Tuesday, November 16, 2021

सिद्धि प्रत्येक मनुष्य का कर्त्तव्य है--पुरुषार्थ की आहूति.

महीने का राशिफल, साप्ताहिक राशिफल, ग्रह गोचर, नक्षत्र गोचर, ग्रहण , मार्गी और वक्री, इतना कुछ है भविष्यफल में. यूट्यूब पर कितने वीडियोस देख कर अब यह समझ आया है कि , स्वयं या मित्र राशि में गोचर तो अच्छा , मित्र या स्वयं के नक्षत्र में गोचर तो अच्छा, दुस्थान में गोचर तो मुश्किल, गोचर में युति का अपना ही असर। . सीधे फार्मूले से चलें तो आसान है भविष्यफल कह देना , लगभग हर घर के कारकत्व १० से ५० तरीके के हैं, उसी तरह ग्रहों के भी कारकत्व हैं, फिर गोचर के बाद दृष्टि का भी कथन, वहाँ भी वही हिसाब। .पर होता है क्या ऐसा कुछ?





नहीं, यह तुक्का है. दशा सर्वोपरि है. वैसे आप कहेंगे, गोचर से ही तो ढैया और साढ़े साती है। . बात सही है, पर क्या ढैया और साढ़े साती कोई सामान प्रभाव देते हैं ? नहीं. यहां  भी दशा महत्वपूर्ण है. 

अगर कुंडली मज़बूत है तो सब आंधी पानी से बेअसर , पर कुंडली कमज़ोर है तो ऊँट पर बैठे आदमी को भी कुत्ता काट जाता है। 

अब भाई हमने ३ तरह की बात कर ली; पहली गोचर, दूसरी दशा और तीसरी कुंडली की शक्ति। 

मुझे लगता है, इन तीन स्थितियों के अलावा जो बात फर्क ला सकती है वह है सन्यास या फिर किसी रिश्ते में फंस जाना। . अब क्या यह सब कुंडली में लिखा नहीं होता? होता होगा पर , आप भी कई बार ऐसा करते हैं जो कुंडली को चैलेंज करती सी लगती है. पर वह क्षणिक होता है , इसका परिणाम भी क्षणिक ही होगा , यह क्षणिक भाग्य भाग्य नहीं बदलता. भाग्य यदि बदलता ये संवारता है तो वह सेवा से , सच्चे गुरु की सेवा से , उनकी कृपा से। . 

अभी मैं डाक्टर नारायण दत्त श्रीमाली जी के कुछ पुराने वीडियो यूट्यूब पर देख रहा था. 


उन्होंने तंत्र, मंत्र और यन्त्र पर १५० से अधिक पुस्तकें लिखी हैं. हिंदी के प्राध्यापक रहे, संपूर्ण विश्वा में इसकी सिक्षा दीक्षा दी. हज़ारों साधकों को इनकी शक्ति और प्रभाव से परिचित कराया. 

उनकी अपनी ज़िन्दगी भी एक महान परिवर्तन की कथा है, मज़बूरी, दरिद्रता से मुक्त होने की और संपूर्ण समृद्धि प्राप्त करने की , और इन सभी परिवर्तन के पीछे उन्होंने शक्ति /काली/छिन्नमस्ता देवी की साधना को प्रभावी बताया है. 

सिद्धि हर मनुस्य का लक्ष्य होना चाहिए।  हनुमान चालीसा में हम यह कहते हैं, "अस्ट सिद्धि नव निधि के दाता , असवर दीन जानकी माता  ".. तो हम किन सिद्धियों की बात कर रहे होते हैं? (शास्त्रों में बताया गया है कि माता सीता ने हनुमानजी को आठ सिद्धियों और नव निधियों का वरदान दिया था..)

८ सिद्धियां हैं; --अणिमा , महिमा, लघिमा, गरिमा तथा प्राप्ति प्राकाम्य इशित्व और वशित्व ये सिद्धियां "अष्टसिद्धि" कहलाती हैं।

इनके अलावा हम सभी ने दस महा विधाएँ सुन रखी हैं. वे क्या हैं? 

The 10 Mahavidyas are काली  Kali, तारा  Tara,त्रिपुर सुंदरी   Tripura Sundari (Shodoshi), भुवनेश्वरी  Bhuvaneshvari, त्रिपुर भैरवी  Tripura Bhairavi, छिन्नमस्ता  Chhinnamasta,धूमावती  Dhumavati, बगलामुखी  Bagalamukhi,मातंगी  Matangi and कमला  Kamala

साधना सीखने के लिए एक सिद्ध गुरु के दर्शन और आशीर्वाद की आवश्यकता रहेगी।  

सिद्धि प्रत्येक मनुष्य का कर्त्तव्य है -यह उपाय नहीं पुरुषार्थ की आहूति है. आइये साधना मार्ग पर चलते हैं. 



Saturday, November 13, 2021

ईश्वर सिर्फ जीवन देता है , जो एक न्याय है, सजा या कुछ और

 ज्योतिष समाधान का विषय नहीं है. समाधान यदि कहीं है तो वह एक सिद्ध गुरु या सिद्ध आशीर्वाद से ही मिल सकता है. दूसरा तरीका है पीड़ित स्वंम सिद्ध हो जाए। .


अरुणा शानबाग की कहानी सब को मालूम है. इसको कहते हैं प्रारब्ध। .फाइनल वर्डिक्ट यही है.. कोई अपील नहीं हो सकती। 

प्रारब्ध है ३ रॉबिंसन स्ट्रीट कोलकाता और मौतों का समुंदर एक २५ करोड़ की आलीशान कोठी में।  अभिशप्त जीवन, दुर्भायपूर्ण , दर्दनाक मौत , जो उन्होंने स्वयं चुनी 

जीवन का इस बवंडर में नेस्तनाबूत हो जाना 
राम को भी रावण पर विजय शक्ति -दुर्गा -काली-चंडी  ने ही  दिया था। . बस यही एक रास्ता बचता है, अगर प्रारब्ध आपको पल पल लील रहा हो. बचे न बचे पर मरे तो चंडी के ध्यान में. 
कई लोग आपको जीवन में मिलेंगे जिन्होंने आप पर अनंत कृपा की होगी, सभी के लिए आप कृतज्ञं होंगे , परन्तु जब आपकी बारी आएगी उस कृपा का क़र्ज़ चुकाने की तो प्रारब्ध आपको लज्जित करेगा। . सामर्थ्य सब कुछ नहीं है, कृपा सबसे ऊपर है. 
कुछ लोग आपके बुरे कर्मों की सजा देने मात्र के लिए ही यहां भेजे गए हैं, वे आपको आपका पाप धोने में मदद करते हैं. मेरे अनुभव में वे सभी आपके शुभचिंतक हैं. आपको उनका आभारी होना चाहिए. 
ईश्वर सिर्फ जीवन देता है , जो एक फ़ैसला है, शायद न्याय नहीं , और फिर आपको वापस समाप्त भी कर देता है. 
बीच में बचा  है वह अनमोल समय जिसे हम जीवन कहते हैं. बुद्ध ने इसे इसे दुक्ख कहा है. 
दुःख से निकलने का मार्ग है दुःख को जीने की कला . सीख ही लेते हैं लोग. 
बीच में ज्योतिष कुछ भ्रम में आपको रख सकता है. मैं भी इस भ्रम में जीता, जागता रहता हूँ. 
अगर यह भटकाव है तो फिर बुरा ही क्या है ?




Wednesday, November 3, 2021

पिताजी मैं फिर से फेल हो गया

 (याद है , सेण्टर फ्रेश 

का विज्ञापन?) -पिताजी मैं फिर से फेल हो गया ?


बधाई हो विराट को, शास्त्रीजी को , टीम ने लगातार अच्छा प्रदर्शन किया इनके नेतृत्व में, 

२०११ के बाद, पिछले १० साल में , इनके छत्रछाया में, भारत कोई भी विश्व कप नहीं जीता. 

पाकिस्तान और न्यू जी लैण्ड  से हार एक राहु काल में घटित घटना जैसी है. वैसी ही जैसी हम ३६ रन पर इंग्लैंड में सारे आउट हो गए थे , पर फिर भी २-१ से टूर्नामेंट जीते। .. इस टीम का ऐसा ही कुछ पनोती चल रहा है. जबकि सितारे भरे हैं. अफगानिस्तान, स्कॉटलैंड और नामीबिया को हराकर जख्म भरने में मलहम काम कर रहा है. 
होता है , खेल है, अब बांग्लादेश को ही देख लीजिये, इतनी भी ख़राब टीम नहीं है. पर वक्त ख़राब है. 


रवि शास्त्री को कोई नहीं ढूँढ रहा.. जय शाह कौन हैं? कहाँ हैं? रोहित शर्मा कुछ नहीं बोल पा रहे.. बूम बूम बुमराह अब हलवा बॉलिंग कर रहे हैं, पंड्या को रक्तहीनता शता रही है, मिस्ट्री स्पिनर छक्के परोस रहा है.. सब परास्त, पराजित,  शशंकित टीम की तरह मुँह छिपाए हैं.. भाग्य विपरीत हो बैठा है.. टॉस लगातार हारते जा रहे हैं.. 

आज है कोहली बनाम अफ़ग़ानिस्तान !
आज है रोहित बनाम अफ़ग़ानिस्तान 
आज है राहुल बनाम अफ़ग़ानिस्तान 
आज है शमी बनाम अफ़ग़ानिस्तान 
आज है स्लो पिच बनाम भारत 
आज है ओस बनाम भारत 
आज है भाग्य बनाम भारत 

विजयी भव ! 
दीपावली,  4 नवंबर : रोहित और राहुल सम्मान की रक्षा के लिए लड़े.. पंड्या ने भी पाप धोया,  अश्विन ने साबित कर दिया,  षड़यंत्र आपको परेशान कर सकती है, पराजित नहीं.. सबसे अच्छी ख़बर रवि शास्त्री जी का त्यागपत्र और रिटायरमेंट.. 
सबसे बड़ी भाग्य की बात : राहुल द्रविड़ का भारतीय टीम का कोच नियुक्त होना.. अगली पीढ़ी सुधार जायेगी.. ईश्वर की कृपा है.. 
कोहली थोड़ा विश्राम करें, फिर लौटें टीम में.. 
कल की भारतीय टीम पहले मैच की पाकिस्तान टीम के जैसी थी और अफ़ग़ानिस्तान में भी कमाल के t20 के खिलाड़ी हैं.. 
कुछ ओवरों के बाद शमी और बुमराह फिर बिखरे और भटके से दिखे.. पूरी 4 ओवर सटीक गेंदबाज़ी सीखनी बाकी है इनको... यहाँ ये आश्विन से कुछ सीख सकते हैं.. 
द्रविड़ के आने की ख़बर ने ही नयी ऊर्जा भर दी है.. 

जय हो !  

Tuesday, November 2, 2021

समस्त विश्व की चिंता टूल-किट में क़ैद है. षड्यंत्रों के जाल में फँसी अपनी एक एक साँस को तड़फड़ाती..

क्या नौकरी करना कठिन होता जा रहा है? क्यों लोग रिजाइन कर रहे हैं? क्या यह इसलिए तो नहीं कि अब गंध आ रही है गंदे लोगों से जो किसी षड़यंत्र का सहारा लेकर नौकरियों में भरते चले गए, जातिवाद, प्रांतवाद, कई अन्य कारण रहे ? अच्छे लोग नौकरी छोड़ रहे हैं, क्यूंकि वे अपना काम , मतलब का काम करना चाह  रहे हैं? क्या वे लोग नौकरी छोड़ रहे हैं, जिनका मन अघा गया है, काम करके, समझौते करके, तिजोरियां भर भर के? सब के अलग अलग कारण हैं. पाप का घड़ा भरता है समय समय पर न्याय होता रहता है , या यूँ कहें कि सल्तनत के बाद मुग़ल फिर अँगरेज़ शाशन करते हैं, फिर इतालियन, फिलहाल गुजरात से नए शाशक देश चला रहे हैं। . 



कलयुग का कुचक्र. यहां कोई ईश्वर नहीं है, यहां सिर्फ राक्षस सत्ताधीश हैं, सर्वत्र. चालबाज़, मौका परस्त, शोषक। देवों का समय तो कब का समाप्त हो चुका। . देव अब सिर्फ मंदिरों की शोभा बढ़ाते हैं, अपने भिन्न भिन्न रूपों में. 

जीने की उम्मीद क्षीण होती जा रही है. यह समस्त विश्व में छाया हुआ एक अंधेरा है...

उम्मीद की नयी किरण? पता नहीं पर जब अँधेरा गहरा छाया हो तो उम्मीद की कोई किरण फूटती ही है, देर सबेर। 

हर कोई अपना अस्तित्व छुपा बैठा है. जो चेहरे हम देखते हैं, वे छद्म हैं. लोग इतनी अच्छी नक़ल कैसे कर लेते हैं.. अपना सही रूप दिखाना जैसे पाप हो.. बहरूपिये। .हम सभी बहरूपिये हैं. ऐसी भय आच्छादित जीवन जीने का क्या फायदा? 

समस्त विश्व की चिंता टूल-किट में क़ैद है. षड्यंत्रों के जाल में फँसी अपनी एक एक सांस को तड़फड़ाती.. 



पर्सनल चिंता ऐसी जैसे अस्तित्व का शंकट आ गया हो. 

दूसरों के दुखः से हम अब दुखी नहीं होते, अपनी चिंता के अभिभूत हम अपने आस पास के लोगों के प्रति भी अपनी संवेदनाओं की आहूति दे बैठे हैं. 

हर सुबह याद दिलाती है; कुछ भी तो नहीं बदला.. आज भी वही षंडयंत्र सहना, करना है.. 

एक अर्थहीन क्षद्म जीवन की परिणति होती है, अपने हितों की चिंता से शुरू और अंत तक उसके ही पाश में , मोह में उलझकर. 

अब सहारे , संवेदनाएं, उम्मीदें , भरोसे, सब बिकाऊ हैं. सब उसी षड़यंत्र के हिस्से हैं.. 

अब हम जश्नों में नहीं, बाज़ारों में बिकते चकाचौंध में बहके बहके , कुछ डरे सहमे, कुछ सकते में से गुज़र जाते हैं, हर एक पल जो कभी अपने व्यक्तिगत आकांछाओं की प्रतिछवि से लगते थे, अब, तिलस्म से लगते है. 

शायद मैं , थक गया हूँ.. उम्मीद भी कम हो गयी है.. हर पल बस बीतता सा लगता है, घिसट कर, कोई रोमांच नहीं है, इसकी कोई चाह भी नहीं, अंदर ही अंदर कुछ ढूंढ़ता सा है इंसान , शायद इस तिलस्म का एंटीडोट। 


Friday, October 29, 2021

प्रारब्ध अर्थात दुर्भाग्य? ईश्वर बेनक़ाब !

प्रारब्ध,  कर्मा,  डेस्टिनी, फेट,  सभी शब्दों के मायने एक से हैं, मतलब दुर्भाग्य ! कभी सुना है किसी को इन शब्दों के साथ सौभाग्य की चर्चा करते हुए?  मैंने नहीं सुना. 
दिलचस्प बात है संचित कर्म हैं तो प्रारब्ध भी बनेगा.. 
आज एक ह्रदय विदारक सूचना मिली. एक जान पहचान की महिला, जो सिंगल मदर हैं, ने अपने एक मात्र 9 वर्षीय पुत्र को कल ही डेंगू के कारण खो दिया.. उसके जीने की वज़ह ईश्वर ने छीन ली.. एक माँ का यह दर्द विष्णु की सैया को हिला पाए न पाए पर उसने हम सब को काठ सा बना दिया है.. स्तब्ध,  निस्तेज़, मृत.. अकल्पनीय है यह सोच पाना कि ईश्वर इतना निर्दयी भी हो सकता है.. 

जब अभिमन्यु का पुत्र जो मृत पैदा हुआ था,  इसी ईश्वर कृष्ण ने उसे जीवित कर दिया था.. आज कृष्ण कहाँ हैं?  
हम सभी को अपना दर्द मामूली लगने लगा इस भीषण दर्द के आगे.. उस माँ की दशा सोच सिहर जाता हूँ.. 
शायद इससे बड़ी विभीषिका की कल्पना भी कोई नहीं कर सकता.. 
एक माँ अब कैसे जीएगी?  क्यूँ इतना अन्याय?  
कोरोना ने कई बच्चों को अनाथ कर दिया है.. क्या उनका दुःख कोई बाँट सकता है? शायद ऐसी कोई माँ. 

मैं आज काफी दर्द में हूँ.. 
सुना था दुःख माँजता है पर ऐसा दुःख कलेजे में गहरा खंज़र है.. जो न जीने देगा, न मरने.. 
ईश्वर इतना दुःख आप संचित कर्म के हिसाब से देते हो न,  फिर तुम्हारा नर्क कहाँ है? क्यूँ नहीं वहीँ इनको तेज़ाब के समुन्दर में जला देते?  क्यूँ छल करते हो नया जीवन देकर,  पुरानी स्मृति छीनकर, नए सपने देकर?  यह तो धोखा है.. 
तुम्हारा कोई नर्क नहीं है और स्वर्ग भी वैसा ही सफ़ेद झूठ.. 
ये फिर बता तो स्वर्ग नर्क सब इसी दुनिया में है.. 
मुझे तो तुम्हारा संचित कर्म और प्रारब्ध सब प्रपंच और पाखंड लगते हैं.. 
तुम्हारी इच्छा के विरुद्ध तो पत्ता नहीं हिलता, फिर कोई पाप कर्म कैसे कर लेगा?  
अच्छी कहानी फैला रखी है आपने प्रभु.. 
आपकी लीला अपरंपार.. 

Monday, September 13, 2021

१२वें घर से आज़ादी

 १२वें घर से आज़ादी ! इस अजीब से शीर्षक से आप कन्फूज़ हो गए क्या? 

कुंडली का १२वां घर मुक्ति का घर है, जन्म-मृत्यु के कुचक्र से आज़ादी का ! 

अब इस घर को समझते हैं, यह घर किस राशि का है, उसका स्वामी कौन हैं , उसके साथ कौन हैं, वह किस राशि में बैठा है, उसपर और उसके १२वें घर पर किसकी दृष्टि है, इत्यादि. सब तय करेंगे कि आप की सज़ा कैसी होगी, किन कर्मों में आपका इस्तेमाल होगा और कहाँ आप सजा जैसा महसूस करेंगे. १२वां घर कोई रिवॉर्ड नहीं है. बचा काम है, पूर्व कर्म का निदान है, भूल-चूक- लेनी-देनी ! मुक्ति का स्थान,  आसानी से नहीं छोड़ेगा.. 

अब आते हैं अपने/मेरे १२वें घर पर, यहां मेष राशि है. इसका स्वामी तीसरे घर में है , नीच का और अस्त भी, सूर्य और अपने शत्रु बुध के साथ. १२वें में शनि है, नीच का और २९ डिग्री पर. न्याय के देवता , न्याय (अंतिम न्याय) के घर में हैं, उनपर गुरु की दृष्टि है, अर्थ है, न्याय तो पूर्व कर्मों का खूब होगा. और न्याय घर से ही शुरू होगा, मतलब, शनि पहले अपने घरों का न्याय करेंगे; यानि, भाग्यभाव और कर्म भाव का. वहाँ आपकी बजा -बजा के ली जायेगी. दूसरा न्याय , १२वें घर के स्वामी भी करेंगे. अब तो वे नीच के और अस्त भी हैं, अब उनका घर रहा सातवां भी. पार्टनरशिप, विवाह और व्यापार पर भी मुश्किलें. वैसे भी मंगल कारक हैं ; भूमि, भवन, वाहन के, इनकी भी ली जायेगी. सो ली गयी. भूमि, भवन, वाहन, सब से वंचित.

अब पर गुरु की भी दृष्टि हो तो फिर, दोनों प्रकार की सजा मिलेगी. यानी, पहले कड़ी सजा , फिर न्याय भी गुरु की कृपा भी. यानी , सभी कड़ी सजा पूरी होने के बाद न्याय भी मिलेगा, गुरु अपना फल भी देंगे, यानि, अचानक लाभ, विदेशों से लाभ, विदेशों से ज्ञान, विदेशों से ख्याति, विदेशों से ज्ञान का संपर्क. शायद सुखद अंत. हैप्पी एंडिंग.

किसी महान ज्योतिषी ने कहा था, मेरी कुंडली में पूर्व जन्म का काफी कर्मा है, और चुकि गुरु ६ठे में बैठे हैं तो आप बच नहीं सकते. कोई दवा, तंत्र, ताबीज़ काम नहीं करेगी. भोगना पड़ेगा. मुझे लगता है, ५१ साल हो गए, काफी भोग लिए हैं अब तक. अब तो कम दो कष्ट/ .. अब आगे शनि की साढ़े साती है, जो अप्रैल  २०२२  से दुसरे चरण में चलेगी, कर्मभाव से.. तो शायद कुछ रहत मिले. तब फिर गुरु भी साथ होंगे शनि महाराज के दशम में। . 

राहु महाराज भी २०२२ में अप्रैल में १२ वे में होंगे. मेरे विचार से, १२ वां भाव विदेश का है और राहु भी विदेश को दर्शाता है, तो क्या विदेश के अवसर मिलेंगे अगले साल? 

सजा कब तक चलती रहेगी, पता नहीं पर शनि महाराज मकर से निकलें तभी कुछ नरम होंगे, देखिये क्या होता है. 

अब यदि, दुसरे किसी व्यक्ति की कुंडली देखें १२वें भाव से तो क्या मिलता है? शनि , शुक्र, सूर्य और बुध यदि १२वें में हों , कर्क में और चन्द्रमाँ लग्न में हो मंगल के साथ।  क्या सजा होगी? गुरू दशम में हैं. 

ऊपर के सिद्धांत से, शनि पहले अपने घरों का न्याय  देंगे: ६ठे और सातवें का..यानी, रोज़ का काम , काफी करना पड़ेगा, रोग, ऋण, शत्रु से भी भय और उसका हिसाब देना होगा, शनि और गुरु, दोनों की द्दृष्टियाँ छठे घर पर हैं , सो मामला बैलेंस होगा, दोनों अच्छा फल देंगे. सूर्य और चंद्र का राशि परिवर्तन भी है, सो दोनों अच्छे फल देंगे. सूर्य लग्न का स्वामी है और चंद्र खर्चों का. चंद्र अपने घर से दुसरे में है सो धन लाभ देगा, सूर्य अपने घर से १२ वे में है सो खर्चे बढ़ाएगा पर चंद्र धन देते रहने को होगा बाध्य क्योंकि डिस्पोसिटोर हैं एक दुसरे के. सपोर्ट तो करना ही पड़ेगा. शुक्र १२वें में, विलासिता में खर्च , बुध १२ वे में , बच्चों में, शेयर मार्किट में खर्च। . बुध अपने घर से दुसरे और ग्यारवें  में बैठा है, आमदनी का स्वामी खर्चे के घर में, इन्वेस्टमेंट के घर में और हानि के घर में... इन्वेस्टमेंट कुछ ख़राब भी होंगे. धन भाव का भी स्वामी बुध है तो इन्वेस्टमेंट, इनकम और धन सभी एक दुसरे का साथ देंगे. धन अर्जन कर्मा है, विलासिता और निवेश कर्मा है, शरीर की छति कर्मा है. मुक्ति मिलेगी धन कमाने से, धन संचय से, विलासिता में खर्च से, योगकारक मंगल लग्न में चंद्र के साथ, सुख भाव, पत्नी एवं व्यापार भाव, और मृत्यु भाव, विदेश भाव, आध्यात्म भाव, को दृष्टि दे रहे हैं, सुख भाव उनकी अपनी राशि है, अष्टम भाव स्वामी गुरु दशम में हैं. यानी करियर का विदेशों से जुड़ना या अचानक परिवर्तन और लाभ संभव है परन्तु, दोनों ही ज्ञान से सम्बंधित होंगे. दोनों ही कामों में जातक निष्ठां पूर्वक काम करेगा. वृष राशि में गुरु ज्ञान को प्रैक्टिकल स्वरुप देंगे. 

कैसा लगा आपको यह विश्लेषण,  बताइयेगा कमेंट में.. 


Thursday, August 26, 2021

मिल्खा रुक जा!

शारीरिक और मानसिक पीड़ा हो तो हीलिंग अनिवार्य है. वैद, डाक्टर , हस्पताल, दवाई चाहिए, सेवा चाहिए, समय , लोग,  पैसे , धैर्य सब की आवश्यकता पड़ेगी। .. इलाज़ की कई पद्धतियां हैं , जितने विद्वान उतने विधा का अवतरण। .. सब की अपनी आस्था है। . 

मनीष भाई प्रेसेंसिंग थिएटर के सीनियर संचालक , कंसलटेंट हैं. इस पद्धति में पीड़ा को चित्रित किया जाता है, जैसी पीड़ा वैसी कलाकारी के साथ चित्रण एक नाटक जैसा. लोग जीते हैं उस पीड़ा को, समझते हैं और फिर उससे उबर पाते हैं.. 

पास्ट लाइफ रिग्रेशन हो या आकाषिक रिकॉर्ड पद्धति, सभी आपकी पीड़ा का मूल ढूढ़ते हैं. केतु पास्ट लाइफ को  झलकाता है जन्मपत्रिका में, पांचवा घर आपका इंटुइशन है, सब के अलग अलग विधान हैं, सबके अलग अलग पुरोहित, पांडित्य और उससे जुड़े कई कर्मकांड। .. विधा देशी हो या विदेशी , सभी के मूल में वही खोज चल रही है, हम अस्तित्व में हैं तो पीड़ा की वजह भी वही अस्तित्व है, विधि का विधान है, जन्म, कर्म, जरा , मृत्यु और फिर वही चक्र. भोग का कर्म, फिर कर्म का भोग , यही चक्र है. 

शारीरिक, मानसिक बीमारी याद दिलाते हैं, आपका कर्मा है, भोगिए, 

कल मनीष भाई ने एक सुन्दर लेख लिखा , जहां उन्होंने मिल्खा सिंह की रोम ओलिंपिक में पदक चूक जाने का ज़िक्र किया, कहानी वही है  जो फरहान अख्तर की बॉलीवुड फिल्म  "भाग मिल्खा भाग " में आप देख चुके हैं... 

दर्द में गज़ब की चुम्बकीय शक्ति होती है. कहानीकार प्रेमचंद ने कहा हैं, "दुःख मांजता है". दुःख कभी नहीं मिटता , वह पत्थर की लकीर है , जब भी हाथ फेरेंगे, उसका स्पर्श होगा। 

क्या इस दर्द को हम अपने चित्त से मिटा सकते हैं? शायद नहीं, और अब तो नया मनोविज्ञान कहता है, दुःख को जीन सीखो, पीना सीखो दर्द को, 

क्या अरुणा अपना दर्दनाक, खौफनाक, बलात्कार मरते दम तक भूल पायी थी? 

उसका बलात्कारी, जो अभी भी ज़िंदा है। .... क्या उसे कोई दर्द है, कभी था? 




क्या कोई विधा इस दर्द को मिटा सका? अरुणा के पास कोई चारा भी नहीं था। .. बस दर्द को हर पल जीना। .. ४२ साल तक उन्होंने जिया अपना दर्द. ...क्रूर भाषा में इसे vegetative स्टेट में रहना कहते हैं. 

क्या कोई मिटा सकता है निर्भया का दर्द? क्या कोई मिटा सकता है असंख्य लोगों का दर्द, जो राजनैतिक, धार्मिक उन्मादों में कुचले गए, कंसंट्रेशन कैंप, होलोकॉस्ट और पता नहीं  क्या क्या.  फांसी मिली गुनहगारों को। . 

किसका दर्द मिटा इससे? जीना पड़ता है इस दर्द को लेकर. 


दर्द को अगर अपना हथियार बना सके तो बेहतर है... 

500 रुपए में पति ने बेचा, डॉन को बांधी राखी, जाने  कौन है 'गंगूबाई काठियावाड़ी'

बनो तो गंगाबाई बनो , कोई महात्मा गाँधी से कम नहीं, कोई ज्योतिबा फुले से कम नहीं, 

मलाला बनो, ग्रेटा थुरंबर्ग  बनो या फिर बना दिए जाओगे. अपना आदर्श खुद चुनो. 


Two CFO Exits. Two Corporate Battles. One Big Question: Who Owns an Executive's Career?

 Two CFO Exits. Two Corporate Battles. One Big Question: Who Owns an Executive's Career? A WiseWaters perspective | Corporate governance...