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Showing posts from November, 2019

किताब का नाम है; "ट्रेडिंग आर्मर विथ अ फ्लावर-राइज ऑफ़ न्यू मैस्कुलिन"

मनीष  भाई ने एक जबरदस्त किताब लिखी है. किताब का नाम है;  "ट्रेडिंग आर्मर विथ अ फ्लावर-राइज ऑफ़  न्यू  मैस्कुलिन"  . जाहिर है किताब का नाम अंग्रेजी में है तो किताब भी अंग्रेजी में ही है. और हम हैं कि इसकी ' समालोचना ' लिख रहे हैं रिव्यु नहीं. हमने मास्टर्स की पढ़ाई साथ-साथ की थी सो थोड़ा सानिध्य प्राप्त हुआ इनका. इस व्यक्ति में जादू है. रितिक रोशन वाला नहीं। वह एलियन है भाई, यह इंसान अपने आप में एक पूरा रंगमंच हैं. दरअसल मनीष ने लिखी तो अपनी दीवानगी की कथा और व्यथा है जो मुकम्मल हुई है इस किताब में, परन्तु, अब यह पाठक पर है की वह इसे फिक्शन समझे या नॉन-फिक्शन. लेखक (या कवि ?) इस किस्म का कोई क्लेम नहीं करता.  आगे बढ़ते हैं. राहत फतह अली साहब का एक गाना है,  " ज़रूरी था " . और ग़ज़ल की कुछ पक्तियां यूँ हैं. :  "मिली हैं मंज़िलें फिर भी  मुसाफिर थे मुसाफिर हैं  तेरे दिल के निकाले हम  कहाँ भटके कहाँ पहुंचे  मगर भटके तो याद आया  भटकना भी ज़रूरी था".  कम शब्दों में अगर कहें तो इस किताब का मज़मून यह कुछ ग़ज़ल की पंक्तियाँ हैं जो ऊपर लिखी हैं.