Monday, May 30, 2016

एम्प्लोयी वेलफेयर का सुलतान, flipkart महान.

यह HR वाले करते क्या हैं?
सवाल जायज है. 

यह सवाल उतना ही पुराना ही जितनी की हमारी सभ्यता है. लेकिन आपके मैं यकीन दिलाना चाहता हूँ कि आईआईएम के बच्चों को शूली पर चढाने वाले HR वाले नहीं हैं. यह उनके आका IIT वाले व्यापारी हैं.
अभी flipkart का IIM ऑफर फ्लिप चर्चा में है. शायद १८ ऑफर्स पर  गाज गिर रही है. मुआवज़ा है डेढ़ लाख ६ महीने बाद जब जोइनिंग होगी. इसमें भी चालाकी. आप यह तो मानेंगे , HR वाले इतने चालाक नहीं हैं. यह भी बिज़नेस आका का ही फरमान है. HR सिर्फ अंग्रेजी बोलेगा और बाकी उन्हें IIT वाले बॉसेस बताते रहेंगे कि क्या और कितना बोलना है.
अब आपके पास मिलियन डॉलर वाले HR वाले हैं. HR में एक लम्बी फौज है. क्या आपको लगता है HR ने यहां कोई निर्णय लिया होगा? नहीं. उन्हें यह बता दिया गया होगा , "जोइनिंग डिले करना है, IIM को ईमेल लिख दो. बिज़नेस रीज़न बता दो. यह आदेश तो एडमिन असिस्टेंट को भी दिया जा सकता था. पर HR वाले होते किस लिए हैं. HR वालों को यह सब हैंडल करना बड़ा की सनसनी ख़ेज़ लगता है. ऐसे समय में, स्वनाम धन्य HR वाले अपने आप को बड़े काम की चीज़ समझने लगते हैं. पर जैसे की उन्हें मालूम पड़ता है, आका लोग डायरेक्ट आईआईएम, इत्यादि से बात करने लगे हैं तो HR फ़ौरन ही स्टैंडबाई मोड में आ जाता है..सस्ते टीवी प्रोग्राम के एंकर की तरह यह ऐसे समय में शाहंशाह की तरह महसूस करने लगते हैं पर क्षण भर में फिर भीगी बिल्ली! क्या आपको लगता है कि  डेढ़ लाख का मुआवज़ा वह भी डैफर्ड, HR ने तय किया है. यह सभी  ऑइ - 
वाश (eyewash) हैं. कुछ महीने पहले ही फ्लिपकार्ट के HR आका , जब आप मेटरनिटी, पैटरनिटी पालिसी की बड़ी-बड़ी डींग हांक गए. अभी तो यह फुल्ली पेड ६ महीने की मैटरनिटी लीव दे रहे थे, डेडिकेटेड पार्किंग, एडॉप्शन पालिसी, etc . फिर पता नहीं के-क्या. इतनी जल्दी हवा कैसे निकल जाती है? एम्प्लोयी वेलफेयर का सुलतान, flipkart महान. HR वाले भी अपनी महानता की रोटी सेक गए. आज सबसे इलीट समझे जाने वाले आईआईएम-अहमदाबाद को भी "टक्के-सेेर " ट्रीट कर दिया . यह कैसी मज़बूरी आ गयी सुलतान को ? 

अब इसमें HR कहाँ से आता है? उसको क्या पता कब बिज़नेस क्या करता है, क्या सोचता है? 

फिर मत पूछिएगा, HR करता क्या है? HR तो नेताजी की पत्नी की तरह है, बनारसी साडी पहन लेंगे जब आपकी चांदी रहेगी. पांचों ऊँगली घी में होंगे और आप सरकार होंगे. खद्दर भी चलेगा जब सरकार दिवालिया हो जायेगी. HR अगर कहीं आपको बिकिनी  में या निम्न वस्त्र में दीखता है तो यह भी सरकार की ही मनमानी है. 

भाई, HR कुछ नहीं करता ! मिल गया जवाब आपको? किसी कंपनी का हेल्थ चेक या कल्चर टेस्ट करना हो तो बेशक़ आपको सबसे अच्छी रिजल्ट HR को टेस्ट कर के मिल जायेगी. 
अब आप पूछेंगे, ऐसा कैसे है? क्या HR आर्गेनाईजेशन का आइना है? क्या HR आर्गेनाईजेशन को बनाता है या फिर HR आर्गेनाईजेशन की एक तश्वीर है जो उस परिवेश में उपजती है, पलती है, अपनी एक स्वरुप और प्रकृति को बना पाती है.? मैनिफेस्टेशन, DNA , पता नहीं क्या-क्या. बड़ा प्रश्न है. 
जो डोमिनेट कर गया, वह जीत गया. आप निर्णय कर लें.  शुभ रात्रि!

Wednesday, May 25, 2016

सावधान: आगे स्टार्ट अप है, कहीं आप फंस न जाएँ .

सावधान इंडिया !
फ्लिपकार्ट ने अब IIM  और IIT वालों के जोइनिंग डेट्स निरस्त कर दिए हैं. ६ महीने के लिए. अनिश्चितता का दौर स्टार्ट उप में चल रहा है. हम तो डूबेंगे सनम, तुमको भी ले डूबेंगे !
तश्वीर साफ़ हो जाएगी अगर आप निचे की ग्राफ देखेंगे.
आप पूछेंगे "कहाँ गए ये लोग?" यह तो कहानी है स्टार्ट अप की रंगीन और साहसी दुनिया की. व्यवसायी बनने  की. (Disrupt ) करने की. यूनिवर्स में डेंट लगाने की. इनके पास मौका है और इनमे काबिलियत भी है. IIM  और IIT और स्मार्ट लोग कर सकते हैं सब जो वो करना चाहते हैं पर जगह है सिलिकॉन वैली , गुरुग्राम, और बैंगलोर नहीं.
स्टार्ट अप डिसरप्टिव छोड़ कर अब वैल्यूएशन के गेम में फंस गया है. ये इंजीनियर स्टार्ट अप में भी नौकरी ही कर रहे हैं. बिज़नेस की कमान तो फाउंडर्स के हाथ में है और वे ग्रेट प्रोडक्ट की जिम्मेवारी टीम के ऊपर डाल कर CEO बन जाते हैं. सेलिब्रिटी स्टेटस मिल जाता है और बिज़नेस  पीछे छूट जाता है. एम्प्लोयी disillusioned हो जाता है. वह एम्प्लोयी की तरह फिर दूसरी नौकरी ढूंढ़ता है. पुराने स्ट्रक्चर्ड MNC की याद आ जाती है.  

Saturday, May 21, 2016

HR डिस्ट्रेस से गुज़र रहा है. अनन्त पीड़ा से गुज़र रहा है

HR को चाहिए आज़ादी.
वक़्त है आज़ादी का. मैं कन्हैया का फैन हूँ. उनके नारों का फैन हूँ. मैं भी JNU का छात्र रहा हूँ.
HR डिस्ट्रेस/यंत्रणा से गुज़र रहा है. अनन्त पीड़ा से गुज़र रहा है. कृष्ण की भूमिका से अब दास की , याचक की स्तिथि में आ गया है. पोस्टर बॉय /गर्ल अब पोस्टर के पीछे छुप गया  है. इसे चाहिए आज़ादी।  HR क्या अब सिर्फ "हारे को हरी नाम"! रह गया है? क्या सबसे ज्यादा insecure  एंड politicking  फंक्शन है यह? क्या यह यह इन्फेक्शन का श्रोत है? vulnerable भी और हेल्पलेस एंड उपेक्षित भी? इसे चाहिए आज़ादी! इसे चाहिए एक कृष्णा!

भूमिका-
HR का सो कॉल्ड लीडरशिप? अपनी पहचान नहीं बन सका.
LinkedIn और twitter पर अपनी पहचान ढूंढ रहा है. कुछ तो बस facebook तक ही अपनी इंटेलेक्चुअल काबिलियत सीमित कर लेते हैं. वेलफेयर स्टेट का सबसे बड़ा जीता -जागता उदहारण है HR . एक छद्म कोशिश, बिज़नेस enabler , catalyst , चेंज ऐजेंट , पता नहीं, कहाँ कहाँ से ये शब्द इन सेल्फ-proclaimed लोग ले कर आये.
Distress जीन्स के बाद अब समय चल रहा है डिस्ट्रेस हायरिंग का. यहां आपके रिज्यूमे का in-human, non nonsensical टार्चर किया जाता है. आपके एक्सपीरियंस एंड कैपेबिलिटी जो आप प्रूव कर चुके होते हो उसकी खिल्ली उड़ाई जाती है और, कोई नक्कारखाने की टूटी की तरह का फटा हुआ HR वाला आपकी बोली लगाता है.
अब ज़माना आ गया है, कौओं का. यह हंस को चलना सिखा रहे हैं.
२०० से ज्यादा लोग जाबलेस मिड एंड सीनियर मैनेजमेंट के बैंगलोर में जॉब ढूंढ रहे है क्योंकि ये अभी कुछ ६ से ८ महीनों पहले काम से निकाले गए हैं. ये ज्यादातर लोग प्रीमियर एजुकेशन बैकग्राउंड से हैं. HEADHUNTER  कंसल्टिंग के कृष् ने अभी एक आर्टिकल में उनके  १०० से ज्यादा बेरोज़गार और "लुकिंग फॉर नई ओप्पोर्तुनिटी" वाले  लोगों का डेटा बेस बता रहे थे. यह सिर्फ बैंगलोर का डेटा है और सायद सिर्फ HEADHUNTER का. सभी मेजर रिक्रूटिंग फर्म्स को जोड़ लें तो शायद दृश्य और भयावह लगे.

अगर यह सत्य है तो ऐसा क्यों हुआ और क्या इसमें कोई नेचुरल जस्टिस सम्मिलित है?

सिर्फ HR जिम्मेदार है अपनी स्तिथि के लिए. गुलाम बन गया. अड्डा बन गया नकारों का, फेल्ड लोगों का, वर्किंग हाउस वाइफ मं-सेट के लोगों का.. लोगों ने गवर्नर्स के जैसे अपने एजेंट बैठा दिए HR में. षड़यंत्र का ऐड बन गया यह जो कभी एम्प्लोयी वेलफेयर एंड वेल बीइंग का झंडाबरदार था. एक मर्यादा थी इसमें. एक मज़बूत इरादे और व्यक्तित्व के लोग आते थे. अब समय के साथ इसमें कम्फर्ट गर्ल्स के जैसे लोग भरते गए. घिन आती अब इससे.

वजह जो मुझे लगती है वह यह है कि समय के साथ, टेक्नोलॉजी एंड अवेयरनेस ने कई जॉब्स की अहमियत कम कर दी है. कई जॉब अब उतने महत्वपूर्ण नहीं लगते क्योंकि जनता उन जॉब स्किल्स और एक्सपीरियंस को अब जरूरी नहीं समझती. HR में यह काफी हुआ है, क्योंकि HR समय के साथ स्किल्स बेस्ड रिक्रूटिंग फंक्शन बन कर रह गया जहां बिसिनेस कोई २ पैसे का वैल्यू देखता है. coordination ही सही, HR के पास कोई काम तो है,
ट्रेनिंग भी कुछ बचा है वह भी सिर्फ कंप्लायंस की वजह से. पर्सोनेल मैनेजमेंट और वेलफेयर की अब कोई बात करता नहीं. सभी लो एन्ड ऑउट्सोर्सेड हो गए, पेरोल आउटसोर्स हो गया, ट्रेवल एडमिन/एकाउंट्स टेक अप्प्रोअवल और सब आसान है.
ज्ञान HR वालों से ज्यादा अब नए बच्चों के पास है।  वह HR वालों से ज्यादा अच्छी डिग्री और इंटेलिजेंस ले कर आते हैं. उनके मैनेजर्स उन्हें HR से हाइ  -हेलो तक ही सम्बद्ध रखने की सलाह देते हैं. लोगों को भी मालूम है, बाप तो मैनेजर है और मुझे HR सर्विस डिलीवर कर देगा जब मैं या मेरा मैनेजर उन्हें आदेश दे देगा. ऑफिस एडमिन भी वह सब कर सकता है, कहीं काम error  के साथ एंड timely भी. HR का संघर्ष अब बढ़ गया है. राम चरण  आगाह कर चुके हैं. टाइम टू split HR 

संता -बंता जोक्स के बाद कॉर्पोरेट में सबसे जियादा जोक्स HR पर ही बने हैं.
HR तो outdated  एंड useless साबित करने में राम चरण और कुछ अन्य ने कोई कमी नहीं छोड़ी है. HR रंगे सियार की तरह नया रंग लपेटकर आता है, कभी "Diversity एंड Inclusiveness " कभी टोटल रिवार्ड्स तो कभी टैलेंट मैनेजमेंट. ये सारे सीनियर और आउटडेटिड HR dinosaur  के नौकरी बचाउ जुगाड़ हैं! इनके नाम पर फ़ोकट के कांफ्रेंस में लंच डिनर और दारु मिलता है. ऑफिस से फ्री।
कंपनी में कोई नहीं सुनता है तो twitter पर इनके बचकाने स्टेटमेंट पढ़ लीजिए. कुछ तो है कि हमें भरोसा दिलाता है की हम बिलकुल कलियुग में हैं.

कल्पना कीजिये एक दिन के लिए "HR मुक्त विश्व का". इस मुक्त वाले स्टेटमेंट का अभी ट्रेंड चल रहा है. अगर कल से HR पर बैन  लग जाए तो क्या फर्क पड़ेगा? हायरिंग लोग अपने दोस्तों का ही करते हैं. कर लेंगे. कंपनसेशन मैनेजर डील कर लेते हैं, कर लेंगे. . HR की जगह ये लोग ऑफर लेटर प्रिंट कर लेंगे. पेरोल कंपनी को लेटर भेज देंगे, २ मिनट में आनबोर्डिंग . एडमिन वेंडर आईडी कार्ड बना देगा. डन ! प्रमोशन, ट्रेवल, सैलरी अप्रैज़ल मैनेजर ही तय करते हैं. जो पसंद नहीं आया फायर कर दिया. HR का काम एडमिन कर लगा. ESIC कवर्ड कुछ थर्ड पार्टी कांट्रेक्टर काफी कुछ मैनेज करते हैं. कर लेंगे.


मैंने कुछ समय पहले लिंकेडीन में एक आर्टिकल लिखा था कि अब हम स्किल्स के युग में हैं. आर्टिकल यहां पढ़े.
जब मैं अनुभवी लोगों से बात करता हूँ तो पाता हूँ कि "समय आ गया है जब सिर्फ "SKILLs बेस्ड हायरिंग होगी. यह चल रही है. एक्सपीरिंयस की हायरिंग अब महँगी लग रही है. अब २५ लाख की सैलरी वाले बेरोज़गार लोगों को ८ लाख के ऑफर्स मिलते हैं. वह भी कभी कभी शार्ट टर्म कांट्रैक्ट पर. स्थिति शर्मनाक है.
हम सभी एक अदृश्य बेरोज़गार दुनिया की तरफ बढ़ रहे हैं. HR की कोर्सेज में एडमिशन काफी गिर गए हैं.MBA  HR अब सबसे थके और कुछ इलीट के लिए एक फैंसी कोर्स रह गया है. बेहतर भी है. न रहेगी अपेक्षा न निराशा होगी. वर्किंग हाउसवाइफ जैसा एक टर्म शायद मैंने ही इज़ाद किया है. यह उस तरह की मानसिकता वाले मर्दों पर भी लागू होता है. यहाँ मेरा तात्पर्य जेंडर बायस करना नहीं है बल्कि एक मानसिकता की तरफ इशारा करना भर है.

यह कहानी चलती रहेगी... बाकी अगले अंक में. 

Friday, February 5, 2016

नाम बड़े और दर्शन छोटे

आईआईएम कथा- झोला छाप डाक्टर (होम्योपैथिक-आयुर्वेदिक, इत्यादि) अब ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट हेड है. जिसने कभी किसी भी जाने-माने कंपनी में न काम किया, न टीचिंग , न कॉर्पोरेट का कोई अनुभव है जिसमे, उसे हम बना देते हैं, आईआईएम का ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट हेड. नाम के आगे डॉक्टर लिख लेने से आप ऐसा सोच सकते हैं की शायद Ph.D हो. आईआईएम का बेडा अब ये झोला छाप डाक्टर पार लगाएंगे. सरकारी पने की भी हद्द होती है.
उनकी अंग्रेजी पढ़ लीजिये उनके लिंकेडीन पर प्लेसमेंट सम्बन्धी पोस्ट में, आप को पता लग जाएगा , क्या लेवल है. इस व्यक्ति को एक नए आईआईएम (पहला बैच) का ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट हेड कैसे बना सकते हैं. यह कोई थर्ड ग्रेड इंजीनियरिंग कॉलेज नहीं है जहां आईटी सर्विसेज कंपनी टेक सपोर्ट के लिए हायरिंग करने आती है. लोकल थिंकिंग की भी एक हद्द होती है. यहां तो यही दिख रहा है, मालिक पंजाबी, HR हेड पंजाबी, मालिक मराठी, HR हेड, मराठी, इत्यादि। नियुक्ति हो रही है या रिस्तेदारी। अब तो शादी भी बिरादरी में नहीं, बराबरी में होती होती है फिर यह प्रांतवाद क्यों, क्या इस आईआईएम में सभी प्लेसमेंट करने वाली कम्पनियाँ बंगाली या मराठी भाषा में सारे काम करती हैं? आईआईएम को तो बक्श दो भाई..

अफसोस की बात तो यह है कि ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट डिपार्टमेंट सिर्फ एडमिन रह गया है, खाना-पानी, कमरा, कुर्सी की व्यवस्था, ट्रेनिंग गायब, प्रोजेक्ट मैनेजमेंट नदारद, स्टूडेंट्स के प्रोजेक्ट में  वैल्यू ऐड शून्य. जो काम चपरासी कर सकते हैं, उसके लिए झोला छाप डाक्टर क्यों चाहिए फिर?

नाम बड़े और दर्शन छोटे

Sunday, January 31, 2016

आवश्यकता स्कॉलर्स की है, रिसर्च एसोसिएट्स की है

सुनील सर, आपके विचार अच्छे हैं पर इनको पूरा करने के लिए मानव संसाधन विभाग की आवशयकता नहीं हैं. आवश्यकता स्कॉलर्स की है, रिसर्च एसोसिएट्स की है. कोई मानव संसाधन का संस्थान ये दोनों नहीं बनाते. सिलेबस देख लीजिये, पचरंगा आचार लगेगा. एक ऐसा पेपर दिखला दीजिये XLRI या टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंस से जो आपकी मानव संसाधन रिसर्च या स्कॉलर्स की श्रेणी में आता हो!

जैसा की राम चरण ने कहा : मानव संसाधन को दो भागों में बाँट देने की जरूरत है; मानव संसाधन एडमिन और मानव संसाधन -लीडरशिप आर्गेनाईजेशन. पहला चीफ फाइनेंसियल अफसर को रिपोर्ट करे और दूसरा चीफ एग्जीक्यूटिव अफसर को. जब तक ऐसा नहीं करेंगे, मानव संसाधन विभाग सामाजिक सरोकार ही निभाता रहेगा. पेरसोंनेल मैनेजमेंट वर्कर्स के लिए कमाल का काम करता था, हेल्थ एंड सेफ्टी, क्रेच, कैंटीन, ट्रांसपोर्ट, मैनेजमेंट-वर्कर नेगोसिऎसन बाई कलेक्टिव बार्गेनिंग, अप्रेंटिसशिप मैनेजमेंट, ट्रेनिंग , इत्यादि. ये सभी १००% ROI बेस्ड थे. किसी पर्सनेल मैनेजर को कभी २ और ४ करोड़ की सैलरी नहीं मिली. आज सेलिब्रिटी HR मैनेज करते हैं, जैसा आपने कहा डी (डेवलपमेंट) मिसिंग है. फिर हुआ क्या, सिर्फ धोखा, सिर्फ HR कंसल्टिंग आर्गेनाईजेशन के फंडों का कॉपी पेस्ट।  कंपनसेशन एंड बेनिफिट्स जो करता है, उसे देख कर आप सर पीट लेंगे, जॉब कोड मैचिंग, लेटर प्रिंटिंग, एक्सेल फाइल में बोनस कॉलम एडजस्टमेंट, रोउंडिंग ऑफ ऑफ़ डेसीमल फिगर्स. शर्मनाक. HCL का सैलरी स्लिप देखा अभी, HRA और बेसिक दोनों बराबर हैं. शर्मनाक। साल के दस दिन के काम के लिए कंपनसेशन एंड बेनिफिट्स वालों को पूरे साल की सैलरी मिलती है. वैल्यू ऐड-जीरो.

लर्निंग एंड डेवलपमेंट स्लाइड्स पढता है या फिर असेसमेंट फॉर्म्स भरवाते है. किसी भी महान लर्निंग एंड डेवलपमेंट वाले के बारे में ट्रैनीस की फीडबैक ले लीजिये, सच सामने आ जायेगा. आपने सच कहा, मिल्लेनिएल को आप डेलेवोप करना चाहते हैं, वो आपसे बेहतर डिग्री और एजुकेशन रखते हैं. मैंने पढ़े लिखे समार्ट एम्प्लाइज को HR के ऊपर बस जोक करते सुना है. ले देकर, ज्यादातर HR वाले, रिक्रूटमेंट कोऑर्डिनेशन करके नौकरी बचा रहे हैं. जंग लग चुका है, इस डिपार्टमेंट में, "स्पॉन्सर्ड कैंडिडेट" भर गए हैं, कोटरी (coterie ) बन चुके है. कोई प्रीमियर बी स्कूल नहीं, कोई रीसर्च नहीं, कोई Ph.D नहीं, कोई पेपर पब्लिश्ड नहीं, कोई केलेब्रटेड अचीवमेंट नहीं, पर बन गए ग्लोबल टैलेंट मैनेजमेंट एंड डेवलपमेंट हेड.

रेसेअर्चेर्स और स्कॉलर्स भरिये वरना बेडा तो ग़र्क़ हो ही चुका  है. CHRO , २ से १.५ साल में कंपनी बदल रहे हैं या फिर निकाल दिए जाते हैं. फिर वे अपने दोस्तों को नयी कंपनी में भर लेते हैं. शर्मनाक।

Reference- HR sitting on a time-bomb-HBR reviews.

यह भी पढ़ लें - https://www.linkedin.com/pulse/hr-dead-alive-mark-edgar
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Saturday, January 30, 2016

आंबेडकर के बाद कांशी राम और बाकी सब राम-राम.

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रोहित वेमुला की जाति ज्यादा महत्वपूर्ण है या सरकारी संस्थाओं की हिटलरी?
भारत में एक्सट्रीम नहीं चलता. न ही सॉफ्ट एक्सट्रीम न ही हार्ड! एक्सट्रीम सॉफ्ट एक्सटिंक्ट हो जाते हैं, और एक्सट्रीम हार्ड एक्सटिंक्ट कर दिए जाते हैं. मॉडरेट बेस्ट हैं..  भावनाएं,संवेदनाएं, उबाल, सभी हाइपरटेंशन का कारण हैं. अतिरेक बिमारी का नाम है. बैलेंस बना कर चलना होगा. आंबेडकर साहब ने नारा दिया "जाति तोड़ो, समाज जोड़ो" ६८ वर्षों के बाद भी अभी भी दलित एक्सिस्ट करते हैं, और कितने साल लगेंगे जाति तोड़ने में? जब तक रिजर्वेशन है, तब तक, जाति है, तब तक दलित जैसा शब्द है, तब तक दलित राजनितिक पार्टी है, तब तक, १५ % नंबर में आईआईटी की सीट है, तब तक, धनाढ्य दलित आईएएस के बच्चे टॉप इंस्टीटूटेस में आसानी से हैं, तब तक सरकारी नौकरी उनकी आसानी से है, तब तक प्रमोशन फटाफट है. दलित से दलित-इलीट हटाओ। सारा माल तो ये इलीट दलित मार जाते हैं.. रोहित तो मेरिट कोटा से फेलोशिप कर रहा था. क्या सिर्फ राजनीती वाले ही दलित की बात करेंगे, चाहे राजनीतिक कारण से हो? कहाँ गए वे लाखों दलित आईएएस और अन्य सरकारी बाबू? उनमें से कोई रोहित के लिए क्यों संवेदना दिखलाने के लिए हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के बाहर कैंडल मार्च ही निकालता? रिजर्वेशन ने स्वार्थी बनाये हैं, इलीट जो सिर्फ अपना हित साधना जानते हैं. जब आज भी १५%  नंबर पर आईआईटी की सीट मिलता है तो क्यों नहीं उन दलित आईएएस सेक्रेटरी से सरकार यह पूछती, कब देश का , कब अपने दलित  बंधुओ का सोचोगे, कुछ करोगे? आंबेडकर के बाद कांशी राम और बाकी सब राम-राम. 

Monday, January 25, 2016

क्या कोई षड्यंत्र है? क्या जाति विशेष की कोई निश्चित प्रवृत्ति होती है?

क्या कोई षड्यंत्र है? क्या जाति विशेष की कोई निश्चित प्रवृत्ति होती है?
सामजिक-आर्थिक रूप से सफल लोगों को ही देख लेते हैं. क्या इनमें कोई विशेष गुण है जो इन्हे सफल बनाता है?
क्यों बंगाली और मलयाली नौकरियों में ज्यादा सफल हो जाते हैं? क्यों बनिये व्यापार में सफल होते से लगते हैं?
क्या उन्हें व्यापार करने के गूढ़ रहस्य मालूम हैं? या फिर सिर्फ व्यवहार-सरोकार के ये पुजारी हैं?
कैसे जानें इनमें ये गुण कैसे आते हैं? कैसे ये इन गुणों की बदौलत अपनी मंज़िल पाते हैं.
प्राइवेट नौकरियों को अगर देखें तो, इसकी शुरूआत टाटा और बिरला या बजाज ग्रुप से निकल कर आता है. इन कंपनियों में मजदूर वर्ग बिहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र से आया, तकनिकी काम के लिए, दक्षिण भारत और महाराष्ट्र का वर्ग जुड़ा. बंगाली ऑफिस के काम के लिए रखे गए. उन्हें कुछ अंग्रेजी आती थी और ये बड़े अफसरों के सामने बिलकुल मेमनों जैसा हाव-भाव रखते थे. ये उनके सहमति और असहमति दोनों से बराबर ही सहमति प्रकट करते थे. ये अपने विचार फुटबॉल, मुरी घोंटो , नक्सलबाड़ी, सिगरेट , कार्ल मार्क्स, इत्यादि तक सीमित रखते हैं.
इन्होंने सबसे पहले याद कर लिए था.. नौकरी मतलब, मुह पर ताला, विचार, विमर्श  घर पर. बॉस का पाद भी गीता का ज्ञान, ऑफिस में शांत, लगभग अदृश्य, अच्छी अंग्रेजी ड्राफ्टिंग, एकाउंट्स साफ़ और साधा. कानून के पुजारी। लेकिन जैसा की हर कुत्ते का दिन आता है, बंगाली बंधू भी पदोन्नति पा कर, एक दिन अफ़सर बनते हैं. सिगरेट का डब्बा अब इनकी आइडेंटिटी बनता है, फ़िएट कार आती है, नमस्कार दादा, दीदी, ऑफिसियल सम्बन्ध बोधक बन जाते हैं. धीरे -धीरे बंगाली भाषा लिंग्वा-फ़्रन्का बन जाती है. सारे क्लासिफाइड संवाद इसी भाषा में कुछ अन्य बंगाली अधिकारी, सहयोगियों के साथ होने लगते हैं. बंगाली बंधु कौम के बड़े पक्के होते हैं. द्रुत गति से आप इनके विभाग में बंगालियों की नियुक्ति होते देखेंगे. मधुमक्खी के छत्ते की तरह इनका विकास होता है. उदाहरण मैंने बंगालियों का लिया, इनके ही दक्षिण भारत के बंधू हैं..मलयाली. अद्भुत समानता है दोनों में; दोनों शौकीन कौम है. इनका कुत्ता, दारु, कार प्रेम एक सामान है. दोनों समाज उन्मुक्त है, साइड डिश दोनों को चाहिए, खाने और सोने में भी . दोनों कोस्टल एरियाज से हैं, दोनों मच्छी भक्त हैं.. दोनों समाज एडुकेटेड एंड क्वालिफाइड हैं, दोनों समाज में महिला मुक्त है, आर्थिक रूप से आत्म निर्भर है. संगीत -गायन और वादन दोनों के मीठे हैं. करैक्टर दोनों के ढीले हैं, परन्तु उनका समाज इसकी इजाजत देता है. यहां सब सहमति से होता है, कोई शोषण नहीं है. दोनों अपने लोगों को ही अपने साथ जोड़ते हैं, अगर यह क़ौम है तो यह फिर कम्युनल हैं.

जैसे लोमड़ी को चालाकी सीखनी नहीं पड़ती, वैसे ही इन्हे व्यावहारिक ज्ञान जन्मजात मिलता है. मलयाली बच्चे और बंगाली बच्चे एक साथ खेलते मिलेंगे. यही रिश्ता कॉलेज, फिर नौकरी तक चलता जाता है पर दोनों अपने कौम को ही सहयोग करेंगे. कॉलेज का प्लेसमेंट सेल का कम्पोजीशन किसी भी बिज़नेस स्कूल में देख लीजिये, आप वहाँ बंगाली और मलयाली बहुतायत में पायेंगे. इनका रिश्ता बंदरों और हिरणोँ जैसा है. बन्दर हिरणों के लिए पेड़ हिला कर फल गिराते हैं, दोनों एक दुसरे को शिकारी पशु या व्यक्ति से सतर्क करते हैं। परन्तु वंश वृद्धि तो यह अपनी ही करते हैं. जायज़ है.

आपके अगर कोई विचार हों तो अवश्य लिखे.
शुभ रात्रि!


🐐 “बकरे की अम्मा कब तक ख़ैर मनाएगी?”

कॉर्पोरेट जंगल की एक लघु कथा, जिसमें किस्मत करवट लेती है और रिक्रूटर नटराज बन जाते हैं कॉर्पोरेट दुनिया में हर किसी की एक एक्सपायरी डेट हो...