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Showing posts from 2019

किताब का नाम है; "ट्रेडिंग आर्मर विथ अ फ्लावर-राइज ऑफ़ न्यू मैस्कुलिन"

मनीष भाई ने एक जबरदस्त किताब लिखी है. किताब का नाम है; "ट्रेडिंग आर्मर विथ अ फ्लावर-राइज ऑफ़ न्यू मैस्कुलिन" . जाहिर है किताब का नाम अंग्रेजी में है तो किताब भी अंग्रेजी में ही है. और हम हैं कि इसकी 'समालोचना' लिख रहे हैं रिव्यु नहीं. हमने मास्टर्स की पढ़ाई साथ-साथ की थी सो थोड़ा सानिध्य प्राप्त हुआ इनका. इस व्यक्ति में जादू है. रितिक रोशन वाला नहीं। वह एलियन है भाई, यह इंसान अपने आप में एक पूरा रंगमंच हैं. दरअसल मनीष ने लिखी तो अपनी दीवानगी की कथा और व्यथा है जो मुकम्मल हुई है इस किताब में, परन्तु, अब यह पाठक पर है की वह इसे फिक्शन समझे या नॉन-फिक्शन. लेखक (या कवि ?) इस किस्म का कोई क्लेम नहीं करता. 
आगे बढ़ते हैं. राहत फतह अली साहब का एक गाना है, "ज़रूरी था". और ग़ज़ल की कुछ पक्तियां यूँ हैं. :  "मिली हैं मंज़िलें फिर भी  मुसाफिर थे मुसाफिर हैं  तेरे दिल के निकाले हम  कहाँ भटके कहाँ पहुंचे  मगर भटके तो याद आया  भटकना भी ज़रूरी था".  कम शब्दों में अगर कहें तो इस किताब का मज़मून यह कुछ ग़ज़ल की पंक्तियाँ हैं जो ऊपर लिखी हैं.  यह किताब एक सनातन दास्ताँ सी…

मुर्गा फँसाओ कार्यक्रम: रिक्रूटमेंट वाला मुर्गा.

पिछले हफ्ते ही मैं एक रिक्रूटमेंट मैनेजर से बात कर रहा था. साहब अच्छे इंसान हैं. पुणे में रहते हैं. अरिन्दम चौधरी की संस्थान से पढ़ाई की है. उन्होंने बताया कि हाल ही में, उनकी सैलरी ९५ (पचानवे) लाख थी. १६ साल की अच्छी रिक्रूटिंग की नौकरी, कुछ अच्छे आईटी सर्विसेज कंपनी में अनुभव. सबसे बड़ी उपलब्धि १७०० ईआरपी वालों की बहाली।  बड़ी प्रशन्नता होती है जब कोई लगभग १ करोड़ की सैलरी बहाली टीम की चरवाही कर के कमा लेता है. सबसे ज्यादा गर्व अरिंदम जी को होना चाहिए जिन्होंने कहा था; लुक बियॉन्ड आईआईएम। बच्चे नाम रौशन कर गए. 

क्या संतों, सन्यासियों पर प्रारब्ध लागू नहीं होता?

क्या संतों, सन्यासियों पर प्रारब्ध लागू नहीं होता? जब आपकी कुंडली में "डबल" दरिद्र योग हो, "भाग्यहीन योग" भी हो . ज्योतिषी भी जिन दुर्योगों से डरते हैं, हम उन्हें अपनी आस्तीन और गले में लिए फिरते हैं. पर जीवन रोज़ अभिशप्त लगता है. लगता है, जीवन का सूत्र यही है: जेल, ज़मानत, बेल, परोल. पंक्चर बनाते ही ज़िन्दगी निकल जायेगी लगता है. कर्म और प्रारभ्द की सीमाएं हैं, पर जीवन का एक रहश्य है, जिसे कहते हैं, चमत्कार. अगर यह न हो तो फिर एडवेंचर नहीं हो.
मुझे ईश्वर का मतलब समझ में यूँ आता है; जो है, और जिसने आपका प्रारब्ध लिख दिया एक उद्देश्य के लिए. सुख और दुःख उस रास्ते के पड़ाव हैं, कुछ सुहाने तो कुछ भयानक. कई रास्ते भयानक पड़ावों की श्रृंखला लगती है, जहां अनगिनत अवरोध हैं, तो कुछ रास्ते कोमल और लुभावने. भाई, ज़िन्दगी एक काम है, जिसे करना है, कोई विकल्प नहीं है. ईश्वर की आपसे कोई दुश्मनी नहीं है, बस आप चुन लिए गए कुछ करने के लिए, आप कर लें तो ठीक है, वर्ण, इस्तेमाल तो हो ही जाएंगे. काम पूरा होगा और तभी आपकी छुट्टी भी.
धर्मों में गुरु की अवधारणा सिर्फ इस लिए है, की रास्ते में कोई…

बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधेगा ?

कॉर्पोरेट के ल्युटियन्स लीब्रण्डू आपको बहुराष्ट्रीय कंपनियों में काफी मिलेंगे. यहां दो तरह के लोग हैं! एक तो वे जो कबीले के वासी हैं. मंगलौर ग्रुप, मलयाली ग्रुप, बंगाली ग्रुप, इत्यादि. ये काफी संगठित तरीके से काम करते हैं. इनके अपने कायदे हैं और टेरीटोरियल भी हैं ये. दुसरे को अपने ग्रुप में शामिल नहीं करते. बंगाली और मलयाली मैनेजमेंट कॉलेजेस के प्लेसमेंट टीम में भी खूब मिलेंगे. इनके शौक और आदर्श भी काफी सामान हैं. दुसरे वे जो प्रीमियर एजुकेशन ले कर आते हैं. यह कोई हेट स्पीच नहीं है, ये आइना दिखने की कोशिश है वहाँ जहां हम ऑस्ट्रिच की तरह सैंड में सर -गर्दन घुसेड़ चुके हैं. जब तक अपना काम बनता, भाड़ में जाए जनता. सभी लोग एक जैसे नहीं होते. सच बोलने की ज़रुरत है. यह रिस्क कौन लेगा? बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधेगा ? एचआर में बैंगलोर में आपको ये काफी मिलेंगे. ओवर कॉन्फिडेंस, अंग्रेजी और लिबरल, साथ साथ गज़ब के फट्टू , बेहद स्वर्थी।  बंगालियों की सारी  हेकड़ी बंगाल तक ही सीमित है, और फिर जेएनयू में. अन्य जगहों में ये अपनी औकात जानते हैं....चिक-चिक नहीं करते. इन ग्रुप्स जिनकी मैंने चर्चा ऊपर क…

जब कुँए में ही भांग पड़ी हो

हिंदी में  एक कहावत है; जब कुँए में ही भांग पड़ी हो ! भारतेंदु ने कहा था ; आवहु सब मिल रोवहु भाई , हा हा , भारत दुर्दशा देखि नहीं जाई! आज मुझे HR के बारे में यही कहने में कोई संकोच नहीं है.
किसी ने सही कहा है ; ";ज़िन्दगी लम्बी नहीं, बड़ी होनी चाहिए ! ". पद्म श्री चाहे आप चंदा कोच्चर को दें या फिर जे के सिन्हा को, बात तभी बनती है जब आप दूसरों की ज़िन्दगी बदल देते हैं!
आपने यह कहावत सुनी होगी; 'चार आने की मुर्गी, बारह आने का मसाला! ', या फिर यह तो वही हुआ कि ;'खाया पिया कुछ नहीं, गिलास तोड़ा , बारह आना. ' एक्सपायरी डेट पर कर चुकी बुड्ढी HR की महिलायेँ अब Catalyst Inc जैसी संस्थाओं से डाइवर्सिटी और इन्क्लूसन का अवार्ड लेने न्यू यार्क चली जाती हैं. माले मुफ्त दिले बेरहम।
लगभग २० साल पहले डेव उलरिच ने एक क़िताब  लिखी थी;
जब मोदी सरकार तय है तो फिर ७ बिलियन डॉलर का चुनाव कोई मतलब नहीं रखता, पर क्या करें, ४० चोरों को लगता है, अली बाबा से दो दो हाथ कर लें, तो हमने भी कहा, लड़ ले भाई! अगली बार नो चुनाव !
The HR Scorecard: Linking People, Strategy, and Performance! HR वालों …
अमेज़न प्राइम वीडियोस का शुक्रिया अदा करना चाहता हूँ! कल-परसों ही दो फ़िल्में देख ली।  "मित्रों " और "शुद्ध देशी रोमांस ". मिलनिएल्स के लिए और उनके समझ, सोच और ठरक पर बनी हैं ये फ़िल्में ! भाई ठरक दो प्रकार के होते हैं, जैसा कि सद्गुरु ने कहा है; एक जो आपको शरीर के निचले हिस्से की तरफ ले जाएगा और दूसरा ऊपर. बात समझ में आ गयी तो आपका ठरक अभी सही जा रहा है. मित्रों का एक डायलॉग ; "दुनिया में तीन तरह के लोग होते हैं; एक जो नौकरी करते हैं, दूसरे जो बिज़नेस करते हैं और तीसरे, जो कुछ नहीं करते। "
पर किसी शायर ने कहा है; "जो कुछ नहीं करते, वो अक्सर कमाल करते हैं"! अगर आप भी मेरी तरह कुछ नहीं करते तो फिर आप भी कमाल कर रहे हैं. गीता में श्रीकृष्ण ने कहा हैं; "जन्म, जरा, रोग और मृत्यु ये ४ शोक हैं! "
कुछ बच्चों के जन्म लेने से उनके माता पिता दबाव में आ जाते हैं तो कुछ के बड़े होने पर! मित्रों का हीरो एक बड़ा प्यारा सा सच्चा सा बच्चा है. कुछ नहीं करता! ऐसा उसके पिता सोचते हैं. माता और दादी (गुजराती में बा) के मत उनके पिता से बिलकुल भिन्न हैं. लड़का इंज…

अब बस है तो ख़ामोशी , अब दर्द नहीं है सीने में

पल-पल , तिल-तिल मरता मैं. खुद पे रोता , खुद पे हँसता , गिरता और सम्हलता मैं.
सब कुर्बानियाँ व्यर्थ गयीं , सब प्रयास निरर्थक से.
हर साँस थकी है, आँखें भी नम , प्रभु, आपसे भी अब हतप्रभ हम.
गिनती नहीं मेरे साँसों की, रात कटी है, जेलों सी , अब बस है तो ख़ामोशी , अब दर्द नहीं है सीने में.
कटती-कटती रही ज़िन्दगी, घुटे दर्द हर एक क्षण में, कभी तो होगी, इस जीवन में, एक किरण उन सुबहों की. जिनको निहारता रहा गगन में, ज्यों सूखे में , सूने आकाश में, मेघ ढूंढता , कृषक मन-चिंतन में.
मृग मरीचिका ही रही जीवन जब , कुछ अर्थहीन , कुछ कपोल-कल्पना के भीषण रण में.

कहते हैं; कविता घनीभूत संवेदनाओं की उपज होती है. ऊपर की पंक्तियाँ मेरे वर्तमान के मनःस्थिति की एक गहरी उकेर है. ढल गए तो बुत , बह गए तो रेत हैं.

तो यह होता है इंटरव्यू (साक्षात्कार)?

तो यह होता है इंटरव्यू (साक्षात्कार)?

यह बीच का व्यू है! फिल्म की इंटरवल की तरह इंटर-व्यू ! पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त!
कर दिया आपने, प्रस्तावना, प्रतिवेदन और उल्लेख ! समझ गए आप! जी हाँ, मैं आपके रिज्यूमे या बायो डाटा की बात कर रहा हूँ.
व्यक्ति और व्यक्तितव एक ओर और दूसरी ओर उस संभावना जिसे हम जॉब कहते हैं से रु-बरु होने के मध्य का क्रम है इंटरव्यू! यहाँ आपका पहला चैलेंज है, यह "साक्षात्कर्ता "! आप पेश होते हैं, वह प्रकट होता है! प्रगट भयाला , दीन  दयाला! एक ब्लाइंड डेट की तरह , सिलसिला शुरू होता है, एक -दूसरे को इम्प्रेस करने का! सिर्फ अच्छी बातें, सुनहरे ख़याल , लम्बी फेंक , कुछ तुम लपेटो, कुछ हम लपेटें! सच, न तुम सुन सकोगे , न मुझमें इसकी ख़्वाहिश !
रहने दो, आज वक़्त नहीं है, मेरी शायरी का, अज़ीब दोस्तों की दास्तानों का, मेरी बेबसी, मजबूरियों का, उन कड़वे अहसासों का, सीने में दफन कुछ अरमानों का.
यह, इंटरव्यू है ज़नाब , आईये सिर्फ अच्छी बातें करें. क्या कहा, ज़मीर-ईमान ? वह तो दरवाज़े के बाहर छोड़ आया मैं, समेट लूँगा जाते वक़्त! उसे भी अब इस बेवफाई की आदत सी हो गयी है.
काश तुम प…