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Showing posts from 2016

कहते हैं आईटी में सारे पाप धुल जाते हैं.

सन २००९, स्थान बंगलुरु , मैं, SIBM बंगलुरु में MBA के एडमिशन की GD&PI conduct कर रहा था.  मैंने पाया  के लिए लोग मुख्यतः TCS , Infosys जैसे  आईटी सर्विसेज कंपनी के Engineers, टीम-लीडर्स थे. सब ने MBA करने के पीछे एक सी ही बात कही; करियर ग्रो नहीं कर रहा, सैलरी नहीं बढ़ रही, टीम लीडर/manager बायस्ड हैं, आन -साइट, opportunity काफी कम हैं, और अगर है तो फिर,  suckers इस जात वाले के लिए रिजर्व्ड हैं. , . ...... तो साहब, MBA  एक "संकट मोचक" है जो सांसारिक दुष्चक्रों से छुटकारा दिलाने वाला राम बाण है, ऐसा समझ लीजिये. . आईटी वाले किसी ने भी कोई दिलचस्प बात नहीं की.  ,प्रोजेक्ट मेनेजर, onsite ट्रेवल, per diem, late night, की बात की, Business किसी ने नहीं.  (कहते हैं आईटी में सारे पाप धुल जाते हैं. आईटी में कोई भी गधा पहलवान हो सकता है. अंधे, लंगड़े, हकले, सब चलेंगे, J node, JavaScript, AngularJS, jQuery, Node.js या  Ruby on Rails आता हैं,  बन गए साहब UI /UX स्पेशलिस्ट! एप्लीकेशन ससोफ्ट्वरे कोई भी सीख लेता है, फिर कोई 'लाला' कंपनी में गधा-खच्चर मजूरी के कुछ साल और फिर डेस्प…

राम की शक्ति पूजा!-LEADERSHIP LESSONS

सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ आधुनिक हिन्दी काव्य के प्रमुख स्तम्भ हैं। राम की शक्ति पूजा उनकी प्रमुख काव्य कृति है। निराला ने राम की शक्ति पूजा में पौराणिक कथानक लिखा है, परन्तु उसके माध्यम से अपने समकालीन समाज की संघर्ष की कहानी कही है। राम की शक्ति पूजा में एक ऐसे प्रसंग को अंकित किया गया है, जिसमें राम को अवतार न मानकर एक वीर पुरुष के रूप में देखा गया है,

राम  विजय पाने में तब तक समर्थ नहीं होते जब तक वे शक्ति की आराधना नहीं करते हैं।
"धिक् जीवन को जो पाता ही आया है विरोध,धिक् साधन जिसके लिए सदा ही किया शोध!" तप के अंतिम चरण में, विघ्न, असमर्थ कर देने वाले विघ्न. मन को उद्विग्न कर देने वाले विघ्न. षड़यंत्र , महा षड़यंत्र. परंतु राम को इसकी आदत थी, विरोध पाने की और उसके परे जाने की. शायद इसी कारण उन्हें "अवतार " कहते हैं. अवतार, अर्थात, वह, जिसने मानव जीवन के स्तर को cross कर लिया है. राम सोल्यूसन आर्किटेक्ट थे. पर सिर्फ सोल्यूसन आर्किटेक्ट साधन के बगैर कुछ भी नहीं कर सकता. साधन शक्ति के पास है. विजय उसकी है जिसके साथ शक्ति है.

जानकी! हाय उद्धार प्रिया का हो न सका, वह ए…

कहते हैं, स्वर्ग भी मरने के बाद ही मिलता है!

२६ अगस्त के टाइम्स ऑफ़ इंडिया में न्यूज़ है, "३१ कंपनियों को IITs ने बैन कर दिया है. उन्होंने प्लेसमेंट की मर्यादा की माँ चो* दी है. ऑफर दे कर जोइनिंग नहीं दिया. फ्लिपकार्ट, ग्रोफर्स, जोमाटो, और ऐसे अनेकों नाम हैं. स्टार्ट उप फ़ैल हो रहे हैं. स्टार्ट उप फ़ैल होते हैं. लेकिन स्टार्ट उप तब तक फ़ैल नहीं होते जब तक वो, फिर से नयी जंग के लिए तैयार हैं हो जाते. रेलिअनेक ज्वेल फ़ैल होगया, टाटा, बिरला, के कई वेंचर फ़ैल हो गए. मर्ज हो गए, बिक गए, कबाड़ में गया. एयरलाइन कम्पनीज बंद हो गयी, बंद होना फेलियर नहीं है, हार जाना , हार मान लेना फेलियर है. सहादत मांगती है स्टार्ट-अप .

किसी नें सच ही कहा है, स्टार्ट उप में, काफी समय, बिज़नस प्लान ही मिसिंग होता है. फंडिंग है, आईडिया है, मार्केटिंग है, स्ट्रेटेजी है. बिज़नस प्लान बना नहीं है. 
सारी बात नीयत की है. अगर आप की नीयत अच्छी  है तो, बरक्कत होगी. इंशाअल्लाह! बात अर्रोगंस से शुरू होती है, अर्रोगंस से ख़त्म हो जाती है. कॉपी-पेस्ट को कोई स्टार्ट उप नहीं ,कहता! कॉपी -पेस्ट बुरा नहीं है, पर मॉडल तो चेक कर लो, जब क़यामत निश्चित है उस मॉडल में, तो फिर सुसाइड …

HR की ज़िन्दगी जन्नत है. हनीमून की जगह

मुझे याद है, २००१; जब मैं सिम्बायोसिस इंस्टिट्यूट ऑफ़ बिज़नेस मैनेजमेंट पुणे की MPM/MBA entrance test ki इंटरव्यू के लिए गया था. GD स्टार्ट हुआ, मैं और एक सरदारजी, अंग्रेजी LOUDLY बक रहे थे. हम अग्रेसिव थे, आप बत्तमीज़ कह लीजिये। गलती हमारी नहीं हैं, हमें बताया गया था, ज्यादा बोलने को, औरों से मौका छीनने को, और ऐसे ही कुछ असंवैधानिक, असामाजिक प्रलाप. ग्रुप में काफी सज्जन और सलीकेदार , पढ़े-लिखे प्रतियोगी थे. हम दोनो ने उन्हें लगभग बोलने नहीं दिया. सीधे शब्दों में; हम ने उन्हें सुनने की बिलकुल कोशिश नहीं की, समझने की तो बात ही दूर की है. नतीजा? सरदार जी और मैं GD में सेलेक्ट हो गए, सभ्यजन बाहर. सरदारजी आज CHRO हैं, एक नामी बीपीओ में फिलिपींन्स में. ठीक हैं, बीपीओ और वह भी फिलीपींस में, आप कहेंगे , अंधों में कांना राजा. ढेले पर का भात! दूसरी कहावत कुछ रूढ़ देशी है. आप रहने दीजिये! 
गार्टनर वाले कहते हैं, फार्च्यून २५० की CEOs  मानते हैं की उनके ५५% CHROs को बिज़नेस रणनीति नहीं समझ आती. उनके CFOs तो सिर्फ ३०% CHROs को इस काम के क़ाबिल समझते हैं. ९०% महिलाओं की चॉइस HR है.at - होम सा लगता है. बाक…

Workplace Abuse को कहो, "इसकी माँ की!

कुछ स्टार्ट  उप के फाउंडर्स , managers "fuck" , "fucked "इत्यादि शब्द का इस्तेमाल ऐसे करते  है जैसे इसके बगैर उनकी  उत्पत्ति  पर प्रश्न चिन्ह लग जाएगा.
मैं इनसे पूछना चाहता हूँ कि बगैर वियाग्रा (वीमेन वियाग्रा भी अब उपलब्ध है) के आप ३ मिनट नहीं चल पाते, ८ और ९ इंच आपके लिए सपना है और दिन में ३० बार अपनी टीम, क्लाइंट्स के सामने, ऑफिस बॉय और महिलाओं , बच्चिओं के सामने, अपने से उम्र और अनुभव में काफी ज्यादा लोगिन के सामने आप "fuck " चालीसा के माध्यम से क्या बताना चाहते हैं?
 कि आपकी उत्पत्ति किसी विशेष प्रक्रिया से हुई है या फिर जो कुमार विश्वास कहते हैं प्रेम के बारे में, जब उनके मित्र और कवि सम्पत शरण जी प्रेम करने वालों का उपहास करते हैं. "जिनसे कुछ नहीं हो पाया होता है, वे ही ज्यादा "पुराण" बांचते हैं.

मैंने दोस्तों से सुना है जो स्टार्टअप में काम करते हैं या कर चुके हैं, की उनकी फाउंडर्स मीटिंग में "fuck " शब्द का प्रयोग टीम पर अपनी बोस्सिसिम साबित करने के लिए या फिर अग्रेशन दिखाने के लिए या फिर टीम के अंदर सफलता के लिए एक बलात…

एम्प्लोयी वेलफेयर का सुलतान, flipkart महान.

यह HR वाले करते क्या हैं?
सवाल जायज है. यह सवाल उतना ही पुराना ही जितनी की हमारी सभ्यता है. लेकिन आपके मैं यकीन दिलाना चाहता हूँ कि आईआईएम के बच्चों को शूली पर चढाने वाले HR वाले नहीं हैं. यह उनके आका IIT वाले व्यापारी हैं.
अभी flipkart का IIM ऑफर फ्लिप चर्चा में है. शायद १८ ऑफर्स पर  गाज गिर रही है. मुआवज़ा है डेढ़ लाख ६ महीने बाद जब जोइनिंग होगी. इसमें भी चालाकी. आप यह तो मानेंगे , HR वाले इतने चालाक नहीं हैं. यह भी बिज़नेस आका का ही फरमान है. HR सिर्फ अंग्रेजी बोलेगा और बाकी उन्हें IIT वाले बॉसेस बताते रहेंगे कि क्या और कितना बोलना है.
अब आपके पास मिलियन डॉलर वाले HR वाले हैं. HR में एक लम्बी फौज है. क्या आपको लगता है HR ने यहां कोई निर्णय लिया होगा? नहीं. उन्हें यह बता दिया गया होगा , "जोइनिंग डिले करना है, IIM को ईमेल लिख दो. बिज़नेस रीज़न बता दो. यह आदेश तो एडमिन असिस्टेंट को भी दिया जा सकता था. पर HR वाले होते किस लिए हैं. HR वालों को यह सब हैंडल करना बड़ा की सनसनी ख़ेज़ लगता है. ऐसे समय में, स्वनाम धन्य HR वाले अपने आप को बड़े काम की चीज़ समझने लगते हैं. पर जैसे की उन्हें मालूम पड़ता …

सावधान: आगे स्टार्ट अप है, कहीं आप फंस न जाएँ .

सावधान इंडिया !
फ्लिपकार्ट ने अब IIM  और IIT वालों के जोइनिंग डेट्स निरस्त कर दिए हैं. ६ महीने के लिए. अनिश्चितता का दौर स्टार्ट उप में चल रहा है. हम तो डूबेंगे सनम, तुमको भी ले डूबेंगे !
तश्वीर साफ़ हो जाएगी अगर आप निचे की ग्राफ देखेंगे.
आप पूछेंगे "कहाँ गए ये लोग?" यह तो कहानी है स्टार्ट अप की रंगीन और साहसी दुनिया की. व्यवसायी बनने  की. (Disrupt ) करने की. यूनिवर्स में डेंट लगाने की. इनके पास मौका है और इनमे काबिलियत भी है. IIM  और IIT और स्मार्ट लोग कर सकते हैं सब जो वो करना चाहते हैं पर जगह है सिलिकॉन वैली , गुरुग्राम, और बैंगलोर नहीं.
स्टार्ट अप डिसरप्टिव छोड़ कर अब वैल्यूएशन के गेम में फंस गया है. ये इंजीनियर स्टार्ट अप में भी नौकरी ही कर रहे हैं. बिज़नेस की कमान तो फाउंडर्स के हाथ में है और वे ग्रेट प्रोडक्ट की जिम्मेवारी टीम के ऊपर डाल कर CEO बन जाते हैं. सेलिब्रिटी स्टेटस मिल जाता है और बिज़नेस  पीछे छूट जाता है. एम्प्लोयी disillusioned हो जाता है. वह एम्प्लोयी की तरह फिर दूसरी नौकरी ढूंढ़ता है. पुराने स्ट्रक्चर्ड MNC की याद आ जाती है.

HR डिस्ट्रेस से गुज़र रहा है. अनन्त पीड़ा से गुज़र रहा है

HR को चाहिए आज़ादी.
वक़्त है आज़ादी का. मैं कन्हैया का फैन हूँ. उनके नारों का फैन हूँ. मैं भी JNU का छात्र रहा हूँ.
HR डिस्ट्रेस/यंत्रणा से गुज़र रहा है. अनन्त पीड़ा से गुज़र रहा है. कृष्ण की भूमिका से अब दास की , याचक की स्तिथि में आ गया है. पोस्टर बॉय /गर्ल अब पोस्टर के पीछे छुप गया  है. इसे चाहिए आज़ादी।  HR क्या अब सिर्फ "हारे को हरी नाम"! रह गया है? क्या सबसे ज्यादा insecure  एंड politicking  फंक्शन है यह? क्या यह यह इन्फेक्शन का श्रोत है? vulnerable भी और हेल्पलेस एंड उपेक्षित भी? इसे चाहिए आज़ादी! इसे चाहिए एक कृष्णा!

भूमिका-
HR का सो कॉल्ड लीडरशिप? अपनी पहचान नहीं बन सका.
LinkedIn और twitter पर अपनी पहचान ढूंढ रहा है. कुछ तो बस facebook तक ही अपनी इंटेलेक्चुअल काबिलियत सीमित कर लेते हैं. वेलफेयर स्टेट का सबसे बड़ा जीता -जागता उदहारण है HR . एक छद्म कोशिश, बिज़नेस enabler , catalyst , चेंज ऐजेंट , पता नहीं, कहाँ कहाँ से ये शब्द इन सेल्फ-proclaimed लोग ले कर आये.
Distress जीन्स के बाद अब समय चल रहा है डिस्ट्रेस हायरिंग का. यहां आपके रिज्यूमे का in-human, non nonsensical टार्चर कि…

नाम बड़े और दर्शन छोटे

आईआईएम कथा- झोला छाप डाक्टर (होम्योपैथिक-आयुर्वेदिक, इत्यादि) अब ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट हेड है. जिसने कभी किसी भी जाने-माने कंपनी में न काम किया, न टीचिंग , न कॉर्पोरेट का कोई अनुभव है जिसमे, उसे हम बना देते हैं, आईआईएम का ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट हेड. नाम के आगे डॉक्टर लिख लेने से आप ऐसा सोच सकते हैं की शायद Ph.D हो. आईआईएम का बेडा अब ये झोला छाप डाक्टर पार लगाएंगे. सरकारी पने की भी हद्द होती है.
उनकी अंग्रेजी पढ़ लीजिये उनके लिंकेडीन पर प्लेसमेंट सम्बन्धी पोस्ट में, आप को पता लग जाएगा , क्या लेवल है. इस व्यक्ति को एक नए आईआईएम (पहला बैच) का ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट हेड कैसे बना सकते हैं. यह कोई थर्ड ग्रेड इंजीनियरिंग कॉलेज नहीं है जहां आईटी सर्विसेज कंपनी टेक सपोर्ट के लिए हायरिंग करने आती है. लोकल थिंकिंग की भी एक हद्द होती है. यहां तो यही दिख रहा है, मालिक पंजाबी, HR हेड पंजाबी, मालिक मराठी, HR हेड, मराठी, इत्यादि। नियुक्ति हो रही है या रिस्तेदारी। अब तो शादी भी बिरादरी में नहीं, बराबरी में होती होती है फिर यह प्रांतवाद क्यों, क्या इस आईआईएम में सभी प्लेसमेंट करने वाली कम्पनियाँ बंगाल…

आवश्यकता स्कॉलर्स की है, रिसर्च एसोसिएट्स की है

सुनील सर, आपके विचार अच्छे हैं पर इनको पूरा करने के लिए मानव संसाधन विभाग की आवशयकता नहीं हैं. आवश्यकता स्कॉलर्स की है, रिसर्च एसोसिएट्स की है. कोई मानव संसाधन का संस्थान ये दोनों नहीं बनाते. सिलेबस देख लीजिये, पचरंगा आचार लगेगा. एक ऐसा पेपर दिखला दीजिये XLRI या टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंस से जो आपकी मानव संसाधन रिसर्च या स्कॉलर्स की श्रेणी में आता हो!

जैसा की राम चरण ने कहा : मानव संसाधन को दो भागों में बाँट देने की जरूरत है; मानव संसाधन एडमिन और मानव संसाधन -लीडरशिप आर्गेनाईजेशन. पहला चीफ फाइनेंसियल अफसर को रिपोर्ट करे और दूसरा चीफ एग्जीक्यूटिव अफसर को. जब तक ऐसा नहीं करेंगे, मानव संसाधन विभाग सामाजिक सरोकार ही निभाता रहेगा. पेरसोंनेल मैनेजमेंट वर्कर्स के लिए कमाल का काम करता था, हेल्थ एंड सेफ्टी, क्रेच, कैंटीन, ट्रांसपोर्ट, मैनेजमेंट-वर्कर नेगोसिऎसन बाई कलेक्टिव बार्गेनिंग, अप्रेंटिसशिप मैनेजमेंट, ट्रेनिंग , इत्यादि. ये सभी १००% ROI बेस्ड थे. किसी पर्सनेल मैनेजर को कभी २ और ४ करोड़ की सैलरी नहीं मिली. आज सेलिब्रिटी HR मैनेज करते हैं, जैसा आपने कहा डी (डेवलपमेंट) मिसिंग है. फिर हु…

क्या कोई षड्यंत्र है? क्या जाति विशेष की कोई निश्चित प्रवृत्ति होती है?

क्या कोई षड्यंत्र है? क्या जाति विशेष की कोई निश्चित प्रवृत्ति होती है?
सामजिक-आर्थिक रूप से सफल लोगों को ही देख लेते हैं. क्या इनमें कोई विशेष गुण है जो इन्हे सफल बनाता है?
क्यों बंगाली और मलयाली नौकरियों में ज्यादा सफल हो जाते हैं? क्यों बनिये व्यापार में सफल होते से लगते हैं?
क्या उन्हें व्यापार करने के गूढ़ रहस्य मालूम हैं? या फिर सिर्फ व्यवहार-सरोकार के ये पुजारी हैं?
कैसे जानें इनमें ये गुण कैसे आते हैं? कैसे ये इन गुणों की बदौलत अपनी मंज़िल पाते हैं.
प्राइवेट नौकरियों को अगर देखें तो, इसकी शुरूआत टाटा और बिरला या बजाज ग्रुप से निकल कर आता है. इन कंपनियों में मजदूर वर्ग बिहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र से आया, तकनिकी काम के लिए, दक्षिण भारत और महाराष्ट्र का वर्ग जुड़ा. बंगाली ऑफिस के काम के लिए रखे गए. उन्हें कुछ अंग्रेजी आती थी और ये बड़े अफसरों के सामने बिलकुल मेमनों जैसा हाव-भाव रखते थे. ये उनके सहमति और असहमति दोनों से बराबर ही सहमति प्रकट करते थे. ये अपने विचार फुटबॉल, मुरी घोंटो , नक्सलबाड़ी, सिगरेट , कार्ल मार्क्स, इत्यादि तक सीमित रखते हैं.
इन्होंने सबसे पहले याद कर लिए था.. …