Skip to main content

Posts

Showing posts from June, 2019

क्या संतों, सन्यासियों पर प्रारब्ध लागू नहीं होता?

क्या संतों, सन्यासियों पर प्रारब्ध लागू नहीं होता? ज्योतिर्विद और संतों को भी कहते सुना है कि , नक्षत्र, ग्रह और प्रारभ्ध उनसे परे रहता है. आप का क्या मत है?  पर साधारण मनुष्य वही जीवन जीता है, जिसे, आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने कहा था: "कर्म का भोग फिर भोग का कर्म".  जब आपकी कुंडली में "डबल" दरिद्र योग हो, "भाग्यहीन योग" भी हो . ज्योतिषि भी जिन दुर्योगों से डरते हैं या फिर अपना धंधा चमकाते हैं , हम उन्हें अपनी आस्तीन और गले में लिए फिरते हैं. पर जीवन रोज़ अभिशप्त लगता है. लगता है, जीवन का सूत्र यही है: जेल, ज़मानत, बेल, परोल. पंक्चर बनाते ही ज़िन्दगी निकल जायेगी लगता है. कर्म और प्रारभ्द की सीमाएं हैं, पर जीवन का एक रहश्य है, जिसे कहते हैं, चमत्कार. अगर यह न हो तो फिर एडवेंचर नहीं हो. मुझे ईश्वर का मतलब समझ में यूँ आता है; "जो है, और जिसने आपका प्रारब्ध लिख दिया एक उद्देश्य के लिए". सुख और दुःख उस रास्ते के पड़ाव हैं, कुछ सुहाने तो कुछ भयानक. कई रास्ते भयानक पड़ावों की श्रृंखला लगती है, जहाँ अनगिनत अवरोध हैं, तो कुछ रास्ते कोमल और लुभावने