क्या कोई षड्यंत्र है? क्या जाति विशेष की कोई निश्चित प्रवृत्ति होती है? सामजिक-आर्थिक रूप से सफल लोगों को ही देख लेते हैं. क्या इनमें कोई विशेष गुण है जो इन्हे सफल बनाता है? क्यों बंगाली और मलयाली नौकरियों में ज्यादा सफल हो जाते हैं? क्यों बनिये व्यापार में सफल होते से लगते हैं? क्या उन्हें व्यापार करने के गूढ़ रहस्य मालूम हैं? या फिर सिर्फ व्यवहार-सरोकार के ये पुजारी हैं? कैसे जानें इनमें ये गुण कैसे आते हैं? कैसे ये इन गुणों की बदौलत अपनी मंज़िल पाते हैं. प्राइवेट नौकरियों को अगर देखें तो, इसकी शुरूआत टाटा और बिरला या बजाज ग्रुप से निकल कर आता है. इन कंपनियों में मजदूर वर्ग बिहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र से आया, तकनिकी काम के लिए, दक्षिण भारत और महाराष्ट्र का वर्ग जुड़ा. बंगाली ऑफिस के काम के लिए रखे गए. उन्हें कुछ अंग्रेजी आती थी और ये बड़े अफसरों के सामने बिलकुल मेमनों जैसा हाव-भाव रखते थे. ये उनके सहमति और असहमति दोनों से बराबर ही सहमति प्रकट करते थे. ये अपने विचार फुटबॉल, मुरी घोंटो , नक्सलबाड़ी, सिगरेट , कार्ल मार्क्स, इत्यादि तक सीमित रखते हैं. इन्होंने ...
लश्कर भी तुम्हारा है सरदार तुम्हारा है;तुम झूठ को सच लिख दो अखबार तुम्हारा है!-शायर विजय सोलंकी