बिज़नेस मैनेजमेंट पुणे की MPM/MBA entrance test की इंटरव्यू के लिए गया था. GD स्टार्ट हुआ, मैं और एक सरदारजी , अंग्रेजी LOUDLY बक रहे थे. हम अग्रेसिव थे, आप बत्तमीज़ कह लीजिये। गलती हमारी नहीं हैं, हमें बताया गया था, ज्यादा बोलने को, औरों से मौका छीनने को, और ऐसे ही कुछ असंवैधानिक, असामाजिक प्रलाप. ग्रुप में काफी सज्जन और सलीकेदार , पढ़े-लिखे प्रतियोगी थे. हम दोनो ने उन्हें लगभग बोलने नहीं दिया. सीधे शब्दों में; हम ने उन्हें सुनने की बिलकुल कोशिश नहीं की, समझने की तो बात ही दूर की है. नतीजा? सरदार जी और मैं GD में सेलेक्ट हो गए, सभ्यजन बाहर. सरदारजी आज CHRO हैं, एक नामी बीपीओ में फिलिपींन्स में. ठीक हैं, बीपीओ और वह भी फिलीपींस में, आप कहेंगे , अंधों में कांना राजा. ढेले पर का भात! दूसरी कहावत कुछ रूढ़ देशी है. आप रहने दीजिये!  गार्टनर वाले कहते हैं, फार्च्यून २५० के CEOs  मानते हैं की उनके ५५% CHROs को बिज़नेस रणनीति नहीं समझ आती. उनके CFOs तो सिर्फ ३०% CHROs को इस काम के क़ाबिल समझते हैं. ९०% महिलाओं की चॉइस HR है.at

बदनाम बादशाह के हरम की हूरें!

बदनाम बादशाह के हरम की हूरें! एक फ्रेंच मल्टी नेशनल कंपनी के सीनियर मानव संसाधन मैनेजर ने अपने बायो डेटा में लिखा है- पहले आपको बता दूँ की मैं क्या करना चाह रहा हूँ. मैं एक षड़यंत्र का शिकार हूँ. षड़यंत्र है- पिछले २ साल से  मानव संसाधन में नौकरी ढूंढ  रहा हूँ, ५०० कंपनियों में अप्लाई कर चूका हूँ पर कोई इंटरव्यू नहीं. मैं SIBM पुणे से MBA  हूँ और पिछले १३ साल में कुछ अच्छी MNC कम्पनीज़ में काम कर चूका हूँ. मुझे लगता है, कोई बड़ी बीमारी लग गयी है जॉब मार्किट को. IIT और IIM वाले भी, कई बार,  मजबूरी में start up कम्पनीज का रुख कर रहे  हैं. नतीजा साफ़ है. MNC companies इंडिया में अपने डिक्लाइन की ओर अग्रसर है. क्या कोई षड़यंत्र है? आइए जाँच शुरू करते हैं- कई लोगों का मानना है. MNC एवरेज लोगों का अड्डा सा बन गया है. एवरेज और insecure managers  एंड सीनियर managers कमज़ोर और नपुंसक, लोगों को hire कर रहे हैं. इतना ही नहीं, ये इनको संरक्षण भी दे रहे हैं. "बस एक ही उल्लू काफी था, बर्बाद गुलिश्तां करने को! हर शाख पर उल्लू बैठा है ,अंजामें गुलिश्तां क्या होगा!" सन २००७ ने मेर

Workplace Abuse को कहो, "इसकी माँ की!

कुछ स्टार्ट  उप के फाउंडर्स , managers "fuck" , "fucked "इत्यादि शब्द का इस्तेमाल ऐसे करते  है जैसे इसके बगैर उनकी  उत्पत्ति  पर प्रश्न चिन्ह लग जाएगा. मैं इनसे पूछना चाहता हूँ कि बगैर वियाग्रा (वीमेन वियाग्रा भी अब उपलब्ध है) के आप ३ मिनट नहीं चल पाते, ८ और ९ इंच आपके लिए सपना है और दिन में ३० बार अपनी टीम, क्लाइंट्स के सामने, ऑफिस बॉय और महिलाओं , बच्चिओं के सामने, अपने से उम्र और अनुभव में काफी ज्यादा लोगिन के सामने आप "fuck " चालीसा के माध्यम से क्या बताना चाहते हैं?  कि आपकी उत्पत्ति किसी विशेष प्रक्रिया से हुई है या फिर जो कुमार विश्वास कहते हैं प्रेम के बारे में, जब उनके मित्र और कवि सम्पत शरण जी प्रेम करने वालों का उपहास करते हैं. "जिनसे कुछ नहीं हो पाया होता है, वे ही ज्यादा "पुराण" बांचते हैं. मैंने दोस्तों से सुना है जो स्टार्टअप में काम करते हैं या कर चुके हैं, की उनकी फाउंडर्स मीटिंग में "fuck " शब्द का प्रयोग टीम पर अपनी बोस्सिसिम साबित करने के लिए या फिर अग्रेशन दिखाने के लिए या फिर टीम के अंदर सफलता के लिए 

एम्प्लोयी वेलफेयर का सुलतान, flipkart महान.

यह HR वाले करते क्या हैं? सवाल जायज है.  यह सवाल उतना ही पुराना ही जितनी की हमारी सभ्यता है. लेकिन आपके मैं यकीन दिलाना चाहता हूँ कि आईआईएम के बच्चों को शूली पर चढाने वाले HR वाले नहीं हैं. यह उनके आका IIT वाले व्यापारी हैं. अभी flipkart का IIM ऑफर फ्लिप चर्चा में है. शायद १८ ऑफर्स पर  गाज गिर रही है. मुआवज़ा है डेढ़ लाख ६ महीने बाद जब जोइनिंग होगी. इसमें भी चालाकी. आप यह तो मानेंगे , HR वाले इतने चालाक नहीं हैं. यह भी बिज़नेस आका का ही फरमान है. HR सिर्फ अंग्रेजी बोलेगा और बाकी उन्हें IIT वाले बॉसेस बताते रहेंगे कि क्या और कितना बोलना है. अब आपके पास मिलियन डॉलर वाले HR वाले हैं. HR में एक लम्बी फौज है. क्या आपको लगता है HR ने यहां कोई निर्णय लिया होगा? नहीं. उन्हें यह बता दिया गया होगा , "जोइनिंग डिले करना है, IIM को ईमेल लिख दो. बिज़नेस रीज़न बता दो. यह आदेश तो एडमिन असिस्टेंट को भी दिया जा सकता था. पर HR वाले होते किस लिए हैं. HR वालों को यह सब हैंडल करना बड़ा की सनसनी ख़ेज़ लगता है. ऐसे समय में, स्वनाम धन्य HR वाले अपने आप को बड़े काम की चीज़ समझने लगते हैं. पर जैसे की उन्हें मालू

सावधान: आगे स्टार्ट अप है, कहीं आप फंस न जाएँ .

सावधान इंडिया ! फ्लिपकार्ट ने अब IIM  और IIT वालों के जोइनिंग डेट्स निरस्त कर दिए हैं. ६ महीने के लिए. अनिश्चितता का दौर स्टार्ट उप में चल रहा है. हम तो डूबेंगे सनम, तुमको भी ले डूबेंगे ! तश्वीर साफ़ हो जाएगी अगर आप निचे की ग्राफ देखेंगे. आप पूछेंगे "कहाँ गए ये लोग?" यह तो कहानी है स्टार्ट अप की रंगीन और साहसी दुनिया की. व्यवसायी बनने  की. (Disrupt ) करने की. यूनिवर्स में डेंट लगाने की. इनके पास मौका है और इनमे काबिलियत भी है. IIM  और IIT और स्मार्ट लोग कर सकते हैं सब जो वो करना चाहते हैं पर जगह है सिलिकॉन वैली , गुरुग्राम, और बैंगलोर नहीं. स्टार्ट अप डिसरप्टिव छोड़ कर अब वैल्यूएशन के गेम में फंस गया है. ये इंजीनियर स्टार्ट अप में भी नौकरी ही कर रहे हैं. बिज़नेस की कमान तो फाउंडर्स के हाथ में है और वे ग्रेट प्रोडक्ट की जिम्मेवारी टीम के ऊपर डाल कर CEO बन जाते हैं. सेलिब्रिटी स्टेटस मिल जाता है और बिज़नेस  पीछे छूट जाता है. एम्प्लोयी disillusioned हो जाता है. वह एम्प्लोयी की तरह फिर दूसरी नौकरी ढूंढ़ता है. पुराने स्ट्रक्चर्ड MNC की याद आ जाती है.  

HR डिस्ट्रेस से गुज़र रहा है. अनन्त पीड़ा से गुज़र रहा है

HR को चाहिए आज़ादी. वक़्त है आज़ादी का. मैं कन्हैया का फैन हूँ. उनके नारों का फैन हूँ. मैं भी JNU का छात्र रहा हूँ. HR डिस्ट्रेस/यंत्रणा से गुज़र रहा है. अनन्त पीड़ा से गुज़र रहा है. कृष्ण की भूमिका से अब दास की , याचक की स्तिथि में आ गया है. पोस्टर बॉय /गर्ल अब पोस्टर के पीछे छुप गया  है. इसे चाहिए आज़ादी।  HR क्या अब सिर्फ "हारे को हरी नाम"! रह गया है? क्या सबसे ज्यादा insecure  एंड politicking  फंक्शन है यह? क्या यह यह इन्फेक्शन का श्रोत है? vulnerable भी और हेल्पलेस एंड उपेक्षित भी? इसे चाहिए आज़ादी! इसे चाहिए एक कृष्णा! भूमिका- HR का सो कॉल्ड लीडरशिप? अपनी पहचान नहीं बन सका. LinkedIn और twitter पर अपनी पहचान ढूंढ रहा है. कुछ तो बस facebook तक ही अपनी इंटेलेक्चुअल काबिलियत सीमित कर लेते हैं. वेलफेयर स्टेट का सबसे बड़ा जीता -जागता उदहारण है HR . एक छद्म कोशिश, बिज़नेस enabler , catalyst , चेंज ऐजेंट , पता नहीं, कहाँ कहाँ से ये शब्द इन सेल्फ-proclaimed लोग ले कर आये. Distress जीन्स के बाद अब समय चल रहा है डिस्ट्रेस हायरिंग का. यहां आपके रिज्यूमे का in-human, non nonsensical

नाम बड़े और दर्शन छोटे

आईआईएम कथा- झोला छाप डाक्टर (होम्योपैथिक-आयुर्वेदिक, इत्यादि) अब ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट हेड है. जिसने कभी किसी भी जाने-माने कंपनी में न काम किया, न टीचिंग , न कॉर्पोरेट का कोई अनुभव है जिसमे, उसे हम बना देते हैं, आईआईएम का ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट हेड. नाम के आगे डॉक्टर लिख लेने से आप ऐसा सोच सकते हैं की शायद Ph.D हो. आईआईएम का बेडा अब ये झोला छाप डाक्टर पार लगाएंगे. सरकारी पने की भी हद्द होती है. उनकी अंग्रेजी पढ़ लीजिये उनके लिंकेडीन पर प्लेसमेंट सम्बन्धी पोस्ट में, आप को पता लग जाएगा , क्या लेवल है. इस व्यक्ति को एक नए आईआईएम (पहला बैच) का ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट हेड कैसे बना सकते हैं. यह कोई थर्ड ग्रेड इंजीनियरिंग कॉलेज नहीं है जहां आईटी सर्विसेज कंपनी टेक सपोर्ट के लिए हायरिंग करने आती है. लोकल थिंकिंग की भी एक हद्द होती है. यहां तो यही दिख रहा है, मालिक पंजाबी, HR हेड पंजाबी, मालिक मराठी, HR हेड, मराठी, इत्यादि। नियुक्ति हो रही है या रिस्तेदारी। अब तो शादी भी बिरादरी में नहीं, बराबरी में होती होती है फिर यह प्रांतवाद क्यों, क्या इस आईआईएम में सभी प्लेसमेंट करने वाली कम्पनियाँ बंग

आवश्यकता स्कॉलर्स की है, रिसर्च एसोसिएट्स की है

सुनील सर , आपके विचार अच्छे हैं पर इनको पूरा करने के लिए मानव संसाधन विभाग की आवशयकता नहीं हैं. आवश्यकता स्कॉलर्स की है, रिसर्च एसोसिएट्स की है. कोई मानव संसाधन का संस्थान ये दोनों नहीं बनाते. सिलेबस देख लीजिये, पचरंगा आचार लगेगा. एक ऐसा पेपर दिखला दीजिये XLRI या टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंस से जो आपकी मानव संसाधन रिसर्च या स्कॉलर्स की श्रेणी में आता हो! जैसा की राम चरण ने कहा : मानव संसाधन को दो भागों में बाँट देने की जरूरत है; मानव संसाधन एडमिन और मानव संसाधन -लीडरशिप आर्गेनाईजेशन. पहला चीफ फाइनेंसियल अफसर को रिपोर्ट करे और दूसरा चीफ एग्जीक्यूटिव अफसर को. जब तक ऐसा नहीं करेंगे, मानव संसाधन विभाग सामाजिक सरोकार ही निभाता रहेगा. पेरसोंनेल मैनेजमेंट वर्कर्स के लिए कमाल का काम करता था, हेल्थ एंड सेफ्टी, क्रेच, कैंटीन, ट्रांसपोर्ट, मैनेजमेंट-वर्कर नेगोसिऎसन बाई कलेक्टिव बार्गेनिंग, अप्रेंटिसशिप मैनेजमेंट, ट्रेनिंग , इत्यादि. ये सभी १००% ROI बेस्ड थे. किसी पर्सनेल मैनेजर को कभी २ और ४ करोड़ की सैलरी नहीं मिली. आज सेलिब्रिटी HR मैनेज करते हैं, जैसा आपने कहा डी (डेवलपमेंट) मिसिंग है. फि

आंबेडकर के बाद कांशी राम और बाकी सब राम-राम.

रोहित वेमुला की जाति ज्यादा महत्वपूर्ण है या सरकारी संस्थाओं की हिटलरी? भारत में एक्सट्रीम नहीं चलता. न ही सॉफ्ट एक्सट्रीम न ही हार्ड! एक्सट्रीम सॉफ्ट एक्सटिंक्ट हो जाते हैं, और एक्सट्रीम हार्ड एक्सटिंक्ट कर दिए जाते हैं. मॉडरेट बेस्ट हैं..  भावनाएं,संवेदनाएं, उबाल, सभी हाइपरटेंशन का कारण हैं. अतिरेक बिमारी का नाम है. बैलेंस बना कर चलना होगा. आंबेडकर साहब ने नारा दिया "जाति तोड़ो, समाज जोड़ो" ६८ वर्षों के बाद भी अभी भी दलित एक्सिस्ट करते हैं, और कितने साल लगेंगे जाति तोड़ने में? जब तक रिजर्वेशन है, तब तक, जाति है, तब तक दलित जैसा शब्द है, तब तक दलित राजनितिक पार्टी है, तब तक, १५ % नंबर में आईआईटी की सीट है, तब तक, धनाढ्य दलित आईएएस के बच्चे टॉप इंस्टीटूटेस में आसानी से हैं, तब तक सरकारी नौकरी उनकी आसानी से है, तब तक प्रमोशन फटाफट है. दलित से दलित-इलीट हटाओ। सारा माल तो ये इलीट दलित मार जाते हैं.. रोहित तो मेरिट कोटा से फेलोशिप कर रहा था. क्या सिर्फ राजनीती वाले ही दलित की बात करेंगे, चाहे राजनीतिक कारण से हो? कहाँ गए वे लाखों दलित आईएएस और अन्य सरकारी बाबू? उनमें से कोई रोह