कितनी पोस्टमार्टम की जाए अपनी कुंडली और किस्मत की. साली घूम घूम कर अपनी काली शक्ल दिखाने आ जाती है. कभी भी हो, जवानी से अब बुढ़ापे तक इसकी यही कहानी रही है, ज़िन्दगी हराम करते रहो। हर बार इसी बात का अहसास करने की कोशिश की है इसने कि मेरा वक़्त ख़त्म हो गया है. अब बेकार की कोशिश कर रहा हूँ मैं, मेरे लिए कोई काम किसी जगह नहीं बचा है. डटे रहे तो फिर कुछ मिला पर अब बस झूठ की आस बची है. पढ़ते रहो, फौजियों की तरह तैयारी करते रहो पर बात नहीं बनती. हज़ारों जगह अप्लाई कर करते रहो , ऐसे कितने ही ब्लॉग पिछले ५ सालों में लिख चुका , साली किस्मत है कि समझती ही नहीं. कब ख़त्म होगी इसकी शरारतें। . कितना कर्मा बचा है अब तक तो ख़त्म हो जाना चाहिए था। एक ही शब्द है जो बार बार लौटता है, फ़्रस्ट्रेशन, निराशा , इंतज़ार, बेचैनियां जो कब ख़त्म होंगी कह नहीं सकता. समय ठीक तो लग रहा है पर मौका नहीं मिल रहा. हाथ में आकर मौका निकल गया, डेट आ गया जोइनिंग नहीं हुई, बार बार यही कहानी। चलो ऐसा होता रहता है, कोई नयी बात नहीं है. जेल जमानत बेल परोल ...
लश्कर भी तुम्हारा है सरदार तुम्हारा है;तुम झूठ को सच लिख दो अखबार तुम्हारा है!-शायर विजय सोलंकी