Monday, March 20, 2017

फिलांथ्रोपिस्ट , सोशल सीईओ! | क्या बिज़नस वाली टेक वर्ल्ड में सोशल एंटरप्राइज की कोई बिसात नहीं?

आज मेरी एक आईटी सर्विसेज कंपनी के फाउंडर से बात हो रही थी ! कंपनी १५०-२०० लोगों की है. फाउंडर स्वयं टेक्नोक्रैट -टेक आर्किटेक्ट हैं. फिलांथ्रोपिस्ट , सोशल सीईओ ! अच्छे इंसान पर कहीं न कहीं अपने सोशल एंटरप्राइज की छोटी सी दुनिया में सिमटे और कुछ उलझे से भी. संवेदनाएं अपनों के लिए कहीं ज्यादा , संभावनाओं और भविष्य के लिए कुछ कम शायद.
सोशल एंटरप्राइज की मानसिकता कहीं न कहीं वेलफेयर स्टेट की स्वयंभू और सर्वजन हिताए, सर्वजन सुखाये की योजना लगती है. शायद इसे ही बायस कहते हैं. कई अच्छे सोशल सीईओ इस सोशलिस्ट फलसफा के ही शिकार हो जाते हैं.
बिज़नस एक रेस है जिसमे हारने वाले को कोई मैडल नहीं देता. जीतने के लिए दूसरों को शिकस्त देनी पड़ती है. बिज़नस को आकर्षक बनाने के लिए प्रॉफिटेबल बनाना पड़ता है. जब बड़ी और इंटेलीजेंट कंपनी आपको एक्वायर करना चाहे, आपके सीईओ और लीडर्स को मिलना चाहे, आपकी टेक /बिज़नस इंटरव्यूज को नोटिस करने लगे, समझ लीजिये आप अपने लोगों की ज़िन्दगी बदल चुके. सिर्फ वेलफेयर स्टेट लोगों को आश्रित बना देता है, कहीं निर्भर, बेचारा और असुरक्षित भी. क्या बिज़नस वाली टेक वर्ल्ड में सोशल एंटरप्राइज की कोई बिसात नहीं? 

जंग जीतनी है तो भीड़ नहीं , कमांडोज़ चाहिए, फॉलोवर्स कम लीडर्स ज्यादा चाहिए। लोगों को सक्सेस और लाइम लाइट पसंद है, टेक वर्ल्ड में अपनी भी कोई पहचान चाहिए तो , सीईओ और अन्य लीडर्स की छात्र छाया से निकल कर आगे आना होगा! संरक्षण और तुष्टिकरण लीडर्स नहीं, मजबूर और आश्रित जनसँख्या बनाते हैं.

रिले रेस जीतने के लिए सभी स्प्रिंटर्स लगते हैं.
६ सिग्मा बनने के लिए सारे स्टेप्स और लोग और टेक्नोलॉजी और लीडरशिप ६ सिग्मा ही चाहिए.
६ सिग्मा +३ सिग्मा +४ सिग्मा =३ सिग्मा और उससे भी बेकार क्वालिटी!
कहते हैं, शहर की ट्रैफिक का एवरेज -स्पीड सबसे धीरे चलने वाले वाहन तय करते हैं. 
बैंगलोर सिटी का ट्रैफिक एवरेज स्पीड ९ किलोमीटर प्रति घंटे है. कई कोर एरियाज में तो बैंगलोर ५ किलोमीटर प्रति घंटे की गति से चलता है. बैंगलोर का बेस्ट एवरेज स्पीड १८ किलोमीटर प्रति घंटे है.

लीडर को समझना होगा, तेज़ चलना पहली प्राथमिकता है!
तेज़ चलने का सबसे साधारण मतलब है, परिवर्तन. लोग सामान्यतया धीरे चलना चाहते है. जब तक आप चलते रहेंगे, आप भीड़ के साथ होंगे, जब तेज़ चलेंगे यानि दौड़ेंगे तो फिर भीड़ छट जायगी. 
परिवर्तन बाहर वाले लाते हैं. चेंज एजेंट, कैटेलिस्ट, उन्हें सम्मान से आमंत्रित कीजिये. उनका बेहद लिहाज़ कीजिये.
इसी बेहद लिहाज़ कीजिये से याद आ गए, रॉकस्टार शायर जॉन औलिया. इनको गौर से सुनिये ज़नाब !




Wednesday, March 15, 2017

क्या आप क्लोज़अप करते हैं? फिर क्यों दुनिया से डरते हैं?

फिल्म 'मैंने प्यार किया' का एक डायलाग है; एक लड़का और लड़की कभी दोस्त...
अपोजिट सेक्स का अट्रैक्शन नेचुरल है, किसी भी उम्र में. आकर्षक लोग चुम्बकीय प्रभाव डालते हैं, फिर पाओं को डगमगा देते हैं, धड़कन बढ़ती है, आप बह निकलते हैं.. कसूर किसका है? आप तय कर लीजिये.

यह सब तो ठीक है, पर जब आप इंसान को जिस्म, खुश्बू और भोग की वस्तु की तरह देखने लगते हैं तो फिर आप जानवर हो चले हैं, शायद हैवान जो बस भूख जानता है, जिस्म की भूख, जरूरत?
१३ मार्च का टाइम्स ऑफ़ इंडिया , हैदराबाद एडिशन पढ़ रहा था, १८ से ३० वर्ष की महिलाओं नें, कहा है कि उन्हें अपने पड़ोसियों और सहकर्मियों से बलात्कार का सबसे बड़ा खतरा लगता है. हैदराबाद में, एक वर्ष में, महिलाओं के प्रति अपराध में २५% की व्रिद्धि हुई है.
किस तरह के समाज की विकृति में हम बढ़ रहे हैं, शोषण, बलात्कार, और क्या-क्या? हमें इसे बदलना होगा.
समाज बदल रहा है, औरते, लडकियां, स्वतंत्र हैं, वेश-भूसा, सृंगार , बदला है. हम मर्द अब इसे नये तरह से देखने लगे हैं. हम अब इसे जिस्म की नुमाइश समझ रहे हैं, हम इसे अब चरित्र की विघटन की तरह देख रहे हैं. वक़्त लगेगा नज़रिया बदलने में. लोग स्वतंत्रता चाहते हैं, अपनी मर्जी की ज़िन्दगी अपने तरह से जीना चाहते हैं, उनका हक़ है, समाज कम बदला, लोग तेज़ी से बदल गए. फिल्मों का असर, विदेशी संस्कृति का असर कह लें, पर हम अब स्वयं की धुरी के इर्द-गिर्द अपने आदर्श, मॉरल्स चुनते हैं, दूसरे क्या सोचते हैं, उनकी बला से.
१५-१७ साल के बच्चे अपनी ज़िन्दगी अपनी तरह से जीना चाहते हैं, खाना, पहनना, दोस्त बनाना, फिर आगे बढ़ कर गर्लफ्रेंड , बॉयफ्रेंड चुनते हैं, फिर वर्कप्लेस में नए सिरे से नये लोगों से मिलते हैं. वर्कप्लेस में, वैसे लोग भी होते हैं, जो ज़िन्दगी को और भी स्वछन्द हो कर जीना चाहते हैं, कुछ खुले विचारों की वकालत में, कुछ तरक्की और नए रिश्तों की होड़ में. फिर शुरू होता है, समझौतों का दौर, ब्रेक अप , नए रिश्ते , फिर आदत हो जाती है. कुछ और भी ज्यादा , और भी जल्दी, सब कुछ एक साथ पाना चाहते हैं. फिर छल , कपट, दुराचार, व्यभिचार , और फिर आदत हो जाती है. कुछ इसे तरक्की का रास्ता बनाते हैं, कुछ पिस जाते है, टूट जाते हैं, कुछ भाग लेते हैं, दूर-बहुत दूर. कुछ बिखर जाते हैं,
कुछ बस रोज़ शिकार करते हैं/होते हैं. शायद यह भी आदत हो जाती है. भयावह है यह सब. अकल्पनीय पर सच से दूर भी नहीं.
फिल्म हंटर का यह विडियो देख लीजिये. पूरी फिल्म youtube अवेयरनेस के लिए ही देख लीजिये. एक छोटा अंश यहाँ.


वर्कप्लेस एब्यूज, हरासमेंट की सारी स्टोरीज आने लगती है, womaniser मेनेजर, बॉस, colleague . 

अपने आप को बचाइए ! 

अब तो कई जगह, हायरिंग भी बंद कम्ररों में, होती है, हर चीज़ की कीमत चुकानी पड़ती है. जिस तरह के लोग बहाल होते हैं, देख कर लगता है, इंच-टेप से टैलेंट मापी गयी है. 

आपकी एक गलती आपको अंधी गली में धकेल सकती है, और बिखरे समाज में आपको डिप्रेशन से बचाने वाला भी कोई नहीं मिलेगा. 

किसी भी प्रकार के अनवांटेड एप्रोच , एट्टीट्यूड और हिडन मैसेज को NO कहें, सख्ती से, बड़ी सख्ती से. शिकायत करें और नहीं सुने जाने पर ब्लॉग लिखें और शेयर करें ऑनलाइन मीडिया प्लेटफार्म पर. आप चाहें तो अपनी पहचान गुप्त रख सकती हैं. 

कुछ हाल में चल रहे ख़बरूं पर नज़र रखे. नीचे की लिंक देखें. 

https://medium.com/@Indian.fowler/the-indian-uber-that-is-tvf-37f9cb73df31#.hus2574lp

https://factordaily.com/tvf-arunabh-kumar-sexual-harassment/


टेक केयर! 


Friday, January 27, 2017

गजोधर भैया ठीक ही कहते हैं, नौकरी जुगाड़ से मिलती है


गजोधर भाई कह रहे थे  ,नौकरी ढूंढने से नहीं, जुगाड़ से मिलती है. मेरे कुछ दोस्त काफी समय से नौकरी ढूढ़ रहे हैं, हर तरह की कसरत-आजमाईश, दुआ-दरगाह, किसी ने कोई कमी नहीं छोड़ रखी है. सीईओ से ले कर सीबीआई तक की पैरवी लगा रखी है, पर किश्मत है की अंगद की तरह  पैर जमा कर हिलने का नाम नहीं लेती. तंत्र, मंत्र, माला, रुद्राक्ष, ताबीज़ , यन्त्र , रत्न, धातु, बाबाजी की बूटी, सब आजमा लिया पर नौकरी नहीं मिल रही. 
जैसे बैटरी की लाइफ होती है, किस्मत की भी लाइफ होती है. आपकी बैटरी Image result for duracellduracell है तो फिर लंबी चलेगी.

गजोधर भैया ठीक ही कहते हैं, नौकरी जुगाड़ से  मिलती है. सेटिंग करने से मिलती है. साली यह तो डॉन  हो गई जिसको ११ मुल्कों की पुलिस ढूंढ रही है...  
२००० का डॉट कॉम बस्ट, २००८ का ग्रेट डिप्रेशन कुछ लैंडमार्क हैं, जिस पर जॉब मार्किट की तश्वीर को बदलने का बड़ा कलंक लगा है. २००० का डॉट कॉम बस्ट डिजिटल के लिए एक समय से पहले आने का झटका था.  अच्छी  सोच पर शायद दुनिया इसके लिए अभी तैयार नहीं थी.
२००८ ने अमेरिका के सब प्राइम क्राइसिस को सामने ला खड़ा किया, इनफ्लैटेड रियल एस्टेट, unsecured लोन्स, करप्शन की पराकाष्ठा. जितने बड़े इन्वेस्टमेंट बैंकिंग के नाम, उतने शर्मनाक हरकत. २००० का डॉट कॉम बस्ट टेक्नोलॉजी की एक फेलियर थी, २००८ करैक्टर की जबरदस्त पतन. २००८ ने हवाई किले की सच्चाई उजागर कर दी. लोग डर गए, नौकरी गयी तो ज़िन्दगी गई, इसे बचा लो, चाहे किसी कीमत पर, फिर शुरू हुआ सेटिंग का धंधा, coterie , cartel , जुगाड़, भाई-  भतीजा वाद, जात वाद, प्रान्त वाद. दौर शुरू हुआ  अदृश्य बिज़नस प्रैक्टिसेज का, अंडरवर्ल्ड की तरह, सब कुछ अंदर ही अंदर. कम्पनियाँ, जात -प्रान्त के छावनियों  तब्दील होने लगीं. जिसे जहां मौका मिला अपना तबेला बना लिया।  मुन्नियां बदनाम होती गयी, शीलाएं अपनी जवानियाँ भुनाने लगीं. ठेकेदार, दुकानदार कंपनियों में घुस आये, सब एक षड़यंत्र सा पर camouflaged !
ऊपर-ऊपर सब कुछ सामान्य सा दीख रहा था, पर अंदर ही अंदर एथिक्स और वैल्यूज समाप्त होते गए. जहां वैल्यूज नहीं हैं, वहां सिर्फ करप्शन और डिक्लाइन ही बचता है.
डिसइंटेग्रेटेड बिज़नस फूंक्शन्स, साइलोड फूंक्शन्स और उन प्राइवेट fiefdom  में 'छत्रप' की अपनी सरकार, अपना हरम , हरम की हिफाज़त के लिए हिजड़े बहाल होते गए. 
अब भाई , नौकरी पानी है, या बदलनी है तो हिजड़ों से संपर्क करें, हरम की मल्लिका से संपर्क करें, काम हो जायेगा.
२००८ के बाद , हिजड़ों का, @#डियों का दौर चल पड़ा है, अगर आप दोगली बात कर सकते है, दोगला चरित्र है आपका तो, आपकी तरक्की निश्चित है.
ऐसा नहीं है कि काबिल लोग नहीं रहे या उनकी कुछ चलती नहीं, पर भाई, हनी ट्रैप में अब उनका भी बॉस फंसा है. पेटीकोट गवर्नमेंट है भाई.

कबीर ने कहा है ; "जात -पात पूछे नहीं कोई, हरी को भजे सो हरी का होइ. ". आज हालात उल्टी है, ज्यादातर जगह में जात -पात है. हायरिंग मेनेजर या बॉस की पर्सनल कम्फर्ट है. रंगे सियार बहाल होते गए, फिर कैरेक्टर भी एक ही है, वैल्यूज की कोई क्लेश नहीं है. 

पहले मैं कहता था, नौकरी चाहिए, तो प्रोफेशनल प्रोफाइल बनाइये, LinkedIn पर नेटवरकिंग कीजिये, ऑनलाइन प्रोफेशनल ब्लॉग लिखे, ऑनलाइन कम्युनिटी के मेंबर बने. अपनी इनफ्लएंस बनाये, टैलेंट से, पर अब  ,कहता हूँ, पब और डिस्को जाएँ, सोशल प्रोफाइल बनाएं, socialize करें, और फिर आपका करियर चमकेगा ! जैक डैनिएल्स, हुक्का  पार्टी, और आपकी सेटिंग हो जाएगी, यही एक ग्रुप है, जिसकी कोई जात नहीं है, यहां, सभी की जात दारु, हुक्का, पार्टी और आफ्टर पार्टी है. यह नुश्खा आजमाएं और मन चाही नौकरी पाएं.


Tuesday, January 3, 2017

CHRO सिर्फ बिज़नस से! क्या कहते हैं आप?

हर कोई सच तो बोल नहीं सकता पर मृत्यु सैया पर का इंसान, फांसी के वक़्त का कैदी और कंपनी में अपनी अंतिम साँसें गिनता मानव संसाधन विभाग का पुराना अधिकारी सच बोलते पाए जाते हैं. दर्द जब हद से बढ़ जाए तो अफसाना बन जाता है और फिर राग दरबारी दिल से चीख की तरह निकलते हैं.
वह सच जो पति और पत्नी बुढापे के तलाक के वक़्त बोलते /कबूलते हैं, बच्चे अपनी केयर टेकर से बोलते हैं, दारु पीने वाला अपने दारूबाज दोस्त से पीते वक़्त बोलता है, सब सच हैं जो दिल से निकलते हैं.

LinkedIn पर कुछ लोग ऐसे सच बोलते दिखते हैं. मुझे हाल ही में पता चला कि , Laszlo Bock
(former SVP of People Operations and Senior Advisor at Google; author of "Work Rules!"​) ने गूगल छोड़ दी है. १० साल की लंबी करियर थी गूगल में इनकी. इनके लिंकेडीन पर लिखे सारे पोस्ट कमाल के हैं. आप पढ़ सकते हैं.
गूगल के काफी सारे प्रतिमान खड़े किये हैं, मानव संसाधन के क्षेत्र में भी अनेक नेक काम किये गए. सबसे अच्छी बात जो गूगल के रिक्रूटमेंट की मुझे लगी, वह है , हायरिंग मेनेजर का हायरिंग से बाहर रहना. अब आप पूछेंगे की क्या यह सभी पोसिशन्स के लिए होता है या सिर्फ वहाँ , जहां पर्सनल कम्फर्ट की कोई जगह नहीं है. क्या मानव संसाधन के लोग भी बिना हायरिंग मेनेजर से मिले बगैर बहाल हो जाते हैं? अगर ऐसा है तो फिर ठीक है, वरना गवर्नेंस की अगर सबसे ज्यादा क्षति कहीं होती दिखती है तो वह है, मानव संसाधन विभाग. मैं समझता हूँ Laszlo Bock ने हायरिंग को पर्सनल कम्फर्ट से बाहर रखने में अहम् भूमिका निभायी है. मुश्किल यह है कि Laszlo Bock को लिंकेडीन पर इंफ्लूऐंसर बैज मिला हुआ है, तक़रीबन ५.६ लाख लोग इन्हें फॉलो करते हैं, पर कोई अन्य मानव संसाधन का लीडर इनकी तरह का कड़ा कदम नहीं उठा पाता. दोष किसका है?

क्या भारत में कोई Laszlo Bock है? क्यों भारत में कोई HR वाला लिंकेडीन इंफ्लुएंसर नहीं है? जरा सोचिये!
बिज़नस की डायरेक्ट रिस्पांसिबिलिटी किसी भी HR वाले के पास नहीं है! HR कंसल्टिंग को छोड़ दें तो. कंपनी के बोर्ड में शायद किसी HR वाले के पास सीट है. सभी CEO की छत्रछाया में , ट्विटर पर , लिंकेडीन ,  कंपनी के मीडिया अपडेट सिर्फ शेयर करते देखे जी सकते है, या फिर १४० वर्ड्स में कुछ हैशटैग के साथ बस्सी , उबासी लेती , उलटी करती सी प्रवचनात्मक मुद्रा में शब्द-जाल . कोई भीं CHRO कम्पनी का स्पोक्स-पर्सन नहीं है. मीडिया में किसी की कोई डायरेक्ट भूमिका नहीं है. सभी अमर सिंह और जया प्रदा भर हैं. CHRO कंपनी की करियर एंड सक्सेशन प्लानिंग के लिए जिम्मेवार होते हैं, पर उन्हें यह पता ही नहीं होता उसकी जगह कौन , कब ले रहा है! एक CHRO यह पब्लिकली नहीं बता सकता इसका जवाब! मुझे लगता हैं, Laszlo Bock नें अपने एग्जिट के बाद कोई सक्सेसन  प्लानिंग के तहत अपना पोजीशन किसी को दिया. Eileen Naughton को Laszlo की जगह  Vice President People Operations at Google बना दिया गया है. एलीन Managing Director and VP, UK-Ireland Sales & Operations थीं , सेल्स और ऑपरेशन्स , मीडिया का अनुभव उन्हें है, अब HR . इसको कहते हैं प्लानिंग या नो प्लानिंग पर राईट डिसिशन. इंडिया में न तो कोई HR वाला बिज़नस रोले में जाता है या लिए जाता है ,  न ही कोई बिज़नस वाला HR का टॉप बॉस बनता है. कुछ अपवाद है, इनफ़ोसिस के  मोहनदास पाई और KPMG की शालिनी पिल्लई।  दोनों ही चार्टर्ड एकाउंटेंट्स और बिज़नस के लोग रहे हैं. HR को अपनी औकात नापनी हो तो उन्हें बिज़नस रोल के लिए इंटरनल जॉब्स के लिए इंटरव्यू के लिए बुलाना चाहिए. HR अपने लिए HR बिज़नस पार्टनर जैसा टाइटल रख लेता है! अगर सही में वह बुसिनेस का पार्टनर है तो उसे बिज़नस रोल में अपने आप को साबित करना चाहिए. अन्यथा  उन्हें नया आंदोलन चलना चाहिए, 'प्रोटेक्शनिज़्म! प्रोटेक्ट HR ! डाइवर्सिटी और इंक्लयूसिवनेस का छद्म अभिनय पुराना हो चला! प्रोटेक्शन मांगने का अभी फैशन स्टार्ट अप से चल पड़ा है. गूगल ट्रेंड सेट करता है, और एलिन ने सन्देश दे दिया है. CHRO सिर्फ बिज़नस से! क्या कहते हैं आप?

फ्लिपकार्ट में ही देख लीजिये, नितिन सेठ  , HR बॉस भी हैं और अब COO भी. सिर्फ HR करने वाले की जगह अब ऊपर के पोसिशन्स पर नहीं होगी! HR लीडर्स के लिए साइड डिश है, मैं डिश बिज़नस है. 
अब तो flipkart का कल्याण , कल्याण ही करेंगे. बंसल्स अब MBA में दाखिला ले लें, IIT उन्हें यहीं तक ला सकता था, इसमें अब तक math था, अब बिज़नस है, फाइनांस है. ऑपरेशन्स भी अब आईआईएम वाले नितिन सेठ को दे दिया गया है. कल्याण तो MBA हैं ही. आज मुझे MBA की सही वैल्यू पता लग रही है. 

Sunday, October 23, 2016

कहते हैं आईटी में सारे पाप धुल जाते हैं.

सन २००९, स्थान बंगलुरु , मैं, SIBM बंगलुरु में MBA के एडमिशन की GD&PI conduct कर रहा था.  मैंने पाया  के लिए लोग मुख्यतः TCS , Infosys जैसे  आईटी सर्विसेज कंपनी के Engineers, टीम-लीडर्स थे. सब ने MBA करने के पीछे एक सी ही बात कही; करियर ग्रो नहीं कर रहा, सैलरी नहीं बढ़ रही, टीम लीडर/manager बायस्ड हैं, आन -साइट, opportunity काफी कम हैं, और अगर है तो फिर,  suckers इस जात वाले के लिए रिजर्व्ड हैं. , . ...... तो साहब, MBA  एक "संकट मोचक" है जो सांसारिक दुष्चक्रों से छुटकारा दिलाने वाला राम बाण है, ऐसा समझ लीजिये. . आईटी वाले किसी ने भी कोई दिलचस्प बात नहीं की.  ,प्रोजेक्ट मेनेजर, onsite ट्रेवल, per diem, late night, की बात की, Business किसी ने नहीं. 

(कहते हैं आईटी में सारे पाप धुल जाते हैं. आईटी में कोई भी गधा पहलवान हो सकता है. अंधे, लंगड़े, हकले, सब चलेंगे, J node, JavaScript, AngularJS, jQuery, Node.js या  Ruby on Rails आता हैं,  बन गए साहब UI /UX स्पेशलिस्ट! एप्लीकेशन ससोफ्ट्वरे कोई भी सीख लेता है, फिर कोई 'लाला' कंपनी में गधा-खच्चर मजूरी के कुछ साल और फिर डेस्पेरेट MNC में सस्ते में बहाली, अब तो जी आपको वीज़ा मिल गया, अब सारे MNC , स्टार्ट -अप  आपकी आरती उतारने को तैयार हैं.  तभी तो कहते हैं, आईटी में सारे पाप धुल जाते हैं)

आगे  ,बढ़ते हैं,
अगला कैंडिडेट ,एक इंजीनियर आया, संकुचित सा , मैंने पूछा , क्या आप भी IT इंजीनियर हैं? बोला, सर, मैं IT में नहीं हूँ. पुणे में, ट्रेक्टर/एग्रीकल्चर/फार्म इक्विपमेंट कंपनी  में काम करता हूँ, सेल्स सपोर्ट देखता हूँ, अफ़्रीकी देशों के लिए.
मैंने अफ्रीका में बिज़नेस करने के कुछ challenges के बारे में पूछा  और जवाब ऐसे की मैं दंग रह गया. जैसे कोई सीनियर बिज़नेस VP बोल  हो. चीनी कंपनियों से pricing मुकाबला,  सर्विस network की समस्या, लोकल qualified engineers की कमी और bank और लोकल गवर्नमेंट बॉडीज की सुस्ती. न सिर्फ समस्या, बल्कि उसने बड़े तार्किक सन्दर्भ देते हुए बताया कि कंपनी की अब क्या नीति है अफ़्रीकी मार्किट के लिए और उसके हिसाब से  कितना वक़्त लग सकता है, इस चीनी ताक़त को रोकने में या फिर खेल बदलने या पलटने में, अन्य समस्याओं को हल करने में, इत्यादि।     मैंने  इस लड़के को सेलेक्ट कर लिया.

मैं इस कहानी के ज़रिये आपके यह बतलाना चाहता हूँ कि IT सर्विसेज में काम किये /करते हुए ज्यादातर engineers कूप-मंडुक होते हैं. फिर XAT ,CAT , GMAT और पहुँच गए ISB और IIM या XLRI . संस्थान में, १ या २ साल का किताबी ज्ञान, ज्यादातर टाइम असाइनमेंट्स और प्रोजेक्ट्स की कॉपी&पेस्ट में व्यतीत. बचे कुछ टाइम, प्लेसमेंट्स की सर्कस, ...बन गए जनाब सुपरमैन! 










चर्चा में है कि  ६६ साल पुराना संस्थान XLRI एक अभिजात्य वर्ग बन सा गया है. असलियत में काफी gaps हैं, जो alarming हैं. रैंकिंग में नंबर १ इन ह्यूमन रिसोर्सेज self -proclaimed title सा जान पड़ता है. मेरा XLRI के काफी सीनियर और जूनियर कैंडिडेट्स के इंटरव्यू का अनुभव भी यही स्थापित करता है की, यह रंगा सियार ही है. काफी कम ही लोग हैं जो  प्रतिभावान हैं. ६६ साल की विरासत कब तक चल पाती है, देखना होगा.

 कहावत है; 'नामी बनिया का झांट भी बिकता है.'


XAT एंट्रेंस टेस्ट की फॉर्म भरने ही तारीख extend हुई २०१६ के लिए. यह भी एक सन्देश है की काफी काम लोग अप्लाई कर रहे है अब XLRI  के लिए.

मैंने सोचा था, सरकारी अफसर बेईमान, घूसखोर होता है, फिर प्राइवेट कंपनी में काम किया तो मालूम पड़ा यहां तो सबसे बड़े चोर और चरित्रहीन लोग भरे पड़े हैं. यहां तो न विजिलेंस का, नहीं CBI का, नहीं, पॉलिटिशियन का या मीडिया का डर , लूट मचाओ, गिरे हरकत करते रहो. राज्य सरकार के नौकरी में जात-पात था, भाई -भतीजावाद था, प्राइवेट में बंगाली वाद है, मलयाली वाद है, तमिलवाद है , इत्यादि. फिर MBA कॉलेज में देखा, वहाँ भी बंगाली वाद है, मलयाली वाद है, इत्यादि . XLRI जमशेदपुर की वेबसाइट पर आप वाद की कुछ झलक पा सकते हैं. मल्लू चेयरपर्सन है, मल्लू प्रोफेसर हो जाता है, Alumni affairs का हेड हो जाता है. इंस्टीटूशन का चेयरपर्सन भी मल्लू है, क्रिस्चियन है , वैसे तो इंस्टीटूशन ही Jesuit है. Alumni affairs का हेड का प्रोफाइल लिंकेडीन पर और XLRI के वेबसाइट पर देख लीजिये, आप समझ जाएंगे.
youtube पर XLRI के ऑफिसियल videos हैं, पर कमेंट्स डिसेबल्ड हैं. किस बात का fear  है? क्यों इतना intolerance ?
आप ऐसी हरकत तभी करते हैं जब आप को एक्सपोसे होने का fear होता है या आप truth से डरते हैं..
आप तय कर लीजिये.
दोनों वीडियोस देख कर मुझे एक बेहद average Institute की छवि सामने आई. Alumni meet  का video किसी शादी का वीडियो बनाने वाले नें बना दिया है. म्यूजिक वैसा ही है, लग रहा है, शादी का भोज है..
दुसरे वीडियो में, प्रोफेसर सभी झारखण्ड मेड लग रहे हैं. नॉन-इन्स्पिरिंग. सामने लिखे स्क्रिप्ट देख कर पढ़ रहे हैं. Unhygienic कैंटीन, poorly scripted स्टूडेंट टॉक्स,

बस प्लेसमेंट ही बचा रहा है इनको पर ज्यादा दिन चलने वाला नहीं लगता है सब-कुछ तभी तो मूंगफली की तरह XLRI अब certificate course बेच रहा है.

Sunday, October 2, 2016

राम की शक्ति पूजा!-LEADERSHIP LESSONS


सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ आधुनिक हिन्दी काव्य के प्रमुख स्तम्भ हैं। राम की शक्ति पूजा उनकी प्रमुख काव्य कृति है। निराला ने राम की शक्ति पूजा में पौराणिक कथानक लिखा है, परन्तु उसके माध्यम से अपने समकालीन समाज की संघर्ष की कहानी कही है। राम की शक्ति पूजा में एक ऐसे प्रसंग को अंकित किया गया है, जिसमें राम को अवतार न मानकर एक वीर पुरुष के रूप में देखा गया है,

राम  विजय पाने में तब तक समर्थ नहीं होते जब तक वे शक्ति की आराधना नहीं करते हैं।
"धिक् जीवन को जो पाता ही आया है विरोध,
धिक् साधन जिसके लिए सदा ही किया शोध!"
तप के अंतिम चरण में विघ्न, असमर्थ कर देने वाले विघ्न. मन को उद्विग्न कर देने वाले विघ्न. षड़यंत्र , महा षड़यंत्र. परंतु राम को इसकी आदत थी, विरोध पाने की और उसके परे जाने की. शायद इसी कारण उन्हें "अवतार " कहते हैं. अवतार, अर्थात, वह, जिसने मानव जीवन के स्तर को cross कर लिया है. राम सोल्यूसन आर्किटेक्ट थे. पर सिर्फ सोल्यूसन आर्किटेक्ट साधन के बगैर कुछ भी नहीं कर सकता. साधन शक्ति के पास है. विजय उसकी है जिसके साथ शक्ति है. 


जानकी! हाय उद्धार प्रिया का हो न सका,
वह एक और मन रहा राम का जो न थका।
जो नहीं जानता दैन्य, नहीं जानता विनय,


राम एक कमिटेड लीडर भी थे, जो नहीं जानता दैन्य, नहीं जानता विनय! वह अपने सामर्थ्य से विजय पाना चाहता है. विजय उसका कर्मा है. वही नियति है, वही उद्देश्य है, ऐस अ लीडर. लीडर विथ अ पर्पस! 


कर गया भेद वह मायावरण प्राप्त कर जय।

राम समर्थ थे, दृढ प्रतिज्ञ थे, युक्तिपरक थे परंतु, युद्ध सिर्फ सामर्थ्य से नहीं विजय हो सकती. विजय के लिए चाहिए भेद , भेद को भेदने की युक्ति. काया वह तंत्र है? शिव की साधना तंत्र है. तंत्र अदृश्य, अकल्पित शक्तियों को भेदती है. उन्हें नत मस्तक कराती है. उनपर विजय पाती है. 

बुद्धि के दुर्ग पहुँचा विद्युतगति हतचेतन
राम में जगी स्मृति हुए सजग पा भाव प्रमन।
"यह है उपाय", 

उपाय , सबसे बड़ा यन्त्र, सबसे बड़ा तंत्र. द हाइएस्ट स्टेक ! यह वही बलि है, जिसकी वेदी वैदिक काल से निर्मित है. हर स्तिथि का उपाय है. देवी की शक्ति तंत्र है. 

"साधु, साधु, साधक धीर, धर्म-धन धन्य राम!"
कह, लिया भगवती ने राघव का हस्त थाम।
देखा राम ने, सामने श्री दुर्गा, भास्वर
वामपद असुर स्कन्ध पर, रहा दक्षिण हरि पर।
ज्योतिर्मय रूप, हस्त दश विविध अस्त्र सज्जित,
मन्द स्मित मुख, लख हुई विश्व की श्री लज्जित।
हैं दक्षिण में लक्ष्मी, सरस्वती वाम भाग,
दक्षिण गणेश, कार्तिक बायें रणरंग राग,
मस्तक पर शंकर! पदपद्मों पर श्रद्धाभर
श्री राघव हुए प्रणत मन्द स्वरवन्दन कर।

शक्ति का हस्तान्तरण! डी डिवाइन इंटरवेंशन! 

"होगी जय, होगी जय, हे पुरूषोत्तम नवीन।"
कह महाशक्ति राम के वदन में हुई लीन।

शक्ति अंदर स्थापित होती है, विजय सुनिश्चित है. 

- सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
की  कृति!

Saturday, September 17, 2016

क्या कॉर्पोरेट हायरिंग में भी कास्टिंग काउच है? (Is there a Casting Couch in corporate hiring too?)

आप इसे पहचानते हैं, सही कहा आपने,  हार्वे विंस्टिन, मशहूर हॉलीवुड फ़िल्म निर्माता...कास्टिंग काउच से विख्यात हुए.. किस्से हज़ारों.. कारनामें बड़े बड़े.. 
इस विषय पर कोई नहीं बोलता....गन्दा है पर धंधा... 
 मेरा ह्यूमन रिसोर्सेज (एच आर) फंक्शन में काम करने का अनुभव है, जब मैं मैनेजमेंट की पढ़ाई सिम्बी में कर रहा था, मेरी क्लास में कुछ ६० लोग थे. दो-चार विदेशी (थर्ड वर्ल्ड कंट्री के लोग, जिनके लिए इंडिया का सिम्बी जैसा एवरेज मैनेजमेंट का शॉप भी कैंब्रिज है). लगभग ४० लड़कियां, बाकी लड़के. कुछ ५ या ६ बैक डोर एंट्री वाले भी थे. एक पटना से भी था, जो बाद में जूनियर बैच में भेज दिया गया, क्योंकि पुणे यूनिवर्सिटी ने मैनेजमेंट कोटा में उसे जगह नहीं दिया. आज साहब KPMG में ह्यूमन रिसोर्सेज के डायरेक्टर हैं. बैक डोर एंट्री वाले, TCS America में रिसोर्स मैनेजमेंट यानि पोल्ट्री फार्मिंग कर रहे हैं. एक बैक डोर वाला, कई देश में चेंज मैनेजमेंट कर आया. कॉर्पोरेट वर्ल्ड का नंगा सच आपको मैनेजमेंट संस्थानों में ही दिख जाएगा। मतलबी, षड्यंत्रकारी , चौकड़ी बाज़. वहाँ  मिलेंगे. गंदे-घिनौने चेहरे, प्लेसमेंट का जुगाड़. पढ़ाई कौन करता है. सबसे बड़ा करप्शन का अड्डा है स्टूडेंट रन प्लेसमेंट ऑफिस. बंगाली वाद , मल्लू वाद, जहाँपनाह वाद , सब चलता है. इंतज़ाम हो जाएगा. दारु, $डीबाज़ी, ड्रग्स , सब मिलता है, स्पॉन्सर्ड हनीमून होती है गोवा में. पता नहीं और क्या-क्या.


अब आते हैं काम की दुनिया में. पहली HR रोल वाली कंपनी. एक आईटी सर्विसेज एंड हार्डवेयर और एंटरप्राइज सोल्यूसन कंपनी. स्थान बैंगलोर, इंडिया का सिलिकॉन वैली. कैंडिडेट इंटरव्यू के लिए आता है; बायोडाटा पर कंसलटेंट कंपनी का लोगो...कुछ लोबो कंसल्टिंग लिखा है. दूसरा कैंडिडेट, फिर लोबो, तीसरा भी लोबो. लोबो का कैंडिडेट सेलेक्ट होता है. कुछ दिनों बाद, एक हॉट सी मिडिल एज्ड महिला कंसलटेंट GM को मिलने आती है. काना-फूसि हो रही है स्टाफ में, कुटिल मुस्कान...
पता चलता है, यह मैडम GM साहब की प्राइवेट माल हैं. लोबो इनकी कंसल्टिंग का नाम है. GM साहब इनका इनवॉइस  फ़टाफ़ट क्लियर करा देते हैं....

कुछ-कुछ समझ में आ रहा है. कुछ दिनों बाद एकाउंट्स मेनेजर से बनायी दोस्ती से और भी सच सामने आता है.
इस बार मालूम पड़ता है, कि लोबो की हॉट आंटी GM साहब के साथ, ऑफिस के बुकिंग पर कोचीन ऑफिसियल टूर पर जाती हैं. दर असल यह एक हनीमून ट्रिप है.

फिर मैं एक अमेरिकन MNC कंपनी ज्वाइन करता हूँ. कंपनी का HR हेड ज्वाइन करता है. साथ में उसकी पिछली कंपनी की HR बिज़नस पार्टनर ज्वाइन करती है. लड़की चेन्नई से बैंगलोर रिलोकेट हो कर आती है. बॉस उसे फ्लैट दिलाता है. ऑफिस की कैब में उसे पिक उप और ड्राप देता है. ड्राइवर्स बताते हैं , HR हेड कैब में भी रोमांस करते हैं, फ्लैट पर भी देर तक मैडम के साथ रुकते हैं. सारी कंपनी इन  रंरेलियों का मजा लेती है. छम्मक छल्लो बदनामी कराते-कराते एक साल में वापस चेन्नई भाग लेती हैं. HR हेड अपनी गोपी गाथा चालू रखता है. अब वह HR की इंटरव्यू अपने सीक्रेट फ्लैट पर करता है. कौन कहता है HR में कास्टिंग काउच नहीं है. अब तो वह शादी-शुदा औरतों को भी नहीं छोड़ता . १० साल रंगरेलिया मना लेने के बाद यह एवरेज एडुकेटेड HR हेड फाइनली कंपनी से निकाला जाता है. जय हो MNC , जय हो लिस्टेड कंपनी. जब कुँए में ही भांग पड़ी हो तो रंगरेलियां हर तरफ चालू रहती हैं. ट्रेनिंग के नाम पर होटल वेन्यू बुक होता है, साथ में एक रूम भी बुक होता है कॉम्प्लिमेंटरी. रंगरेलियां चालू हैं.

कहानी चालू रहेगी..बाकी अगले अंक में... 

🐐 “बकरे की अम्मा कब तक ख़ैर मनाएगी?”

कॉर्पोरेट जंगल की एक लघु कथा, जिसमें किस्मत करवट लेती है और रिक्रूटर नटराज बन जाते हैं कॉर्पोरेट दुनिया में हर किसी की एक एक्सपायरी डेट हो...