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क्या कोई षड्यंत्र है? क्या जाति विशेष की कोई निश्चित प्रवृत्ति होती है?

क्या कोई षड्यंत्र है? क्या जाति विशेष की कोई निश्चित प्रवृत्ति होती है? सामजिक-आर्थिक रूप से सफल लोगों को ही देख लेते हैं. क्या इनमें कोई विशेष गुण है जो इन्हे सफल बनाता है? क्यों बंगाली और मलयाली नौकरियों में ज्यादा सफल हो जाते हैं? क्यों बनिये व्यापार में सफल होते से लगते हैं? क्या उन्हें व्यापार करने के गूढ़ रहस्य मालूम हैं? या फिर सिर्फ व्यवहार-सरोकार के ये पुजारी हैं? कैसे जानें इनमें ये गुण कैसे आते हैं? कैसे ये इन गुणों की बदौलत अपनी मंज़िल पाते हैं. प्राइवेट नौकरियों को अगर देखें तो, इसकी शुरूआत टाटा और बिरला या बजाज ग्रुप से निकल कर आता है. इन कंपनियों में मजदूर वर्ग बिहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र से आया, तकनिकी काम के लिए, दक्षिण भारत और महाराष्ट्र का वर्ग जुड़ा. बंगाली ऑफिस के काम के लिए रखे गए. उन्हें कुछ अंग्रेजी आती थी और ये बड़े अफसरों के सामने बिलकुल मेमनों जैसा हाव-भाव रखते थे. ये उनके सहमति और असहमति दोनों से बराबर ही सहमति प्रकट करते थे. ये अपने विचार फुटबॉल, मुरी घोंटो , नक्सलबाड़ी, सिगरेट , कार्ल मार्क्स, इत्यादि तक सीमित रखते हैं. इन्होंने ...

देखना है ऊँट किस करवट बैठता है

चर्चा में है कि  ६६ साल पुराना संस्थान XLRI एक अभिजात्य वर्ग बन सा गया है. असलियत में काफी gaps हैं, जो alarming हैं. रैंकिंग में नंबर १ इन ह्यूमन रिसोर्सेज self -proclaimed title सा जान पड़ता है. मेरा XLRI के काफी सीनियर और जूनियर कैंडिडेट्स के इंटरव्यू का अनुभव भी यही स्थापित करता है की, यह रंगा सियार ही है. काफी कम ही लोग हैं जो  प्रतिभावान हैं. ६६ साल की विरासत कब तक चल पाती है, देखना होगा. कहते हैं नामी बनिया का झांट भी बिकता है. XAT एंट्रेंस टेस्ट की फॉर्म भरने ही तारीख extend हुई २०१६ के लिए. यह भी एक सन्देश है की काफी काम लोग अप्लाई कर रहे है अब XLRI  के लिए. देखना है ऊँट किस करवट बैठता है मैंने सोचा था, सरकारी अफसर बेईमान, घूसखोर होता है, फिर प्राइवेट कंपनी में काम किया तो मालूम पड़ा यहां तो सबसे बड़े चोर और चरित्रहीन लोग भरे पड़े हैं. यहां तो न विजिलेंस का, नहीं CBI का, नहीं, पॉलिटिशियन का या मीडिया का डर , लूट मचाओ, गिरे हरकत करते रहो. राज्य सरकार के नौकरी में जात-पात था, भाई -भतीजावाद था, प्राइवेट में बंगाली वाद है, मलयाली वाद है, ...

मानद उपाधियाँ आप भी ले सकते हैं.

दिलीप साब को पद्म विभूषण होम डिलीवर किया है राजनाथ सिंह ने. बधाई हो. ९३ वर्ष के हो गए हैं दिलीप साब. मुझे सबसे अच्छे लगे वो मशाल में. इन उपाधियों से याद आया मानव संसाधन यानि HR वालों के कुछ उपाधियों का. एक संस्था हैं SHRM (इसका हिंदी ऑटो रूपांतर शर्म बता रहा है) यहां से आप कुछ उपाधि खरीद सकते हैं.. ऐसी दूसरी काफी सारी इंटरनेशनल संस्थाएं हैं जो HR की चूरन गोली , यानि सर्टिफिकेट बेचती हैं. ३०० डॉलर से ६०० डॉलर में आप चुटकुले टाइप ३ घंटे का एग्जाम लिख कर , ८ हफ़्तों में मानद उपाधि का टीका अपने बायो डेटा के सर पर लगा सकते हैं. आजकल HR के उपाधि वाले अपने नाम के आगे लिखते हैं, PHR , SPHR , GPHR , HRMP ,इत्यादि. कुछ HR के नए मुल्ले, अपने मंद उपाधि के बाद tagline लगाना नहीं भूलते.. कुछ ऐसे होते हैं ये चुटकुले नुमा tagline "Identified as top 20 future HR leaders by Peoplematters 'Are You in the List?'" स्वनामधन्य एक HR की पत्रिका नें ये सूरमा लिस्ट तैयार किया है. फॉर्म भर दीजिये, लम्बी फेंक मारिये और आप बन गए, Identified as top 20 future HR leaders by Peoplematter...

सपने बुनते रहिये

सपने बुनते रहिये  ऊँचे ख़ाब देखते रहिये  काफी कम लोगों में है यह हौसला, इस रोशनी को जलाये रखिये  बस ख्याल इतना रखिये  पाओं को ज़मीन पर रखिये  छोटी पटरियों पर फिसलने के हम नहीं कायल  करें कलरकी और ख़ुशी से फूल जाएँ, ऐसे भी हम नहीं घायल  डरिये मत कि लोग इसे फलसफा कहेंगे  शब्द और संवेदना के ऐसे ग़रीब यहां ख़ूब मिलेंगे  अठंन्नी डालिये, अपनी राह चलते रहिये  भूल कर  भी इनसे ज्ञान मत लीजिये,  क़ाबुल से निकाले गए कई गधे यहां भी मिलेंगे. (जनवरी २००३ )

कभी जब शून्यता महसूश करता मैं

कभी जब शून्यता महसूश करता मैं, शायद तुम भी विस्मृत सी हो जाती हो. याद करता फिर तुम्हारा वह चंचल-कोमल सा चेहरा , उस चेहरे की ताज़गी और आँखों की चमक. कुछ कहते से होंठ और उनकी थिरकन. सब देखता हूँ मैं पर सुन नहीं पाता , क्या कहती हैं वे.  उन जीवंत आँखों और होठों को, और चेहरे से सामंजस्य बैठाने की कोशिश में मैं भी करने लगता प्रयास; आँखों में चमक लाने का, चेहरे से ओज छलकाने का, और प्रतिउत्तर देता सा अपने शिथिल होठों को हिलाने का, पर डरता और लज्जित सा भी महसूस करता अंदर-ही-अंदर कि शायद तुम समझ रही हो यह सारा अभिनय. पर क्यों करता हूँ यह अभिनय? शायद  इस लिए कि तुम्हारी अपेक्षाओं से दूर रह जाता हूँ मैं. पर फिर सोचता क्या हिमालय से निकली धारा उसका साथ कभी छोड़ पाती है? दूर-दूर, और दूर जा कर भी जुड़ी रहती है उसी दृढ़ता से, उसी चाहत से , उसी उत्साह और प्यार से. (जुलाई २०००)

ईश्वर अगर है और हो तुम मेरे साथ

संघर्ष करते हुए उदास हो जाता मैं, आशा छोड़ने लगती जब साथ, नज़र आता सिर्फ एक ही रास्ता, करते जाओ प्रयास, छोड़ो नहीं आश.  फिर भी धड़कन बढ़ती जाती है, दूरी और परिवेश भी जब करने लगते निराश, पर हूँ दृढ संकल्प, हार स्वीकार करने को हम तैयार, पर पूरा संघर्ष करने को हम बाध्य, प्रयाश से पूर्ण और निश्चय से दृढ़।   दौड़ते रहना मेरी नियति है, कुछ सफलताओं से आशान्वित होकर, फिर असफलता, फिर निराश.  आश-निराश के बीच झूलता मैं, मालूम नहीं, क्या होगी परिणति, पर है एक विश्वास.  कि ईश्वर अगर है और हो तुम मेरे साथ, पहुंचेंगे जरूर, असफलताओं को लांग सफलता के पास. (मई, २०००. )

इस बदबू में हम जी लेंगे!

Whatsapp पर जोक आया है; "कब्रगाह वो जगह है, जहां वे लोग दबे हैं, जो यह सोचते थे की उनके बगैर यह दुनिया नहीं चल सकती. " कभी-कभी इस मुगालते में हम सब आ जाते हैं. परिवार, समाज, संस्था, कपंनी, हर जगह आपके ऐसे लोग मिल जाएंगे.  कंपनी से बेहद खफा और निराश हो कर जब रिजाइन कर देंगे या इन्हे निकाल दिया जाएगा, तब भी ये अपनी अदा से बाज़ नहीं आते.  समय के साथ , पढ़े लिखे बेकार बढ़ते गए. एमबीए कालेज बंद हो ते गए, आईआईएम वाले भी बेरोज़गार भटकने लगे. नौकरी डाट कॉम पर आईआईटी +आईआईएम को मैंने कोचिंग सेंटर में पढ़ाते देखा है, दिहाड़ी पर.  अब तो प्रीमियर बी स्कूल वाले भी मिड लाइफ क्राइसिस में जाबलेस हैं. यह अच्छी स्थिति नहीं है. इनको तो हराम की नौकरी एक बार मिल गयी तो यह सरकार इस समाज का काम है की उनकी जमींदारी बानी रहे, चाहे कितने ही निकम्मे और कलंक क्यों न हों.  मुझे यह हमेशा लगता रहा की अगर मैं ५०% सीनियर लोगों को काम से निकाल दूँ तो उनके कार साफ़ करने का भी काम कोई नहीं देगा.  समय के साथ ऐसे लकी लोगों की संख्या बढ़ती ही जा रही है तो कंपनी पर बोझ बन गए हैं. दिमाग कुण्ड हो गया...