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बकरे की अम्मा कब तक खैर मनाएगी



कॉर्पोरेट दुनिया में एक पुरानी कहावत बड़ी सटीक बैठती है — “बकरे की अम्मा कब तक खैर मनाएगी।”

कल एक पुराने सहकर्मी का फोन आया। आवाज में हल्की सी थकान और थोड़ी सी हंसी मिली हुई थी। कंपनी ने आखिरकार उन्हें PIP (Performance Improvement Plan) की पवित्र अग्नि से गुजारने के बाद गार्डन लीव पर भेज दिया है।

११ मई तक की सैलरी कंपनी देती रहेगी, लेकिन अब ऑफिस आने की ज़रूरत नहीं है।
कॉर्पोरेट भाषा में इसे कहते हैं — “सम्मानपूर्वक विदाई”

चार साल तक करियर अखंड सौभाग्यवती की तरह चलता रहा।
लेकिन कॉर्पोरेट विवाह भी आखिरकार कभी-न-कभी तलाक की दहलीज़ तक पहुँच ही जाता है।

इस सीनियर रिक्रूटर को अब नई नौकरी ढूँढनी पड़ेगी।

दिलचस्प बात यह है कि उनकी पिछली चार नौकरियों में एंट्री एक ही पुराने बॉस की कृपा से हुई थी।
कॉर्पोरेट दुनिया में इसे नेटवर्किंग कहते हैं, जबकि आम भाषा में इसे जुगाड़ कहा जाता है।

पर इस बार समस्या यह है कि वही बॉस खुद नौकरी से बाहर हैं।

इसलिए मैंने ईश्वर से प्रार्थना की —
पहले अनीश भाई को नौकरी मिल जाए, ताकि वे वैभव भाई को फिर से नौकरी ऑफर कर सकें।

आप भी “आमीन” कह दीजिए।

कॉर्पोरेट जीवन का असली कौशल सिर्फ काम करना नहीं है।
असल कला है — कंपनी के कल्चर को समझना, उसे नेविगेट करना और उसमें सर्वाइव करना

कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनका डीएनए उस कल्चर से पूरी तरह मैच कर जाता है।
वे लोग वर्षों तक सुरक्षित रहते हैं।
बाकी लोग समय-समय पर कॉर्पोरेट इकोसिस्टम के प्राकृतिक चयन का हिस्सा बन जाते हैं।

जब मैं 2023 तक इसी कंपनी में रिक्रूटर था, तब कुल 35 रिक्रूटर हुआ करते थे।
आज 14 रह गए हैं, और फिर भी कंपनी का काम मजे से चल रहा है।

इससे एक पुराना कॉर्पोरेट रहस्य उजागर होता है —
कई बार संगठन काम से नहीं, आदत से लोगों को ढोते रहते हैं।

इस कंपनी की एक बड़ी दिलचस्प “समाजवादी” व्यवस्था भी है।

यहाँ ₹5 लाख सालाना कमाने वाला रिक्रूटर और ₹1.5 करोड़ सालाना कमाने वाला रिक्रूटर, दोनों लगभग एक जैसा ही काम करते हैं।

अंतर सिर्फ इतना है कि एक को अनुभव कहते हैं और दूसरे को कॉस्ट सेंटर

मैं हमेशा कहता हूँ —
लोग अपनी किस्मत का खाते हैं और कंपनियाँ अपने कर्मों का फल भोगती हैं।

अगर कंपनी के कर्म अच्छे नहीं हैं, तो उसे अक्सर परजीवी कर्मचारी मिलते रहते हैं।

और अगर किस्मत मेहरबान हो जाए तो कभी-कभी कोई नटराज भी मिल जाता है जो सबको चौंका देता है।

इसलिए फिलहाल हम दुआ करेंगे कि वैभव भाई को जल्द नौकरी मिल जाए

क्योंकि कॉर्पोरेट जीवन का चक्र बड़ा दिलचस्प होता है।

आज वैभव बाहर है।
कल अनीश बाहर होगा।
परसों कोई नया मैनेजर आएगा।
और फिर अचानक किसी दिन वही पुराना नटराज फिर से चैंपियन बन जाएगा।

कॉर्पोरेट दुनिया में यही स्थायी सत्य है —
कहानी बदलती रहती है, किरदार बदलते रहते हैं, लेकिन नाटक चलता रहता है।

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