Thursday, August 26, 2021

मिल्खा रुक जा!

शारीरिक और मानसिक पीड़ा हो तो हीलिंग अनिवार्य है. वैद, डाक्टर , हस्पताल, दवाई चाहिए, सेवा चाहिए, समय , लोग,  पैसे , धैर्य सब की आवश्यकता पड़ेगी। .. इलाज़ की कई पद्धतियां हैं , जितने विद्वान उतने विधा का अवतरण। .. सब की अपनी आस्था है। . 

मनीष भाई प्रेसेंसिंग थिएटर के सीनियर संचालक , कंसलटेंट हैं. इस पद्धति में पीड़ा को चित्रित किया जाता है, जैसी पीड़ा वैसी कलाकारी के साथ चित्रण एक नाटक जैसा. लोग जीते हैं उस पीड़ा को, समझते हैं और फिर उससे उबर पाते हैं.. 

पास्ट लाइफ रिग्रेशन हो या आकाषिक रिकॉर्ड पद्धति, सभी आपकी पीड़ा का मूल ढूढ़ते हैं. केतु पास्ट लाइफ को  झलकाता है जन्मपत्रिका में, पांचवा घर आपका इंटुइशन है, सब के अलग अलग विधान हैं, सबके अलग अलग पुरोहित, पांडित्य और उससे जुड़े कई कर्मकांड। .. विधा देशी हो या विदेशी , सभी के मूल में वही खोज चल रही है, हम अस्तित्व में हैं तो पीड़ा की वजह भी वही अस्तित्व है, विधि का विधान है, जन्म, कर्म, जरा , मृत्यु और फिर वही चक्र. भोग का कर्म, फिर कर्म का भोग , यही चक्र है. 

शारीरिक, मानसिक बीमारी याद दिलाते हैं, आपका कर्मा है, भोगिए, 

कल मनीष भाई ने एक सुन्दर लेख लिखा , जहां उन्होंने मिल्खा सिंह की रोम ओलिंपिक में पदक चूक जाने का ज़िक्र किया, कहानी वही है  जो फरहान अख्तर की बॉलीवुड फिल्म  "भाग मिल्खा भाग " में आप देख चुके हैं... 

दर्द में गज़ब की चुम्बकीय शक्ति होती है. कहानीकार प्रेमचंद ने कहा हैं, "दुःख मांजता है". दुःख कभी नहीं मिटता , वह पत्थर की लकीर है , जब भी हाथ फेरेंगे, उसका स्पर्श होगा। 

क्या इस दर्द को हम अपने चित्त से मिटा सकते हैं? शायद नहीं, और अब तो नया मनोविज्ञान कहता है, दुःख को जीन सीखो, पीना सीखो दर्द को, 

क्या अरुणा अपना दर्दनाक, खौफनाक, बलात्कार मरते दम तक भूल पायी थी? 

उसका बलात्कारी, जो अभी भी ज़िंदा है। .... क्या उसे कोई दर्द है, कभी था? 




क्या कोई विधा इस दर्द को मिटा सका? अरुणा के पास कोई चारा भी नहीं था। .. बस दर्द को हर पल जीना। .. ४२ साल तक उन्होंने जिया अपना दर्द. ...क्रूर भाषा में इसे vegetative स्टेट में रहना कहते हैं. 

क्या कोई मिटा सकता है निर्भया का दर्द? क्या कोई मिटा सकता है असंख्य लोगों का दर्द, जो राजनैतिक, धार्मिक उन्मादों में कुचले गए, कंसंट्रेशन कैंप, होलोकॉस्ट और पता नहीं  क्या क्या.  फांसी मिली गुनहगारों को। . 

किसका दर्द मिटा इससे? जीना पड़ता है इस दर्द को लेकर. 


दर्द को अगर अपना हथियार बना सके तो बेहतर है... 

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बनो तो गंगाबाई बनो , कोई महात्मा गाँधी से कम नहीं, कोई ज्योतिबा फुले से कम नहीं, 

मलाला बनो, ग्रेटा थुरंबर्ग  बनो या फिर बना दिए जाओगे. अपना आदर्श खुद चुनो. 


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