क्या संतों, सन्यासियों पर प्रारब्ध लागू नहीं होता?
ज्योतिर्विद और संतों को भी कहते सुना है कि , नक्षत्र, ग्रह और प्रारभ्ध उनसे परे रहता है. आप का क्या मत है?
पर साधारण मनुष्य वही जीवन जीता है, जिसे, आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने कहा था: "कर्म का भोग फिर भोग का कर्म".
मुझे ईश्वर का मतलब समझ में यूँ आता है; "जो है, और जिसने आपका प्रारब्ध लिख दिया एक उद्देश्य के लिए". सुख और दुःख उस रास्ते के पड़ाव हैं, कुछ सुहाने तो कुछ भयानक. कई रास्ते भयानक पड़ावों की श्रृंखला लगती है, जहाँ अनगिनत अवरोध हैं, तो कुछ रास्ते कोमल और लुभावने भी .
भाई, ज़िन्दगी एक काम है, जिसे करना है, कोई विकल्प नहीं है. ईश्वर की आपसे कोई दुश्मनी नहीं है, बस आप चुन लिए गए कुछ करने के लिए, आप कर लें तो ठीक है, वर्ना इस्तेमाल तो हो ही जाएँगे. काम पूरा होगा और तभी आपकी छुट्टी भी.
धर्मों में गुरु की अवधारणा सिर्फ इसी लिए है, कि रास्ते में कोई जीपीएस नहीं है, आपको हर असमंजस में किसी से रास्ता पूछना है. गुरु इतना ही है, अगर आपको गुरु का आशीर्वाद मिल गया तो समझ लीजिये , इंटरनल एग्जाम में पूरे नंबर मिल गए पर, अभी बाकी की परीक्षा लम्बी है.
हिम्मत रखिये, भरोसा रखिये, आपके पास तंग आकर तत्क्षण कोई गलत कदम उठाने की भी इच्छा हो सकती है, आप बिलकुल तैयार हो सकते हैं की अब प्रलय ही आ जाए. धरती फट जाए और आप सीता माँ की तरह उसमे समां जाएँ. पर ऐसा होगा नहीं। ग्रहों की चाल पल पल बदलती है; आपका भी मूड बदल जाएगा और आप नए सोच के साथ आगे बढ़ेंगे. आपको हर शर्त पर जीतना है.
जब जीवन का मतलब नहीं समझ आने लगे, बार-बार गहरे कष्टों से गुजरने लगें, तब लगता है कर्मा या प्रारब्ध भी कितनी गहरी व्यवस्था है.
अब एक ही कुंडली में, सूर्य , मंगल और बुध पराक्रम भाव में हों तो मतलब है आप किसी भी मुश्किल से निकल सकते हैं, बस ढृढ़ निश्चय कर लें. मैं निकलता रहा हूँ बार-बार और अब तो आदत सी हो गयी है.
मजेदार बात तो तब हो जाती है जब एक ही कुंडली में इतने सारे दुर्योग एक साथ उमड़ पड़ें -ग्रहण योग, केमद्रुम योग, श्रापित दोष, दृष्टि दोष इत्यादि, भाग्य और कर्म का स्वामी नीच का होकर व्यय भाव में बैठा हो, लग्न का स्वामी भी नीच का हो नवमांस में. कोई भी ग्रह उच्च के न हों. सबसे शुभ ग्रह बृहस्पति रोग, ऋण , शत्रु के घर में बैठे हों. मंगल नीच का होकर अस्त भी हो. सारे अच्छे ग्रह चर राशि में हों. चन्द्रमा पीड़ित हो, शुक्र के साथ केतु हो, फिर जी लो ज़िन्दगी सिमरन.
जब आप हार्ट अटैक तो नित आमंत्रित करते हों. जब आपका सारा विश्वास भगवान् और भक्ति से विरत होने लगे, जी लो ज़िन्दगी सिमरन.
कल ही एक ख़याल आया , अगर सारे कर्मा /प्रारब्ध इस शरीर से जुड़े हैं, तो इस शरीर को इसका रहने ही न दो, त्याग कर दो. ज़िन्दगी ख़त्म करने की बात नहीं कर रहा. इसका मतलब है, शरीर को दूसरों के लिए लगा दो. अपना कुछ न रहने दो. न शरीर, न इसके लौकिक स्वरुप को. सब त्याग दो. संत/सन्यासी हो जाना, फ़क़ीर हो जाना जिसके पास अपना कहने को कुछ भी नहीं हो. दूसरों की सेवा में लग जाओ. पर जब तक परिवार की ज़िम्मेदारियाँ हैं, तब तक नहीं. तब तक इसकी तैयारी हो, ट्रेनिंग हो, और फिर एक दिन समय पर सब कुछ छोड़ दो.
मैंने सुना है कि संतों, सन्यासियों पर प्रारब्ध लागू नहीं होता। अब यह तो संन्यास ही है, जो बुद्ध और महावीर ने लिया था.
क्या मैं यह चाहता हूँ, क्या यह मुझ से हो पायेगा? मुझे पता नहीं पर अभी काफी समय है. मैं क्लैरिटी ढूंढ रहा हूँ , ढूंढता रहूँगा.

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