Wednesday, July 20, 2016

HR की ज़िन्दगी जन्नत है. हनीमून की जगह

शिद्दत वाला HR ! मुझे याद है, २००१; जब मैं सिम्बायोसिस इंस्टिट्यूट ऑफ़ बिज़नेस मैनेजमेंट पुणे की MPM/MBA entrance test की इंटरव्यू के लिए गया था. GD स्टार्ट हुआ, मैं और एक सरदारजी, अंग्रेजी LOUDLY बक रहे थे. हम अग्रेसिव थे, आप बत्तमीज़ कह लीजिये। गलती हमारी नहीं हैं, हमें बताया गया था, ज्यादा बोलने को, औरों से मौका छीनने को, और ऐसे ही कुछ असंवैधानिक, असामाजिक प्रलाप. ग्रुप में काफी सज्जन और सलीकेदार , पढ़े-लिखे प्रतियोगी थे. हम दोनो ने उन्हें लगभग बोलने नहीं दिया. सीधे शब्दों में; हम ने उन्हें सुनने की बिलकुल कोशिश नहीं की, समझने की तो बात ही दूर की है. नतीजा? सरदार जी और मैं GD में सेलेक्ट हो गए, सभ्यजन बाहर. सरदारजी आज CHRO हैं, एक नामी बीपीओ में फिलिपींन्स में. ठीक हैं, बीपीओ और वह भी फिलीपींस में, आप कहेंगे , अंधों में कांना राजा. ढेले पर का भात! दूसरी कहावत कुछ रूढ़ देशी है. आप रहने दीजिये! 
गार्टनर वाले कहते हैं, फार्च्यून २५० के CEOs  मानते हैं की उनके ५५% CHROs को बिज़नेस रणनीति नहीं समझ आती. उनके CFOs तो सिर्फ ३०% CHROs को इस काम के क़ाबिल समझते हैं. ९०% महिलाओं की चॉइस HR है.at - होम सा लगता है. बाकी जो मर्द HR में आये, उन्हें लगा, उन्हें सीधे कोई द्रोणाचार्य मान ले, सरकार द्रोणाचार्य पुरस्कार दे-दे ! भाई, पहले खेल तो समझ लो, ASIAD  में ब्रोंज तो लेलो, खेल रत्न पुरष्कार की कामना करो, निष्ठां से प्रयास करो. तुम तो यार अपने को मुगलों के वंशज समझ रहे हो. एक दिन में, बिना बिज़नेस को समझे, तुम चाणक्य बन जाना चाहते हो. 
गार्टनर रिपॉर्ट कहती है; सिर्फ २०% CHROs के पास एचआर के अलावा किसी और बिज़नेस फंक्शन का अनुभव है. 
HR वालों को अगर कौटिल्य बनना है, सम्मान पाना है तो सीईओ और सीएफओ की सर्टिफिकेट नहीं चाहिए , उन्हें राज धर्म का पंडित होना पड़ेगा. सीईओ का ग़ुलाम बनना छोड़ो. उसके राजगुरु, सेनापति बनो. 
HR में आज का HR "राजधर्म" नहीं, राजाधर्म निभा रहा है. उसकी सारी निष्ठा, सिर्फ राजा के प्रति है! राज्य धर्म निभाना नौकरी नहीं है. सच्चा राज्य धर्म पालन करने का अर्थ है, राज्य के हित के लिए राजा के भी विरुद्ध खड़ा होना हो तो संकोच न हो. HR इसी काम के लिए बना था, न कि राजा की नौकरी (ग़ुलामी) के लिए. मोटी सैलरी, कमज़ोर कलेजा लेकर HR का झंडा क्या उठाएंगे वे लोग जो EMI , अपने बंगले और फॉरेन वेकेशन का सोच कर नौकर बन गए, सारे समझौते कर लिए. इनका DNA आगे के HR वंसज को न जाए, यही ईश्वर से कामना है.

"बूरे वंश कबीर का उपजे पूत कमाल ! आधा तो कबीरा हुआ, आधा हुआ कमाल !!" HR के बंधुगण , या तो आप कबीर हो जाइए , या फॉर कमाल, जो उनका पुत्र था. आज HR में, तृष्णा है, त्याग नहीं, मोह है, लोभ है, भय है, असुरक्षा है, फिर तो बेटा "तुमसे न हो पायेगा. "


HR के सम्मान में कुछ पध लिखे गया हैं. इन्हे समझने की कोशिश करते हैं. 

HR की ज़िन्दगी जन्नत है. हनीमून की जगह. निरर्थक काम में लगे हैं HR वाले. 


HR वाले जब अति मूर्ख कहे  जाने लगें, आप  समझ लीजिए कुँए में भांग पड़ी है. 


Monday, July 4, 2016

बदनाम बादशाह के हरम की हूरें!


बदनाम बादशाह के हरम की हूरें!
एक फ्रेंच मल्टी नेशनल कंपनी के सीनियर मानव संसाधन मैनेजर ने अपने बायो डेटा में लिखा है-
पहले आपको बता दूँ की मैं क्या करना चाह रहा हूँ. मैं एक षड़यंत्र का शिकार हूँ. षड़यंत्र है- पिछले २ साल से  मानव संसाधन में नौकरी ढूंढ  रहा हूँ, ५०० कंपनियों में अप्लाई कर चूका हूँ पर कोई इंटरव्यू नहीं. मैं SIBM पुणे से MBA  हूँ और पिछले १३ साल में कुछ अच्छी MNC कम्पनीज़ में काम कर चूका हूँ. मुझे लगता है, कोई बड़ी बीमारी लग गयी है जॉब मार्किट को. IIT और IIM वाले भी, कई बार,  मजबूरी में start up कम्पनीज का रुख कर रहे  हैं. नतीजा साफ़ है. MNC companies इंडिया में अपने डिक्लाइन की ओर अग्रसर है. क्या कोई षड़यंत्र है? आइए जाँच शुरू करते हैं-

कई लोगों का मानना है. MNC एवरेज लोगों का अड्डा सा बन गया है. एवरेज और insecure managers  एंड सीनियर managers कमज़ोर और नपुंसक, लोगों को hire कर रहे हैं. इतना ही नहीं, ये इनको संरक्षण भी दे रहे हैं. "बस एक ही उल्लू काफी था, बर्बाद गुलिश्तां करने को! हर शाख पर उल्लू बैठा है ,अंजामें गुलिश्तां क्या होगा!"
सन २००७ ने मेरा सबसे बड़ा भ्रम अमरीकी लोगों के बारे में दूर कर दिया, जब मैं वहाँ HR वालों से मिला! वहाँ भी HR वालों का वही हाल है. Intellectually सबसे कमज़ोर लोग HR में हैं. कोई भ्रम नहीं की उनकी हैसियत एडमिन वालों जैसी रह गयी है.

एक MNC जिसमे मैंने बैंगलोर में  काम किया था, वहाँ के एक पूर्व HR साथी ने अपने बाई डेटा में लिखा है. साहब पहले सर्विस इंजीनियर थे, फिर   HR में आ गए. पिछले १० साल से उसी कंपनी में हैं. सैलरी २.५ लाख से २१ लाख पहुँच गयी है. आज भी शॉप फ्लोर के लिए आईटीआई अपरेंटिस ही hire करते हैं, पर जनाब क्लेम क्या करते हैं देखिये:
 Expertise in handling multifarious HR activities, viz. liaison with the business to transform into a highly profitable organization, Reducing overhead costs, rebuilding the business, institutionalized solid HR framework.

बड़े बड़े शब्दों का पुलिंदा देखिये- "ट्रांसफॉर्म", बिल्डिंग बिज़नेस, हाइली प्रॉफिटेबल आर्गेनाईजेशन, और इंस्टीट्ूशनलिसेद सॉलिड HR फ्रेमवर्क! 
सत्य यह है- इनकी बॉसेस, जो लगभग १ करोड़ की सैलरी लेते हैं, HR में, MSW वाले हैं. Public meeting में बोलने के नाम पर पैंट  गीली हो जाती है, company  में मज़ाक का पर्याय बन गए है. और ये, इनकी औलाद ट्रांसफॉर्म", बिल्डिंग बिज़नेस, हाइली प्रॉफिटेबल आर्गेनाईजेशन, सॉलिड HR फ्रेमवर्क! जैसे काम करने का दावा करती है. 
यह company पिछले साल इंडिया में ९७% loss डिक्लेअर कर चुकी है. इंडिया में लिस्टेड है. 

हाइली करप्ट लोगों का अड्डा है यह कंपनी. ऐसे में ये Business  वाले इम्पोटेंट और incompetent लोग ही hire करेंगे. यह षड़यंत्र है!
करप्ट लोग अपने आस-पास सपोर्ट फंक्शन में, कमज़ोर या characterless और जीरो integrity लोगों को ही भर्ती  करते हैं. बैंगलोर, ऐसी MNCs का सबसे बड़ा अड्डा है. यहां, कहीं, तमिलवाद , कहीं, मल्लू वाद, कहीं, अन्य वाद है. 
हायरिंग प्रोसेस की इंटीग्रिटी समाप्त हो चुकी है. MNC इस स्तर पर पहुँच जाएगा, इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते आप. 
HR में २५ लाख से ऊपर ही सैलरी पाने वालों का डेटा मैंने देखा तो उसमे ९०% लोग जो अच्छी कंपनियों में काम करते हैं, कोई भी मानद MBA  कॉलेज से नहीं आते. सिर्फ ग्रेजुएट भी ३५ से ५० लाख की सैलरी  पर हैं. 

कुछ HR के नाम पर फेक लोगों की सैलरी भी ३५ लाख से ऊपर है. मेरी आवाज़ शायद इस नक्कारखाने में टूटी की आवाज़ की तरह ही हो, पर कहते हैं न, कि "अकेला चना भांड नहीं फोड़ता, पर अगर हसरत से उड़ जाए तो भड़भूजे की आँख जरूर फोड़ देता है!
एक रिसेप्शनिस्ट जो १२ साल पहले HR  में आई इस MNC  में, १२ साल पहले भी HR बिज़नेस पार्टनर थी , आज भी HR बिज़नेस पार्टनर है. नो ,प्रमोशन  नो रोल चेंज, सैलरी ५ लाख से बढ़ कर ३५ लाख हो गयी. 
पढ़िए यह रिसेप्शनिस्ट अपने रोल के बारे में क्या कहती है उनके रिज्यूमे में-
"Influencing and Coaching Business Leaders, Executing and Enabling Organizational Changes, Leadership Development, Mergers and Acquisitions". 

दूसरी HR बिज़नेस पार्टनर, उसी कंपनी की एक HR बिज़नेस पार्टनर थी , उनके incompetency की कथा जग जाहिर है, पर वह HR Director की फेवरेट थीं , कई कारणों से, ४ साल हनीमून ही चला, कोई काम नहीं. फिर मैटरनिटी लीव पर गयी, और दूसरी कंपनी. पिछले ५ सालों में, ५ कम्पनीज में काम कर चुकी है. ४ लाख की सैलरी आज ७ साल में, २७ लाख है, US MNC में हेड HR हैं. 
उनके रिज्यूमे की एक झलक देखिये- 
KEY ACHIEVEMENTS/ ACCOMPLISHMENTS
·         Received accreditation and won “Lunch with CEO” contest for hiring project.
·         Career Progression & Job Rotation:

Employee Engagement SPOC for a unit of R&D and IT base with ----
·         Accredited by management for handling 25 separations of junior and middle level management in --- as part of acquisition process.
·         Work on Group HR project of position profiles of 100 benchmark positions within ---group. Trained on position profiling by Mercer Consulting 
·         Designed and rolled out a 360-degree feedback processes for Leadership team
·         HR Branding: Featured as Top employer in Naukri, participated in Attrition survey, participated in Job Fair, Endorsed Meritrac & Nasscom, etc.
·         Identified as key talent & nominated for Leadership Excellence Acceleration Program.

आप आश्चर्य करेंगे की इनके इंटरव्यू कौन लेता है? शायद इनके बॉसेस इनमें कुछ और ही देखते हैं. हायरिंग प्राइवेट अफेयर बन गयी है. कॉर्पोरेट इंटीग्रिटी समाप्त. 

जब २००६ में मैं इस MNC में R&D डिवीज़न के लिए, एडमिन अस्सिटैंट hire कर रहा था तो एक बिज़नेस VP (US manager ) कॉर्पोरेट ऑफिस से पूछे " what is the value for his services against the money we will paying him"? उसे मैं २ लाख के CTC पर hire कर रहा था. 
विडम्बना देखिये, उस कंपनी में, ऐसे कितने दामाद थे जिनको उनकी औकात से ३ से ४ गुना ज्यादा सैलरी मिल रही थी. इस C-tiye, VP से अब क्या पूछें, कि "दामादों के बारे में भी पूछो ! 
जब कंपनी को  डूबना  होता है तो वहाँ, गिद्ध जमा  हो जाते हैं. 

बदनाम बादशाह के हरम की हूरें! शायद आप इसकी एक झलक तो पा ही चुके होंगे अबतक. यह कहानी आप सब को मालूम है! बैठे ठालों का क्या रोज़गार? लिख दिया बस! 



Thursday, June 9, 2016

Workplace Abuse को कहो, "इसकी माँ की!

कुछ स्टार्ट  उप के फाउंडर्स , managers "fuck" , "fucked "इत्यादि शब्द का इस्तेमाल ऐसे करते  है जैसे इसके बगैर उनकी  उत्पत्ति  पर प्रश्न चिन्ह लग जाएगा.
मैं इनसे पूछना चाहता हूँ कि बगैर वियाग्रा (वीमेन वियाग्रा भी अब उपलब्ध है) के आप ३ मिनट नहीं चल पाते, ८ और ९ इंच आपके लिए सपना है और दिन में ३० बार अपनी टीम, क्लाइंट्स के सामने, ऑफिस बॉय और महिलाओं , बच्चिओं के सामने, अपने से उम्र और अनुभव में काफी ज्यादा लोगिन के सामने आप "fuck " चालीसा के माध्यम से क्या बताना चाहते हैं?
 कि आपकी उत्पत्ति किसी विशेष प्रक्रिया से हुई है या फिर जो कुमार विश्वास कहते हैं प्रेम के बारे में, जब उनके मित्र और कवि सम्पत शरण जी प्रेम करने वालों का उपहास करते हैं. "जिनसे कुछ नहीं हो पाया होता है, वे ही ज्यादा "पुराण" बांचते हैं.

मैंने दोस्तों से सुना है जो स्टार्टअप में काम करते हैं या कर चुके हैं, की उनकी फाउंडर्स मीटिंग में "fuck " शब्द का प्रयोग टीम पर अपनी बोस्सिसिम साबित करने के लिए या फिर अग्रेशन दिखाने के लिए या फिर टीम के अंदर सफलता के लिए एक बलात्कारी प्रवृत्ति भरने के लिए ऐसा करते हैं. ये तो भाई खतरनाक और बेहद शर्मनाक दशा है.

आज मैंने एक सीनियर मैनेजर को उनके टीम मेंबर्स को यह कहते सुना, "यह फाइल क्यों नहीं भेजा , क्या इसपर अंडे दे रहे थे? सबसे शर्मनाक और दुखद बात यह है कि , ऐसे अपशब्द, अश्लील वाक्य सबके सामने किसी को कह दिए जाते हैं. यह मानवता पर सबसे बड़ा आघात है. बेहद असंवेदनशील और बेशर्म , आततायी managers .
इसी कंपनी में महिला फाउंडर fuck पुराण दिन में १० बार से ज्यादा पढ़ती हैं. यह सब शायद उनके घर की परम्परा हो, हमें तो यह ही लगता है कि भारत में आज भी कर्मचारी ग़ुलाम है. बेड़ियां पड़ी हैं उसके पैरों में, ऐसी क्या मज़बूरी है की वह सब कुछ  सह लेता है?

क्या आपके आस-पास भी employee abuse हो रहा है? अगर हाँ तो ठीक से नीचे तक चेक कर लें कहीं आप अपनी असलियत तो नहीं खो बैठे हैं?

abuse को कहो, "इसकी माँ की!

Monday, May 30, 2016

एम्प्लोयी वेलफेयर का सुलतान, flipkart महान.

यह HR वाले करते क्या हैं?
सवाल जायज है. 

यह सवाल उतना ही पुराना ही जितनी की हमारी सभ्यता है. लेकिन आपके मैं यकीन दिलाना चाहता हूँ कि आईआईएम के बच्चों को शूली पर चढाने वाले HR वाले नहीं हैं. यह उनके आका IIT वाले व्यापारी हैं.
अभी flipkart का IIM ऑफर फ्लिप चर्चा में है. शायद १८ ऑफर्स पर  गाज गिर रही है. मुआवज़ा है डेढ़ लाख ६ महीने बाद जब जोइनिंग होगी. इसमें भी चालाकी. आप यह तो मानेंगे , HR वाले इतने चालाक नहीं हैं. यह भी बिज़नेस आका का ही फरमान है. HR सिर्फ अंग्रेजी बोलेगा और बाकी उन्हें IIT वाले बॉसेस बताते रहेंगे कि क्या और कितना बोलना है.
अब आपके पास मिलियन डॉलर वाले HR वाले हैं. HR में एक लम्बी फौज है. क्या आपको लगता है HR ने यहां कोई निर्णय लिया होगा? नहीं. उन्हें यह बता दिया गया होगा , "जोइनिंग डिले करना है, IIM को ईमेल लिख दो. बिज़नेस रीज़न बता दो. यह आदेश तो एडमिन असिस्टेंट को भी दिया जा सकता था. पर HR वाले होते किस लिए हैं. HR वालों को यह सब हैंडल करना बड़ा की सनसनी ख़ेज़ लगता है. ऐसे समय में, स्वनाम धन्य HR वाले अपने आप को बड़े काम की चीज़ समझने लगते हैं. पर जैसे की उन्हें मालूम पड़ता है, आका लोग डायरेक्ट आईआईएम, इत्यादि से बात करने लगे हैं तो HR फ़ौरन ही स्टैंडबाई मोड में आ जाता है..सस्ते टीवी प्रोग्राम के एंकर की तरह यह ऐसे समय में शाहंशाह की तरह महसूस करने लगते हैं पर क्षण भर में फिर भीगी बिल्ली! क्या आपको लगता है कि  डेढ़ लाख का मुआवज़ा वह भी डैफर्ड, HR ने तय किया है. यह सभी  ऑइ - 
वाश (eyewash) हैं. कुछ महीने पहले ही फ्लिपकार्ट के HR आका , जब आप मेटरनिटी, पैटरनिटी पालिसी की बड़ी-बड़ी डींग हांक गए. अभी तो यह फुल्ली पेड ६ महीने की मैटरनिटी लीव दे रहे थे, डेडिकेटेड पार्किंग, एडॉप्शन पालिसी, etc . फिर पता नहीं के-क्या. इतनी जल्दी हवा कैसे निकल जाती है? एम्प्लोयी वेलफेयर का सुलतान, flipkart महान. HR वाले भी अपनी महानता की रोटी सेक गए. आज सबसे इलीट समझे जाने वाले आईआईएम-अहमदाबाद को भी "टक्के-सेेर " ट्रीट कर दिया . यह कैसी मज़बूरी आ गयी सुलतान को ? 

अब इसमें HR कहाँ से आता है? उसको क्या पता कब बिज़नेस क्या करता है, क्या सोचता है? 

फिर मत पूछिएगा, HR करता क्या है? HR तो नेताजी की पत्नी की तरह है, बनारसी साडी पहन लेंगे जब आपकी चांदी रहेगी. पांचों ऊँगली घी में होंगे और आप सरकार होंगे. खद्दर भी चलेगा जब सरकार दिवालिया हो जायेगी. HR अगर कहीं आपको बिकिनी  में या निम्न वस्त्र में दीखता है तो यह भी सरकार की ही मनमानी है. 

भाई, HR कुछ नहीं करता ! मिल गया जवाब आपको? किसी कंपनी का हेल्थ चेक या कल्चर टेस्ट करना हो तो बेशक़ आपको सबसे अच्छी रिजल्ट HR को टेस्ट कर के मिल जायेगी. 
अब आप पूछेंगे, ऐसा कैसे है? क्या HR आर्गेनाईजेशन का आइना है? क्या HR आर्गेनाईजेशन को बनाता है या फिर HR आर्गेनाईजेशन की एक तश्वीर है जो उस परिवेश में उपजती है, पलती है, अपनी एक स्वरुप और प्रकृति को बना पाती है.? मैनिफेस्टेशन, DNA , पता नहीं क्या-क्या. बड़ा प्रश्न है. 
जो डोमिनेट कर गया, वह जीत गया. आप निर्णय कर लें.  शुभ रात्रि!

Wednesday, May 25, 2016

सावधान: आगे स्टार्ट अप है, कहीं आप फंस न जाएँ .

सावधान इंडिया !
फ्लिपकार्ट ने अब IIM  और IIT वालों के जोइनिंग डेट्स निरस्त कर दिए हैं. ६ महीने के लिए. अनिश्चितता का दौर स्टार्ट उप में चल रहा है. हम तो डूबेंगे सनम, तुमको भी ले डूबेंगे !
तश्वीर साफ़ हो जाएगी अगर आप निचे की ग्राफ देखेंगे.
आप पूछेंगे "कहाँ गए ये लोग?" यह तो कहानी है स्टार्ट अप की रंगीन और साहसी दुनिया की. व्यवसायी बनने  की. (Disrupt ) करने की. यूनिवर्स में डेंट लगाने की. इनके पास मौका है और इनमे काबिलियत भी है. IIM  और IIT और स्मार्ट लोग कर सकते हैं सब जो वो करना चाहते हैं पर जगह है सिलिकॉन वैली , गुरुग्राम, और बैंगलोर नहीं.
स्टार्ट अप डिसरप्टिव छोड़ कर अब वैल्यूएशन के गेम में फंस गया है. ये इंजीनियर स्टार्ट अप में भी नौकरी ही कर रहे हैं. बिज़नेस की कमान तो फाउंडर्स के हाथ में है और वे ग्रेट प्रोडक्ट की जिम्मेवारी टीम के ऊपर डाल कर CEO बन जाते हैं. सेलिब्रिटी स्टेटस मिल जाता है और बिज़नेस  पीछे छूट जाता है. एम्प्लोयी disillusioned हो जाता है. वह एम्प्लोयी की तरह फिर दूसरी नौकरी ढूंढ़ता है. पुराने स्ट्रक्चर्ड MNC की याद आ जाती है.  

Saturday, May 21, 2016

HR डिस्ट्रेस से गुज़र रहा है. अनन्त पीड़ा से गुज़र रहा है

HR को चाहिए आज़ादी.
वक़्त है आज़ादी का. मैं कन्हैया का फैन हूँ. उनके नारों का फैन हूँ. मैं भी JNU का छात्र रहा हूँ.
HR डिस्ट्रेस/यंत्रणा से गुज़र रहा है. अनन्त पीड़ा से गुज़र रहा है. कृष्ण की भूमिका से अब दास की , याचक की स्तिथि में आ गया है. पोस्टर बॉय /गर्ल अब पोस्टर के पीछे छुप गया  है. इसे चाहिए आज़ादी।  HR क्या अब सिर्फ "हारे को हरी नाम"! रह गया है? क्या सबसे ज्यादा insecure  एंड politicking  फंक्शन है यह? क्या यह यह इन्फेक्शन का श्रोत है? vulnerable भी और हेल्पलेस एंड उपेक्षित भी? इसे चाहिए आज़ादी! इसे चाहिए एक कृष्णा!

भूमिका-
HR का सो कॉल्ड लीडरशिप? अपनी पहचान नहीं बन सका.
LinkedIn और twitter पर अपनी पहचान ढूंढ रहा है. कुछ तो बस facebook तक ही अपनी इंटेलेक्चुअल काबिलियत सीमित कर लेते हैं. वेलफेयर स्टेट का सबसे बड़ा जीता -जागता उदहारण है HR . एक छद्म कोशिश, बिज़नेस enabler , catalyst , चेंज ऐजेंट , पता नहीं, कहाँ कहाँ से ये शब्द इन सेल्फ-proclaimed लोग ले कर आये.
Distress जीन्स के बाद अब समय चल रहा है डिस्ट्रेस हायरिंग का. यहां आपके रिज्यूमे का in-human, non nonsensical टार्चर किया जाता है. आपके एक्सपीरियंस एंड कैपेबिलिटी जो आप प्रूव कर चुके होते हो उसकी खिल्ली उड़ाई जाती है और, कोई नक्कारखाने की टूटी की तरह का फटा हुआ HR वाला आपकी बोली लगाता है.
अब ज़माना आ गया है, कौओं का. यह हंस को चलना सिखा रहे हैं.
२०० से ज्यादा लोग जाबलेस मिड एंड सीनियर मैनेजमेंट के बैंगलोर में जॉब ढूंढ रहे है क्योंकि ये अभी कुछ ६ से ८ महीनों पहले काम से निकाले गए हैं. ये ज्यादातर लोग प्रीमियर एजुकेशन बैकग्राउंड से हैं. HEADHUNTER  कंसल्टिंग के कृष् ने अभी एक आर्टिकल में उनके  १०० से ज्यादा बेरोज़गार और "लुकिंग फॉर नई ओप्पोर्तुनिटी" वाले  लोगों का डेटा बेस बता रहे थे. यह सिर्फ बैंगलोर का डेटा है और सायद सिर्फ HEADHUNTER का. सभी मेजर रिक्रूटिंग फर्म्स को जोड़ लें तो शायद दृश्य और भयावह लगे.

अगर यह सत्य है तो ऐसा क्यों हुआ और क्या इसमें कोई नेचुरल जस्टिस सम्मिलित है?

सिर्फ HR जिम्मेदार है अपनी स्तिथि के लिए. गुलाम बन गया. अड्डा बन गया नकारों का, फेल्ड लोगों का, वर्किंग हाउस वाइफ मं-सेट के लोगों का.. लोगों ने गवर्नर्स के जैसे अपने एजेंट बैठा दिए HR में. षड़यंत्र का ऐड बन गया यह जो कभी एम्प्लोयी वेलफेयर एंड वेल बीइंग का झंडाबरदार था. एक मर्यादा थी इसमें. एक मज़बूत इरादे और व्यक्तित्व के लोग आते थे. अब समय के साथ इसमें कम्फर्ट गर्ल्स के जैसे लोग भरते गए. घिन आती अब इससे.

वजह जो मुझे लगती है वह यह है कि समय के साथ, टेक्नोलॉजी एंड अवेयरनेस ने कई जॉब्स की अहमियत कम कर दी है. कई जॉब अब उतने महत्वपूर्ण नहीं लगते क्योंकि जनता उन जॉब स्किल्स और एक्सपीरियंस को अब जरूरी नहीं समझती. HR में यह काफी हुआ है, क्योंकि HR समय के साथ स्किल्स बेस्ड रिक्रूटिंग फंक्शन बन कर रह गया जहां बिसिनेस कोई २ पैसे का वैल्यू देखता है. coordination ही सही, HR के पास कोई काम तो है,
ट्रेनिंग भी कुछ बचा है वह भी सिर्फ कंप्लायंस की वजह से. पर्सोनेल मैनेजमेंट और वेलफेयर की अब कोई बात करता नहीं. सभी लो एन्ड ऑउट्सोर्सेड हो गए, पेरोल आउटसोर्स हो गया, ट्रेवल एडमिन/एकाउंट्स टेक अप्प्रोअवल और सब आसान है.
ज्ञान HR वालों से ज्यादा अब नए बच्चों के पास है।  वह HR वालों से ज्यादा अच्छी डिग्री और इंटेलिजेंस ले कर आते हैं. उनके मैनेजर्स उन्हें HR से हाइ  -हेलो तक ही सम्बद्ध रखने की सलाह देते हैं. लोगों को भी मालूम है, बाप तो मैनेजर है और मुझे HR सर्विस डिलीवर कर देगा जब मैं या मेरा मैनेजर उन्हें आदेश दे देगा. ऑफिस एडमिन भी वह सब कर सकता है, कहीं काम error  के साथ एंड timely भी. HR का संघर्ष अब बढ़ गया है. राम चरण  आगाह कर चुके हैं. टाइम टू split HR 

संता -बंता जोक्स के बाद कॉर्पोरेट में सबसे जियादा जोक्स HR पर ही बने हैं.
HR तो outdated  एंड useless साबित करने में राम चरण और कुछ अन्य ने कोई कमी नहीं छोड़ी है. HR रंगे सियार की तरह नया रंग लपेटकर आता है, कभी "Diversity एंड Inclusiveness " कभी टोटल रिवार्ड्स तो कभी टैलेंट मैनेजमेंट. ये सारे सीनियर और आउटडेटिड HR dinosaur  के नौकरी बचाउ जुगाड़ हैं! इनके नाम पर फ़ोकट के कांफ्रेंस में लंच डिनर और दारु मिलता है. ऑफिस से फ्री।
कंपनी में कोई नहीं सुनता है तो twitter पर इनके बचकाने स्टेटमेंट पढ़ लीजिए. कुछ तो है कि हमें भरोसा दिलाता है की हम बिलकुल कलियुग में हैं.

कल्पना कीजिये एक दिन के लिए "HR मुक्त विश्व का". इस मुक्त वाले स्टेटमेंट का अभी ट्रेंड चल रहा है. अगर कल से HR पर बैन  लग जाए तो क्या फर्क पड़ेगा? हायरिंग लोग अपने दोस्तों का ही करते हैं. कर लेंगे. कंपनसेशन मैनेजर डील कर लेते हैं, कर लेंगे. . HR की जगह ये लोग ऑफर लेटर प्रिंट कर लेंगे. पेरोल कंपनी को लेटर भेज देंगे, २ मिनट में आनबोर्डिंग . एडमिन वेंडर आईडी कार्ड बना देगा. डन ! प्रमोशन, ट्रेवल, सैलरी अप्रैज़ल मैनेजर ही तय करते हैं. जो पसंद नहीं आया फायर कर दिया. HR का काम एडमिन कर लगा. ESIC कवर्ड कुछ थर्ड पार्टी कांट्रेक्टर काफी कुछ मैनेज करते हैं. कर लेंगे.


मैंने कुछ समय पहले लिंकेडीन में एक आर्टिकल लिखा था कि अब हम स्किल्स के युग में हैं. आर्टिकल यहां पढ़े.
जब मैं अनुभवी लोगों से बात करता हूँ तो पाता हूँ कि "समय आ गया है जब सिर्फ "SKILLs बेस्ड हायरिंग होगी. यह चल रही है. एक्सपीरिंयस की हायरिंग अब महँगी लग रही है. अब २५ लाख की सैलरी वाले बेरोज़गार लोगों को ८ लाख के ऑफर्स मिलते हैं. वह भी कभी कभी शार्ट टर्म कांट्रैक्ट पर. स्थिति शर्मनाक है.
हम सभी एक अदृश्य बेरोज़गार दुनिया की तरफ बढ़ रहे हैं. HR की कोर्सेज में एडमिशन काफी गिर गए हैं.MBA  HR अब सबसे थके और कुछ इलीट के लिए एक फैंसी कोर्स रह गया है. बेहतर भी है. न रहेगी अपेक्षा न निराशा होगी. वर्किंग हाउसवाइफ जैसा एक टर्म शायद मैंने ही इज़ाद किया है. यह उस तरह की मानसिकता वाले मर्दों पर भी लागू होता है. यहाँ मेरा तात्पर्य जेंडर बायस करना नहीं है बल्कि एक मानसिकता की तरफ इशारा करना भर है.

यह कहानी चलती रहेगी... बाकी अगले अंक में. 

Friday, February 5, 2016

नाम बड़े और दर्शन छोटे

आईआईएम कथा- झोला छाप डाक्टर (होम्योपैथिक-आयुर्वेदिक, इत्यादि) अब ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट हेड है. जिसने कभी किसी भी जाने-माने कंपनी में न काम किया, न टीचिंग , न कॉर्पोरेट का कोई अनुभव है जिसमे, उसे हम बना देते हैं, आईआईएम का ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट हेड. नाम के आगे डॉक्टर लिख लेने से आप ऐसा सोच सकते हैं की शायद Ph.D हो. आईआईएम का बेडा अब ये झोला छाप डाक्टर पार लगाएंगे. सरकारी पने की भी हद्द होती है.
उनकी अंग्रेजी पढ़ लीजिये उनके लिंकेडीन पर प्लेसमेंट सम्बन्धी पोस्ट में, आप को पता लग जाएगा , क्या लेवल है. इस व्यक्ति को एक नए आईआईएम (पहला बैच) का ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट हेड कैसे बना सकते हैं. यह कोई थर्ड ग्रेड इंजीनियरिंग कॉलेज नहीं है जहां आईटी सर्विसेज कंपनी टेक सपोर्ट के लिए हायरिंग करने आती है. लोकल थिंकिंग की भी एक हद्द होती है. यहां तो यही दिख रहा है, मालिक पंजाबी, HR हेड पंजाबी, मालिक मराठी, HR हेड, मराठी, इत्यादि। नियुक्ति हो रही है या रिस्तेदारी। अब तो शादी भी बिरादरी में नहीं, बराबरी में होती होती है फिर यह प्रांतवाद क्यों, क्या इस आईआईएम में सभी प्लेसमेंट करने वाली कम्पनियाँ बंगाली या मराठी भाषा में सारे काम करती हैं? आईआईएम को तो बक्श दो भाई..

अफसोस की बात तो यह है कि ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट डिपार्टमेंट सिर्फ एडमिन रह गया है, खाना-पानी, कमरा, कुर्सी की व्यवस्था, ट्रेनिंग गायब, प्रोजेक्ट मैनेजमेंट नदारद, स्टूडेंट्स के प्रोजेक्ट में  वैल्यू ऐड शून्य. जो काम चपरासी कर सकते हैं, उसके लिए झोला छाप डाक्टर क्यों चाहिए फिर?

नाम बड़े और दर्शन छोटे

🐐 “बकरे की अम्मा कब तक ख़ैर मनाएगी?”

कॉर्पोरेट जंगल की एक लघु कथा, जिसमें किस्मत करवट लेती है और रिक्रूटर नटराज बन जाते हैं कॉर्पोरेट दुनिया में हर किसी की एक एक्सपायरी डेट हो...