आपने आज का टाइम्स ऑफ़ इंडिया अखबार पढ़ा होगा. जी मैं २८ नवम्बर २०१५ की बात कर रहा हूँ. एक माँ, अपने नवजात को ले कर ईट भट्ठे से भागती है, अपने पति के साथ, दशकों की गुलामी से मुक्त होने के लिए. पकड़ी जाती है , ईट भट्ठे के मालिक के गुंडे उसे पकड़ लेते हैं और वह फिर झौंक दी जाती है २१ रुपये दिहाड़ी पर. पर उसके दृढ़ निश्चय उसे आशा की किरण देते हैं. CID का मानव तश्करी दस्ता और अंतर्राष्ट्रीय न्याय मिशन उसे बैंगलोर के पास रामनगर से मुक्त करा लेते हैं. जब मानवता शर्मसार हो जाती है, जब खून खौल जाता है.. देश में हमारे आईएएस, आईपीएस ऑफिसर्स सारे डिस्ट्रिक्ट और ताल्लुके में तैनात हैं. उनकी नाक के नीचे स्वतंत्र भारत में, आईटी सिटी बैंगलोर के समीप मानव तश्करी होती है. इसे नपुंशकता कहेंगे या नौकरी बचाने के लिए अपनी आँखें बंद कर लेना या फिर भ्रस्ट तंत्र में शोषक के साथ हो लेना? इन विषयों पर पार्लियामेंट में चर्चा क्यों नहीं होती? जीएसटी बिल अगर आवश्यक है तो यह उससे भी ज्यादा आवश्यक है कि स्वतंत्र भारत का पार्लियामेंट, सुप्रीम कोर्ट और सरकार में बैठे लोग य...
लश्कर भी तुम्हारा है सरदार तुम्हारा है;तुम झूठ को सच लिख दो अखबार तुम्हारा है!-शायर विजय सोलंकी