Tuesday, November 2, 2021

समस्त विश्व की चिंता टूल-किट में क़ैद है. षड्यंत्रों के जाल में फँसी अपनी एक एक साँस को तड़फड़ाती..

क्या नौकरी करना कठिन होता जा रहा है? क्यों लोग रिजाइन कर रहे हैं? क्या यह इसलिए तो नहीं कि अब गंध आ रही है गंदे लोगों से जो किसी षड़यंत्र का सहारा लेकर नौकरियों में भरते चले गए, जातिवाद, प्रांतवाद, कई अन्य कारण रहे ? अच्छे लोग नौकरी छोड़ रहे हैं, क्यूंकि वे अपना काम , मतलब का काम करना चाह  रहे हैं? क्या वे लोग नौकरी छोड़ रहे हैं, जिनका मन अघा गया है, काम करके, समझौते करके, तिजोरियां भर भर के? सब के अलग अलग कारण हैं. पाप का घड़ा भरता है समय समय पर न्याय होता रहता है , या यूँ कहें कि सल्तनत के बाद मुग़ल फिर अँगरेज़ शाशन करते हैं, फिर इतालियन, फिलहाल गुजरात से नए शाशक देश चला रहे हैं। . 



कलयुग का कुचक्र. यहां कोई ईश्वर नहीं है, यहां सिर्फ राक्षस सत्ताधीश हैं, सर्वत्र. चालबाज़, मौका परस्त, शोषक। देवों का समय तो कब का समाप्त हो चुका। . देव अब सिर्फ मंदिरों की शोभा बढ़ाते हैं, अपने भिन्न भिन्न रूपों में. 

जीने की उम्मीद क्षीण होती जा रही है. यह समस्त विश्व में छाया हुआ एक अंधेरा है...

उम्मीद की नयी किरण? पता नहीं पर जब अँधेरा गहरा छाया हो तो उम्मीद की कोई किरण फूटती ही है, देर सबेर। 

हर कोई अपना अस्तित्व छुपा बैठा है. जो चेहरे हम देखते हैं, वे छद्म हैं. लोग इतनी अच्छी नक़ल कैसे कर लेते हैं.. अपना सही रूप दिखाना जैसे पाप हो.. बहरूपिये। .हम सभी बहरूपिये हैं. ऐसी भय आच्छादित जीवन जीने का क्या फायदा? 

समस्त विश्व की चिंता टूल-किट में क़ैद है. षड्यंत्रों के जाल में फँसी अपनी एक एक सांस को तड़फड़ाती.. 



पर्सनल चिंता ऐसी जैसे अस्तित्व का शंकट आ गया हो. 

दूसरों के दुखः से हम अब दुखी नहीं होते, अपनी चिंता के अभिभूत हम अपने आस पास के लोगों के प्रति भी अपनी संवेदनाओं की आहूति दे बैठे हैं. 

हर सुबह याद दिलाती है; कुछ भी तो नहीं बदला.. आज भी वही षंडयंत्र सहना, करना है.. 

एक अर्थहीन क्षद्म जीवन की परिणति होती है, अपने हितों की चिंता से शुरू और अंत तक उसके ही पाश में , मोह में उलझकर. 

अब सहारे , संवेदनाएं, उम्मीदें , भरोसे, सब बिकाऊ हैं. सब उसी षड़यंत्र के हिस्से हैं.. 

अब हम जश्नों में नहीं, बाज़ारों में बिकते चकाचौंध में बहके बहके , कुछ डरे सहमे, कुछ सकते में से गुज़र जाते हैं, हर एक पल जो कभी अपने व्यक्तिगत आकांछाओं की प्रतिछवि से लगते थे, अब, तिलस्म से लगते है. 

शायद मैं , थक गया हूँ.. उम्मीद भी कम हो गयी है.. हर पल बस बीतता सा लगता है, घिसट कर, कोई रोमांच नहीं है, इसकी कोई चाह भी नहीं, अंदर ही अंदर कुछ ढूंढ़ता सा है इंसान , शायद इस तिलस्म का एंटीडोट। 


Friday, October 29, 2021

प्रारब्ध अर्थात दुर्भाग्य? ईश्वर बेनक़ाब !

प्रारब्ध,  कर्मा,  डेस्टिनी, फेट,  सभी शब्दों के मायने एक से हैं, मतलब दुर्भाग्य ! कभी सुना है किसी को इन शब्दों के साथ सौभाग्य की चर्चा करते हुए?  मैंने नहीं सुना. 
दिलचस्प बात है संचित कर्म हैं तो प्रारब्ध भी बनेगा.. 
आज एक ह्रदय विदारक सूचना मिली. एक जान पहचान की महिला, जो सिंगल मदर हैं, ने अपने एक मात्र 9 वर्षीय पुत्र को कल ही डेंगू के कारण खो दिया.. उसके जीने की वज़ह ईश्वर ने छीन ली.. एक माँ का यह दर्द विष्णु की सैया को हिला पाए न पाए पर उसने हम सब को काठ सा बना दिया है.. स्तब्ध,  निस्तेज़, मृत.. अकल्पनीय है यह सोच पाना कि ईश्वर इतना निर्दयी भी हो सकता है.. 

जब अभिमन्यु का पुत्र जो मृत पैदा हुआ था,  इसी ईश्वर कृष्ण ने उसे जीवित कर दिया था.. आज कृष्ण कहाँ हैं?  
हम सभी को अपना दर्द मामूली लगने लगा इस भीषण दर्द के आगे.. उस माँ की दशा सोच सिहर जाता हूँ.. 
शायद इससे बड़ी विभीषिका की कल्पना भी कोई नहीं कर सकता.. 
एक माँ अब कैसे जीएगी?  क्यूँ इतना अन्याय?  
कोरोना ने कई बच्चों को अनाथ कर दिया है.. क्या उनका दुःख कोई बाँट सकता है? शायद ऐसी कोई माँ. 

मैं आज काफी दर्द में हूँ.. 
सुना था दुःख माँजता है पर ऐसा दुःख कलेजे में गहरा खंज़र है.. जो न जीने देगा, न मरने.. 
ईश्वर इतना दुःख आप संचित कर्म के हिसाब से देते हो न,  फिर तुम्हारा नर्क कहाँ है? क्यूँ नहीं वहीँ इनको तेज़ाब के समुन्दर में जला देते?  क्यूँ छल करते हो नया जीवन देकर,  पुरानी स्मृति छीनकर, नए सपने देकर?  यह तो धोखा है.. 
तुम्हारा कोई नर्क नहीं है और स्वर्ग भी वैसा ही सफ़ेद झूठ.. 
ये फिर बता तो स्वर्ग नर्क सब इसी दुनिया में है.. 
मुझे तो तुम्हारा संचित कर्म और प्रारब्ध सब प्रपंच और पाखंड लगते हैं.. 
तुम्हारी इच्छा के विरुद्ध तो पत्ता नहीं हिलता, फिर कोई पाप कर्म कैसे कर लेगा?  
अच्छी कहानी फैला रखी है आपने प्रभु.. 
आपकी लीला अपरंपार.. 

Monday, September 13, 2021

१२वें घर से आज़ादी

 १२वें घर से आज़ादी ! इस अजीब से शीर्षक से आप कन्फूज़ हो गए क्या? 

कुंडली का १२वां घर मुक्ति का घर है, जन्म-मृत्यु के कुचक्र से आज़ादी का ! 

अब इस घर को समझते हैं, यह घर किस राशि का है, उसका स्वामी कौन हैं , उसके साथ कौन हैं, वह किस राशि में बैठा है, उसपर और उसके १२वें घर पर किसकी दृष्टि है, इत्यादि. सब तय करेंगे कि आप की सज़ा कैसी होगी, किन कर्मों में आपका इस्तेमाल होगा और कहाँ आप सजा जैसा महसूस करेंगे. १२वां घर कोई रिवॉर्ड नहीं है. बचा काम है, पूर्व कर्म का निदान है, भूल-चूक- लेनी-देनी ! मुक्ति का स्थान,  आसानी से नहीं छोड़ेगा.. 

अब आते हैं अपने/मेरे १२वें घर पर, यहां मेष राशि है. इसका स्वामी तीसरे घर में है , नीच का और अस्त भी, सूर्य और अपने शत्रु बुध के साथ. १२वें में शनि है, नीच का और २९ डिग्री पर. न्याय के देवता , न्याय (अंतिम न्याय) के घर में हैं, उनपर गुरु की दृष्टि है, अर्थ है, न्याय तो पूर्व कर्मों का खूब होगा. और न्याय घर से ही शुरू होगा, मतलब, शनि पहले अपने घरों का न्याय करेंगे; यानि, भाग्यभाव और कर्म भाव का. वहाँ आपकी बजा -बजा के ली जायेगी. दूसरा न्याय , १२वें घर के स्वामी भी करेंगे. अब तो वे नीच के और अस्त भी हैं, अब उनका घर रहा सातवां भी. पार्टनरशिप, विवाह और व्यापार पर भी मुश्किलें. वैसे भी मंगल कारक हैं ; भूमि, भवन, वाहन के, इनकी भी ली जायेगी. सो ली गयी. भूमि, भवन, वाहन, सब से वंचित.

अब पर गुरु की भी दृष्टि हो तो फिर, दोनों प्रकार की सजा मिलेगी. यानी, पहले कड़ी सजा , फिर न्याय भी गुरु की कृपा भी. यानी , सभी कड़ी सजा पूरी होने के बाद न्याय भी मिलेगा, गुरु अपना फल भी देंगे, यानि, अचानक लाभ, विदेशों से लाभ, विदेशों से ज्ञान, विदेशों से ख्याति, विदेशों से ज्ञान का संपर्क. शायद सुखद अंत. हैप्पी एंडिंग.

किसी महान ज्योतिषी ने कहा था, मेरी कुंडली में पूर्व जन्म का काफी कर्मा है, और चुकि गुरु ६ठे में बैठे हैं तो आप बच नहीं सकते. कोई दवा, तंत्र, ताबीज़ काम नहीं करेगी. भोगना पड़ेगा. मुझे लगता है, ५१ साल हो गए, काफी भोग लिए हैं अब तक. अब तो कम दो कष्ट/ .. अब आगे शनि की साढ़े साती है, जो अप्रैल  २०२२  से दुसरे चरण में चलेगी, कर्मभाव से.. तो शायद कुछ रहत मिले. तब फिर गुरु भी साथ होंगे शनि महाराज के दशम में। . 

राहु महाराज भी २०२२ में अप्रैल में १२ वे में होंगे. मेरे विचार से, १२ वां भाव विदेश का है और राहु भी विदेश को दर्शाता है, तो क्या विदेश के अवसर मिलेंगे अगले साल? 

सजा कब तक चलती रहेगी, पता नहीं पर शनि महाराज मकर से निकलें तभी कुछ नरम होंगे, देखिये क्या होता है. 

अब यदि, दुसरे किसी व्यक्ति की कुंडली देखें १२वें भाव से तो क्या मिलता है? शनि , शुक्र, सूर्य और बुध यदि १२वें में हों , कर्क में और चन्द्रमाँ लग्न में हो मंगल के साथ।  क्या सजा होगी? गुरू दशम में हैं. 

ऊपर के सिद्धांत से, शनि पहले अपने घरों का न्याय  देंगे: ६ठे और सातवें का..यानी, रोज़ का काम , काफी करना पड़ेगा, रोग, ऋण, शत्रु से भी भय और उसका हिसाब देना होगा, शनि और गुरु, दोनों की द्दृष्टियाँ छठे घर पर हैं , सो मामला बैलेंस होगा, दोनों अच्छा फल देंगे. सूर्य और चंद्र का राशि परिवर्तन भी है, सो दोनों अच्छे फल देंगे. सूर्य लग्न का स्वामी है और चंद्र खर्चों का. चंद्र अपने घर से दुसरे में है सो धन लाभ देगा, सूर्य अपने घर से १२ वे में है सो खर्चे बढ़ाएगा पर चंद्र धन देते रहने को होगा बाध्य क्योंकि डिस्पोसिटोर हैं एक दुसरे के. सपोर्ट तो करना ही पड़ेगा. शुक्र १२वें में, विलासिता में खर्च , बुध १२ वे में , बच्चों में, शेयर मार्किट में खर्च। . बुध अपने घर से दुसरे और ग्यारवें  में बैठा है, आमदनी का स्वामी खर्चे के घर में, इन्वेस्टमेंट के घर में और हानि के घर में... इन्वेस्टमेंट कुछ ख़राब भी होंगे. धन भाव का भी स्वामी बुध है तो इन्वेस्टमेंट, इनकम और धन सभी एक दुसरे का साथ देंगे. धन अर्जन कर्मा है, विलासिता और निवेश कर्मा है, शरीर की छति कर्मा है. मुक्ति मिलेगी धन कमाने से, धन संचय से, विलासिता में खर्च से, योगकारक मंगल लग्न में चंद्र के साथ, सुख भाव, पत्नी एवं व्यापार भाव, और मृत्यु भाव, विदेश भाव, आध्यात्म भाव, को दृष्टि दे रहे हैं, सुख भाव उनकी अपनी राशि है, अष्टम भाव स्वामी गुरु दशम में हैं. यानी करियर का विदेशों से जुड़ना या अचानक परिवर्तन और लाभ संभव है परन्तु, दोनों ही ज्ञान से सम्बंधित होंगे. दोनों ही कामों में जातक निष्ठां पूर्वक काम करेगा. वृष राशि में गुरु ज्ञान को प्रैक्टिकल स्वरुप देंगे. 

कैसा लगा आपको यह विश्लेषण,  बताइयेगा कमेंट में.. 


Thursday, August 26, 2021

मिल्खा रुक जा!

शारीरिक और मानसिक पीड़ा हो तो हीलिंग अनिवार्य है. वैद, डाक्टर , हस्पताल, दवाई चाहिए, सेवा चाहिए, समय , लोग,  पैसे , धैर्य सब की आवश्यकता पड़ेगी। .. इलाज़ की कई पद्धतियां हैं , जितने विद्वान उतने विधा का अवतरण। .. सब की अपनी आस्था है। . 

मनीष भाई प्रेसेंसिंग थिएटर के सीनियर संचालक , कंसलटेंट हैं. इस पद्धति में पीड़ा को चित्रित किया जाता है, जैसी पीड़ा वैसी कलाकारी के साथ चित्रण एक नाटक जैसा. लोग जीते हैं उस पीड़ा को, समझते हैं और फिर उससे उबर पाते हैं.. 

पास्ट लाइफ रिग्रेशन हो या आकाषिक रिकॉर्ड पद्धति, सभी आपकी पीड़ा का मूल ढूढ़ते हैं. केतु पास्ट लाइफ को  झलकाता है जन्मपत्रिका में, पांचवा घर आपका इंटुइशन है, सब के अलग अलग विधान हैं, सबके अलग अलग पुरोहित, पांडित्य और उससे जुड़े कई कर्मकांड। .. विधा देशी हो या विदेशी , सभी के मूल में वही खोज चल रही है, हम अस्तित्व में हैं तो पीड़ा की वजह भी वही अस्तित्व है, विधि का विधान है, जन्म, कर्म, जरा , मृत्यु और फिर वही चक्र. भोग का कर्म, फिर कर्म का भोग , यही चक्र है. 

शारीरिक, मानसिक बीमारी याद दिलाते हैं, आपका कर्मा है, भोगिए, 

कल मनीष भाई ने एक सुन्दर लेख लिखा , जहां उन्होंने मिल्खा सिंह की रोम ओलिंपिक में पदक चूक जाने का ज़िक्र किया, कहानी वही है  जो फरहान अख्तर की बॉलीवुड फिल्म  "भाग मिल्खा भाग " में आप देख चुके हैं... 

दर्द में गज़ब की चुम्बकीय शक्ति होती है. कहानीकार प्रेमचंद ने कहा हैं, "दुःख मांजता है". दुःख कभी नहीं मिटता , वह पत्थर की लकीर है , जब भी हाथ फेरेंगे, उसका स्पर्श होगा। 

क्या इस दर्द को हम अपने चित्त से मिटा सकते हैं? शायद नहीं, और अब तो नया मनोविज्ञान कहता है, दुःख को जीन सीखो, पीना सीखो दर्द को, 

क्या अरुणा अपना दर्दनाक, खौफनाक, बलात्कार मरते दम तक भूल पायी थी? 

उसका बलात्कारी, जो अभी भी ज़िंदा है। .... क्या उसे कोई दर्द है, कभी था? 




क्या कोई विधा इस दर्द को मिटा सका? अरुणा के पास कोई चारा भी नहीं था। .. बस दर्द को हर पल जीना। .. ४२ साल तक उन्होंने जिया अपना दर्द. ...क्रूर भाषा में इसे vegetative स्टेट में रहना कहते हैं. 

क्या कोई मिटा सकता है निर्भया का दर्द? क्या कोई मिटा सकता है असंख्य लोगों का दर्द, जो राजनैतिक, धार्मिक उन्मादों में कुचले गए, कंसंट्रेशन कैंप, होलोकॉस्ट और पता नहीं  क्या क्या.  फांसी मिली गुनहगारों को। . 

किसका दर्द मिटा इससे? जीना पड़ता है इस दर्द को लेकर. 


दर्द को अगर अपना हथियार बना सके तो बेहतर है... 

500 रुपए में पति ने बेचा, डॉन को बांधी राखी, जाने  कौन है 'गंगूबाई काठियावाड़ी'

बनो तो गंगाबाई बनो , कोई महात्मा गाँधी से कम नहीं, कोई ज्योतिबा फुले से कम नहीं, 

मलाला बनो, ग्रेटा थुरंबर्ग  बनो या फिर बना दिए जाओगे. अपना आदर्श खुद चुनो. 


Tuesday, July 27, 2021

यह डाइवर्सिटी क्या बला है ? बहरूपिया

यह डाइवर्सिटी क्या बला है ? 

याद कीजिये आपने यह जुमला पहली बार कब सुना था!

मैंने पहली बार इसे सुना था जब एक इन्वेस्टमेंट कंसलटेंट इन्वेस्ट करने में कुछ गुर बता रहा था ; पोर्टफोलियो क्या है, कैसे फण्ड डाइवर्सिफाई करें, इत्यादि। . यहां डाइवर्सिटी का अर्थ है रिस्क कम करना. यह इन्वेस्टमेंट की दुनिया है. दूसरी बार डाइवर्सिटी सुना एथनिक डाइवर्सिटी के अर्थ में; जातीय समीकरण, मुस्लिम-यादव बिहार में, तुत्सी-हुतु रवांडा में, आइसिस -येज़दी सीरिया में , मीम-भीम उत्तर प्रदेश में, इत्यादि ! 

देश में २०२१ की जनगणना हो रही है! नितीश कुमार जो बिहार के मुख्यमंत्री हैं, ने इस बार जातीय आधार पर जनगणना की मांग की है. जायज़ है. किसी को नहीं पता पश्चिम बंगाल में कितने प्रतिशत मुस्लिम हैं, रोहिंग्या, बांग्लादेशी सभी जोड़कर देखे तो शायद ३५%... ऐसा कई अनाधिकारिक सूत्र बताते हैं. 

मामला जब सत्ता का हो तब डाइवर्सिटी का अर्थ होता है, समीकरण, ध्रुवीकरण (Polarization ), वोट बैंक इत्यादि. 

जब डाइवर्सिटी की बात कंपनी के अंदर हो तब बात होती है महिला संवर्धन -संरक्षण, ब्लैक लाइफ मैटर्स, लैंगिक और समलैंगिक राइट्स मैटर , एलजीबीटी राइट्स मैटर , सेक्सुअल प्रैफरेंसेज ; जैसे लेस्बियन, गे, बाई सेक्सुअल, मेट्रोसेक्सुअल , पैन सेक्सुअल इत्यादि ! इसमें कई लोग शुगर डैडी, शुगर मोम्मा , बीडीएसएम (BDSM ) ,मिल्फ  , दिलफ (MILF/DILF) इत्यादि को भी शामिल करने की मांग कर रहे हैं. 

गाँधी के ब्रह्मचर्य से बीडीएसएम तक का सफर , मानव समाज के उत्थान और लिबरेशन की दिशा में महत्वपूर्ण पड़ाव हैं. ऊबर के सीईओ दारा खुश्रावसहि की बेटी ने अपने कहा की वे समलैंगिक हैं , तब दारा ने कहा; "आज समलैंगिकता के लिए, हम सबसे अच्छे समय में जी रहे हैं! "

कंपनी डाइवर्सिटी बनाने के अपने मिशन पर चल पड़ी है; इसके लिए अभी पहले पायदान पर समानता के नए कीर्तिमान हासिल हुए हैं. कंपनी सभी जगह महिलाओं को आरक्षण देकर भरा रही है.. कई रिपोर्ट्स ने कहा है कि , उन सभी कंपनियों ने आर्थिक कीर्तिमान बनाये हैं जहां बोर्ड में और उच्च पदों पर महिलाओं की संख्या पुरुषों के सामान या लगभग बराबर है. 

आसानी से महिलाओं को स्थापित करने वाले कई पद हैं, जैसे एचआर , मार्केटिंग, मीडिया एंड कम्युनिकेशन, कई ऑपरेशन्स के रोल। ..सबसे ज्यादा एच आर ने आंदोलन को सफल बनाने में बलिदान दिया है.. लगभग तीन -चौथाई एच आर के पद महिलाओं को युद्ध स्तर पर दिए गए। ..पुरुष समाज, मुसलमानों की तरह भारत में डरा हुआ है. डर का माहौल है. 

पीपल मैटर मैगज़ीन , अपने आका एस्टर मार्टिनेज़ के सफल नेतृत्व में, इस सामाजिक न्याय के आंदोलन में तालिबान की भूमिका निभा रहा है. इसमें कुल पुरुषों की संख्या गिनिए ! २०१९ और २०२० में सिर्फ एक मर्द (या कुछ और?) 

अब आते हैं कि डाइवर्सिटी होता क्या है; डाइवर्सिटी होता है, अपने मित्रों, जात- भाइयों, ब्राह्मणों, बीफ चिली के शौकीनों इत्यादि को अपनी कंपनी में पीछे के रस्ते भरते जाना। .. क्षमा कीजियेगा... यह तो सामाजिक न्याय नहीं परिवारवाद, वंशवाद, नेपोटिस्म, क्लब कल्चर बनाने जैस हो गया। .पर यह होता रहा है, इसने सारे डेमोग्राफिक समीकरण को विषाक्त कर दिया है!  पिछले २० वर्षों में. कॉर्पोरटे एक गंदे नाले की तरह बदबू देता है.. हर एक दुसरे का रिस्तेदार है... रोहिंग्या की तरह यह बस गए कंपनियों में... 

अब डाइवर्सिटी बनाना मुश्किल है.. पर वसीम बरेलवी का शेर है; 

उसूलों पे जहाँ आँच आये टकराना ज़रूरी है
जो ज़िन्दा हों तो फिर ज़िन्दा नज़र आना ज़रूरी है

नई उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये
कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है

इसके सामने ें बड़ी समस्या है; "अच्छा इंसान" , यह एक स्लीपर सेल की तरह है, जो कंपनी में सोता रहता है.. स्वांग करता है अच्छे एम्प्लोयी होने का: बहरूपिया , जो कंपनियों में सदियों से बसा है; वह गाँधी के बंदरों की तरह अपनी आँख, मुँह, और कान ढक रखा है! दुनिया की अच्छाई -बुराई से उसने नज़र बचा रखा है. वह वही बोलता, देखता , सुनता है, जो उसका मदारी उसे कहता है... कॉर्पोरेट के एक गंदले (Muddied )और असमंजस से भरे दौर में हैं हम सब... तालाब अब एक जलजले से से ही साफ़ होगा. वाटर केनन क्या ही कुछ उखाड़ लेंगे इसका. 

उम्मीद की किरण अगर कही दिखती है तो वह ें आंदोलन जो इस विषाक्त डाइवर्सिटी की कड़ी मुखालफत करे. 

पीपल मैटर जैसे मागज़ीन को काउंटर करें और इस वोक के खिलाफ हम मुखर हों... 

कंपनियों में गवर्नेंस वोक के गिरफ्त में है.. पश्चिमी गोरखधंदा ! 

अगर इसे नेह रोका गया तो यह चरस बो-बो कर नस्लें समाप्त कर देंगे. 

मीटू (MeeToo ) से इसकी खतरनाक शुरुआत हुई थी. ..हमें ठंढे दिमाग से इसका मुकाबला करना है. 

बाल ठाकरे से एक पत्रकार ने इंटरव्यू में पुछा था; क्या बाबरी मस्जिद ढहाने में आप भी हाथ है तो उन्होंने कहा था; मेरा तो पैर भी है.! 

तो लगाइये ज़ोर ! इंशाअल्लाह हम होंगे क़ामयाब ! 




Tuesday, April 27, 2021

लज़्ज़ानिवारण के लिए मखमली आवरण

काहे कि कल से बैंगलोर में लॉकडाउन है। .. दो हफ्ते का फिर से घर पर विश्राम। . 

HRBP (जिनका नाम नित बदलता रहता है) कुछ कंपनी इसको पीपल पार्टनर कह रही है... मोटी  सैलरी पचाने के लिए मोटी चमड़ी भर काफी नहीं है.. आपको लज़्ज़ानिवारण  के लिए मखमली आवरण (अंग्रेज़ी में facade )भी चाहिए। ..सो सीरत बदले न बदले , नाम बदलते रहिये.. 

एक बात तो इनकी माननी पड़ेगी, इन्होने स्वीकार कर लिया है कि "बिज़नेस" इनके बूते का नहीं है सो नाम रख कर अपने आप को रोज़ शर्मिदा क्यों करें. "पीपल पार्टनर" सरल है... 

इन पीपल पार्टनर्स के लिए गैंग्स ऑफ़ वास्सेय्पुर का यह सुपरिचित डायलॉग  प्रस्तुत कर रहा हूँ... लॉकडाउन में चखना जैसा काम करता है.. 



आपको नीचे JP की जगह PP (पीपल पार्टनर) पढ़ना है.. .. 

चलते चलते बता दूँ कि यहाँ RS (रामाधीर सिंह ) बिज़नेस लीडर है। ..जिसके बार बार प्रताड़ित , लज़्ज़ित किये जाने के बाद CHRO ने HRBP का नाम बदलकर "People Partner कर दिया है.. 

RS (to JP): Tum apni bhavnaaon ko daalo apni gaa#d me. Saala yahaan baithe baithe chhutwaiyaa netaaon, chhote chhote bachchon ki tarah netaa-giri karte ho. Abe apne ksetra me jaao thoda motivation do logo ko. Au kal raat ko kahaan the.

JP: Sinema dekhe.

RS: Kaun sa sinema.

JP: Dilwaale dulhaniya Le Jaaeynge.

RS: Beta tumse naa ho paayega, tumhaare lakshan bilkul thik nahi lag rahe.

यह  छोटी सी प्रस्तुति उन सब बंधुओं को समर्पित है जिनको HRBP की हक़ीक़त मालूम है.. ... 

इस प्रस्तुति में  किसी की  भावनाओं को ठेस पहुँचाने का कोई कुत्सित प्रयास नहीं किये गया है... 

जाने अनजाने में कोई गलती हुई हो तो मैं क्षमा मांगता हूँ.. (यह मैंने अभी PM मोदी के CM Covid कांफ्रेंस में, स्वनामधन्य अरविन्द केजरीवाल  जी की माफ़ी मांगने  की कला से प्रेरणा लेकर सीखा है. )


Sunday, April 25, 2021

प्राथमिकताएं निर्धारित हैं..

आगे बड़ी लड़ाई है... चीन ने लंका लगाई है... मिलियन लाशे बिछाई हैं. ... विश्व युद्ध नहीं बस , यह प्रलय है... 

आईसीयू , वेंटीलेटर, ऑक्सीजन... हस्पताल का बेड। .. प्राथमिकताएं निर्धारित हैं... 

कब थमेगा यह युद्ध? कोई नहीं जानता। ... जब तक बचे तब तक लड़े। ... जब तक लड़े तब तक बचे. ...प्राथमिकताएं निर्धारित हैं.  

पहले बुखार मापते थे , अब ऑक्सीजन। ... प्राथमिकताएं निर्धारित हैं..

...कोविड के म्यूटेंट्स ने व्यथा बढ़ाई है... हर देश का अपना वैरिएंट है.. लोकलाइजेशन का स्पश्ट उदाहरण है.. 

...जांच , वैक्सीन, फिर कोविड  , फिर रेमडेसिविएर। ....कहाँ फंसा है विश्व। ..विकल समस्त जन संकुल. 

देश फंसा चुनावों में... टीवी डिबेट कुल कलंक प्रतिभाओं में... नाच रहे यमराज गलियों में... सब जन मन बंद हैं किल्लिओं में. ...प्राथमिकताएं निर्धारित हैं..

नाक मुँह में ठूँसे तिनके.. ..कपडे कई बंधवाये हैं... फिर बुद्ध याद आ गए  हैं. "वह घर ढूंढ कर बतलाओ जिसका कोई खोया न हो इस कोविड में।" 


..जल बिन मछली की कविता हम मनुस्य जनों पर विपदा बन कर छाई है... 


पोलियो कालरा, हैज़ा, मलेरिआ , डेंगू सभी शर्माए हैं... काल काल को खंडित करते ,...सबके दद्दा आये हैं. 


🐐 “बकरे की अम्मा कब तक ख़ैर मनाएगी?”

कॉर्पोरेट जंगल की एक लघु कथा, जिसमें किस्मत करवट लेती है और रिक्रूटर नटराज बन जाते हैं कॉर्पोरेट दुनिया में हर किसी की एक एक्सपायरी डेट हो...